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क्या जस्टिस लोया केस की फाइल फिर खुलवाने जा रही है उद्धव ठाकरे सरकार?

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महाराष्ट्र की नई सरकार जस्टिस लोया की मौत की दोबारा जांच करवा सकती है. उद्धव ठाकरे के नेतृत्व में बनी इस सरकार का हिस्सा है नैशनलिस्ट कांग्रेस पार्टी (NCP). इसके मुखिया शरद पवार ने कहा कि अगर जांच की मांगों में कोई गंभीरता हुई, या आरोपों का ठोस आधार पाया गया, तो इस केस में फिर से जांच करवाई जा सकती है.

‘स्क्रॉल’ में छपी एक ख़बर के मुताबिक, एक मराठी न्यूज़ चैनल से बातचीत के दौरान शरद पवार से जस्टिस लोया केस पर सवाल पूछा गया. इसके जवाब में उन्होंने कहा-

मैं नहीं जानता. मैंने अख़बार में छपे कुछ आर्टिकल्स में पढ़ा था कि महाराष्ट्र के लोगों के बीच इस तरह की बातें हो रही हैं, कि जस्टिस लोया की मौत के मामले की गहराई से जांच होनी चाहिए. अभी मुझे इस बारे में विस्तृत जानकारी नहीं है. अगर जांच की मांग हो रही है, तो इस बारे में सोचा जाना चाहिए. देखा जाना चाहिए कि किस आधार पर ये मांग की जा रही है? इसमें क्या सच्चाई है? इन बातों की छानबीन होनी चाहिए. अगर इसमें कुछ ठोस है, तो दोबारा जांच करवाई जानी चाहिए. अगर जांच की मांगों में कोई वज़न नहीं है, तो फिर किसी के ऊपर भी निराधार आरोप लगाना सही नहीं है.

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जस्टिस लोया की मौत पर सवाल उठने कब शुरू हुए?
जस्टिस बृजगोपाल हरकिशन लोया. 1 दिसंबर, 2014 को उनकी मौत हुई. मौत के समय वो सोहराबुद्दीन शेख एनकाउंटर केस की सुनवाई कर रहे थे. इस केस में मुख्य आरोपी थे अमित शाह. बताया गया कि जस्टिस लोया की मौत दिल का दौरा पड़ने से हुई. फिर नवंबर 2017 में ‘द कारवां’ मैगज़ीन में निरंजन टाकले की एक रिपोर्ट छपी. इसमें जस्टिस लोया के परिवार के हवाले से दावा किया गया था कि मौत की स्थितियां काफी संदिग्ध थीं. और, जस्टिस लोया पर एक ख़ास फैसला सुनाने का दबाव बनाया जा रहा था. इसके बाद जस्टिस लोया की मौत पर कई सवाल उठे.

ये मामला सुप्रीम कोर्ट भी पहुंचा
बॉम्बे लॉयर्स असोसिएशन ने उच्चतम न्यायालय में एक याचिका डाली. इसमें जस्टिस लोया की मौत के मामले में स्वतंत्र जांच करवाने की अपील की गई थी. अप्रैल, 2018 में अदालत ने इस याचिका को ख़ारिज कर दिया. अदालत ने कहा कि मौत के समय जस्टिस लोया के साथ मौजूद जूडिशियल अधिकारियों पर भरोसा न करने का कोई आधार नहीं है. मगर जांच की मांगें नहीं रुकीं. फिर से अदालत में एक रिव्यु पिटीशन डाला गया. हालांकि जुलाई, 2018 में कोर्ट ने इसे दोबारा डिसमिस कर दिया.

‘द कारवां’ की उस रिपोर्ट में क्या खास चीजें थीं?
इस रिपोर्ट के मुताबिक, जस्टिस लोया एक साथी जज की बेटी की शादी में मुंबई से नागपुर गए थे. परिवार के अनुसार, जस्टिस लोया इस शादी में जाना नहीं चाहते थे, लेकिन अपने दो साथी जजों के कहने पर वो शादी में शामिल हुए. 30 नवंबर, 2014 की रात लोया ने अपनी पत्नी शर्मिला से फोन पर बात की. अगली सुबह लोया परिवार को बरदे नाम के एक जज ने जस्टिस लोया की मौत की खबर दी.

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एक संघ कार्यकर्ता का भी ज़िक्र आया था
इस स्टोरी में ये भी दावा किया गया था कि मुंबई से जस्टिस लोया की पत्नी और उनके बच्चों के साथ कुछ जज गातेगांव आए थे. इनमें से एक लगातार उन्हें मीडिया से बात करने से मना कर रहे थे. ‘द कारवां’ की स्टोरी में जस्टिस लोया के परिवार के हवाले से ईश्वर बाहेती नाम के एक RSS कार्यकर्ता का भी ज़िक्र था. लोया परिवार का कहना था कि इन्होंने ही जस्टिस लोया के पिता को उनकी मौत की ख़बर दी थी. और, इनके ही ज़रिये जस्टिस लोया का फोन मिला था उनके परिवार को.

…और वो रहस्यमय ‘चचेरा भाई’
इस स्टोरी में और भी कई सवाल उठाए गए थे जस्टिस लोया की मौत पर. मसलन- परिवार का कहना था कि जस्टिस लोया की कमीज़, बायें कंधे और कमर के हिस्से पर खून के धब्बे थे. सवाल ये उठा कि जब दिल का दौरा पड़ने से मौत हुई, तो शरीर पर खून कहां से आया. हालांकि पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट में जस्टिस लोया के कपड़ों को सूखा बताया गया था. परिवार का कहना था कि पोस्टमॉर्टम के लिए उनकी इजाज़त नहीं ली गई थी. न ही उन्हें पंचनामे की कॉपी ही दी गई. बल्कि पोस्टमॉर्टम की रिपोर्ट के हर पन्ने पर ‘मैयताचा चुलतभाउ’ नाम से एक दस्तखत है. मराठी में इसका मतलब होता है मरने वाले का चचेरा भाई. लोया परिवार कहता है कि उन्हें आज तक नहीं मालूम कि ये चचेरा भाई कौन था.


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