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प्राइवेट लैब्स में कोरोना की फ्री टेस्टिंग के पक्ष में क्यों नहीं हैं किरण मजूमदार शॉ?

किरण मजूमदार शॉ. बायोफार्मास्युटिकल कंपनी बायोकॉन की फाउंडर हैं. उनका मानना है कि प्राइवेट लैब्स में कोविड-19 की फ्री जांच को लेकर दिया गया सुप्रीम कोर्ट का फैसला उचित नहीं है. उन्होंने कहा कि आदेश मानवता की दृष्टि से तो अच्छा है, लेकिन इसे लागू करना ‘अव्यावहारिक’ है. सुप्रीम कोर्ट ने कोरोना वायरस से संबंधित सभी टेस्ट फ्री में करने का आदेश दिया है. लेकिन मजूमदार फ्री जांच को लेकर सुप्रीम कोर्ट के फैसले से सहमत क्यों नहीं है. उन्होंने इंडिया टुडे टीवी को दिए इंटरव्यू में इस बारे में विस्तार से बताया.

मजूमदार का कहना है कि ऐसे समय में जब Indian Council of Medical Research यानी ICMR सभी सरकारी और प्राइवेट मेडिकल कॉलेजों से COVID-19 की जांच के लिए आवेदन मांग रहा है, सुप्रीम कोर्ट ने 65 प्राइवेट लैब को कोरोना की फ्री जांच की सुविधा देने को कहा है. प्राइवेट लैब को शामिल करने का उद्देश्य कोरोना की जांच को बढ़ाना है. प्राइवेट लैब को पहले ही सरकार की ओर से तय रेट पर जांच के लिए कहा गया है. अब उनसे मुफ्त में ऐसा करने की उम्मीद करना प्राइवेट सेक्टर के लिए चुनौतीपूर्ण होगा. खासकर वर्तमान हालात में.

किरण मजूमदार शॉ ने कहा,

मानवता को ध्यान में रखते हुए प्राइवेट सेक्टर आगे आया है. हम पहले ही सरकार की ओर से निर्धारित मूल्य पर कोरोना का टेस्ट कर रहे हैं. ICMR ने प्राइवेट लैब्स के लिए जो प्राइज तय किया है, सरकारी लैब में भी उतना ही खर्च हो रहा है. ICMR ने जांच के लिए जो कीमत तय की प्राइवेट लैब्स ने बिना किसी लाग लपेट के मान लिया. वो अपनी जिम्मेदारियों से भाग नहीं रहे हैं. प्राइवेट लैब को चलाने के लिए लेबर्स की जरूरत होती है. वे लोगों को रोजगार और आजीविका दे रहे हैं. प्राइवेट लैब्स को जांच के लिए जरूरी सामान खरीदना पड़ता है. उन्हें अपने कर्मचारियों को सैलरी देनी है. ऐसे में उनसे ये उम्मीद नहीं की जानी चाहिए वे फ्री टेस्ट करेंगे.

उन्होंने आगे कहा,

अगर प्राइवेट लैब्स में फ्री जांच के लिए कहा जाता है तो कोविड-19 परीक्षण कम हो जाएंगे, क्योंकि निजी लैब अपना कारोबार उधार पर नहीं चला सकतीं. यहां काम करने वाले लोगों की नौकरियां जाएंगी. हम कर क्या रहे हैं. हमें augment test को बढ़ाना है. ताकि ज्यादा से ज्यादा लोगों का पता लगा सकें.

शॉ ने कहा कि सरकारी लैब में हर दिन लगभग 10 से 15 हजार टेस्ट हो रहे हैं. हमें इसे बढ़ाकर हर दिन एक लाख से दो लाख करना होगा. बिना प्राइवेट सेक्टर को शामिल किए ये नहीं हो पाएगा. प्राइवेट लैब्स रैपिड टेस्ट के लिए सेटअप बना चुके हैं.

प्राइवेट लैब में टेस्ट कम क्यों हो रहे हैं?

यह पूछने पर कि अब तक जितने टेस्ट हुए हैं उसमें प्राइवेट लैब्स ने सिर्फ दो प्रतिशत टेस्ट किए हैं. शॉ ने कहा कि प्राइवेट लैब ने सिर्फ एक हफ्ते पहले टेस्टिंग शुरू की है. उन्हें कई तरह की रुकावटों का सामना करना पड़ रहा है. राज्य सरकारें कह रही हैं आप खुद से सैंपल नहीं ले सकते. आपको सरकारी अस्पताल से आने वाले सैंपल का इंतजार करना पड़ेगा. लेकिन अगर आप टेस्टिंग बढ़ाना चाहते हैं तो प्राइवेट लैब्स को सैंपल लेने के लिए अनुमति देनी होगी.

Coronavirus India
प्रतीकात्मक फोटो

दिक्कत कहा हैं?

यह पूछने पर कि क्या लालफीताशाही प्राइवेट लैब में कोरोना की टेस्टिंग में रुकावट बन रही हैं. शॉ ने कहा कि कई राज्य जैसे महाराष्ट्र और कर्नाटक प्राइवेट सेक्टर को सपोर्ट कर रहे हैं. यह सिर्फ ब्यूरोक्रेसी का मामला नहीं है. सरकारें प्राइवेट सेक्टर के साथ काम कर रही हैं, लेकिन सुप्रीम कोर्ट का फैसला ठीक नहीं है. फैसला देने वाले जज को पता होना चाहिए कि टेस्ट के लिए 4500 रुपए ICMR ने तय किए हैं. इतना ही खर्च सरकारी लैब में भी जांच कराने पर आ रहा है. इस पर प्राइवेट लैब्स कोई प्रॉफिट नहीं कमा रहे हैं. जांच में खर्च हो रहा है. ये टेस्ट इतना आसान नहीं है. सीमित संसाधनों में ये टेस्ट करने पड़ रहे हैं. सैंपल कलेक्ट करने से लेकर टेस्ट तक बहुत लोगों की जरूरत होती है. इस तरह के छोटे संस्थानों से फ्री जांच के लिए कैसे कहा जा सकता है. उनके पास कोई कैश रिजर्व नहीं है.

सुप्रीम कोर्ट फैसले पर विचार करे

मजूमदार का कहना है कि सरकारी लैब में जांच फ्री है. अगर आप प्राइवेट लैब को 10 प्रतिशत जांच करने के लिए कहते हैं तो यह ठीक है लेकिन हर जांच फ्री कर देना सही नहीं है. सुप्रीम कोर्ट का फैसला सही नहीं है. उसे अपने फैसले पर विचार करना चाहिए. क्योंकि पीआईएल पर फैसला देते समय इन बातों का ध्यान नहीं रखा गया.

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि प्राइवेट लैब में कोरोना की मुफ्त जांच होनी चाहिए.
सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि प्राइवेट लैब में कोरोना की मुफ्त जांच होनी चाहिए.

प्राइवेट सेक्टर के बारे में ऐसी धारणा बना दी गई है कि हम हर काम प्रॉफिट के लिए करते हैं. जिसका सच्चाई से दूर-दूर तक कोई लेना देना नहीं है. कोरोना से लड़ाई में हम अपने बल पर इक्विपमेंट और जांच किट बना रहे हैं. सरकार हमारा साथ दे रही है. लेकिन सुप्रीम कोर्ट का फैसला व्यावहारिक नहीं है.

कौन हैं मजूमदार?

किरण मजूमदार शॉ ने 1978 में भारत की सबसे बड़ी बायोफार्मास्यूटिकल फर्म, बायोकॉन की शुरुआत की. ये भारत की सबसे धनी महिला हैं, जिन्होंने अपने दम पर बिजनेसवर्ल्ड में जगह बनाई है. शॉ ने रीसर्च इन्फ्रास्ट्रक्चर और साइंटिफिक टैलेंट में इन्वेस्ट किया. इन्होंने मजूमदार शॉ मेडिकल सेंटर शुरू किया. ये मेडिकल सेंटर एक ऐसे कैंसर केयर मॉडल की खोज में लगा हुआ है जो आम लोगों की पहुंच में हो. 2019 में फोर्ब्स मैगजीन ने दुनिया की 100 सबसे शक्तिशाली महिलाओं की लिस्ट में उन्हें शामिल किया था.


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