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पाकिस्तान में चामुंडा मंदिर के बंदर याद आते रहे इंतिज़ार को

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इंतिज़ार हुसैन नहीं रहे. दिमाग में गर्दा गिरकर भूरी से काली हो गई हो तो बस इतना कहकर काम चलाया जा सकता है. या फिर ये जोड़ा जा सकता है कि पाकिस्तान के थे. वहां मशहूर थे. उर्दू में लिखते थे. और ऐसी ही कुछ और बातें. अखबारी इश्तेहार की तरह गिनकर कुछ हर्फ और खर्च कर दीजिए.
या फिर सब कुछ झाडू़ से बुहार दीजिए. एक ऐसे बुजुर्ग के लिए. जो कि हमारा साझा है. तारीख के पार भी.
इंतिज़ार यहीं हमारे हिस्से की जमां पर जो बुलंदशहर दिखता है, वहां एक घर में पैदा हुए थे. 7 दिसंबर 1923 को. डिबाई कस्बे में. पार्टीशन के वक्त परिवार पाकिस्तान चला गया.
मगर याद रखिए. जो जहां जाता है. वो अपने साथ अपने हिस्से का मुल्क भी ले जाता है. परों से मिट्टी नहीं छिटक पाता है.
इसीलिए इंतिज़ार की कहानियों में बार-बार महाभारत का असर दिखता था. बौद्ध शिक्षाएं झलकती थीं. मंदिर आते थे.
उनकी किताबें हिंदी में भी वाया ट्रांसलेशन उपलब्ध हैं. कहानियां. नॉवेल, इस नाम के- बस्ती. हिंदुस्तान से आखिरी खत, आगे समंदर है. वो जो खो गए. और जातक कथाओं का संग्रह. कछुए नाम से.
काल का कछुआ कुछ सरका. इंतिज़ार नए समंदर में उतरे. मगर हम उन्हें नहीं भूलेंगे. क्योंकि रवानगी से पहले स्याही से सींच सींच किस्सों के बीज बोए हैं खूब उन्होंने.
सलाम.
और अब आप पढ़िए इंतिज़ार हुसैन की जिंदगी का एक वाकया. जो सुनाया मेरे हीरो राइटर्स में से एक असगर वजाहत ने. जब वह इंतिज़ार को लेकर उनके मादरे वतन गए…

इंतजार हुसैन इंडिया आए थे. उन्होंने मुझसे कहा था. अपने गांव जाना है. साठ एक साल बीत गए थे. हम पहुंचे. अलीगढ़ के पास. डिबाई कस्बे में.
अब मुश्किल ये थी कि घर खोजना था. इतना लंबा वक्त बीत गया था. तस्वीर कुछ और ही थी. कई गलियां इधर से उधर हो लिए. घर नहीं मिला. फिर उन्होंने कहा, मेरे घर के पास छज्जू हलवाई की दुकान थी. एक पुराने हलवाई तक पहुंचे. वहां से आठवां घर गिना गया. पर कुछ चूक हो रही थी. मकां नहीं मिला.
फिर याद आया. गली में मस्जिद भी थी. इस इशारे के सहारे उनके घर पहुंच गए.
पर असल दिक्कत तो अब पेश आई. इंतजार नर्वस हो गए थे. अंदर जाने को तैयार ही नहीं थे. कुछ रूंधे, कुछ डरे से. बड़ी मुश्किल से उन्हें आगे बढ़ाया.
मकान में एक भला कारोबारी परिवार रहता है. मजहब से हिंदू. जब उन्हें पता चला कि यहां इतना बड़ा राइटर पैदा हुआ है, तो उनकी खुशी का ठिकाना नहीं रहा. बड़ा सत्कार किया हम सबका. उनके बच्चे भी आए. उन्होंने हुसैन साहब के पांव छुए. बुजुर्गियत निहाल हो गई. अपने नए पोतों को देख. जेब टटोली और शगुन थमा दिया नौनिहालों को.
फिर हम उस पूरे दिन डिबाई घूमते रहे. उन्हें कभी कर्बला जाना होता तो कभी चामुंडा का मंदिर. हुसैन साहब ने बताया कि ये मंदिर उनके रोज का हिस्सा था. यहां ऊपर की तरफ एक पेड़ था. जिसमें बहुत ज्यादा ऊधमी बंदर रिहाइश किए थे.
इन सब बातों का जिक्र उनकी कहानियों में भी बार बार लगातार आता है. अब जिक्र आएगा. इंतजार की पूरी हो चुकी कहानी का.

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