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बच्चों के मरने की प्रेस कॉन्फ्रेंस में बिहार के हेल्थ मिनिस्टर विकेट पूछ रहे थे

अंग्रेजी की एक पंक्ति है ‘Smallest Coffins are the Heaviest?’ जिसका हिंदी तर्जुमा है ‘ताबूत जितना छोटा हो, वजन उसमें उतना ही ज्यादा होता है’. मुज़फ्फरपुर में 100 बच्चों की जान जा चुकी है. लेकिन सरकारों को इससे कोई खास फर्क पड़ता हुआ नहीं दिख रहा है. जांच की बात हो रही है. लेकिन कोई सफलता हाथ नहीं लग रही है. डॉक्टर्स इसे एक्यूट इंसेफाइटिस सिंड्रोम बता रहे हैं, तो गांव वाले ‘आसान भाषा में’ चमकी बुखार कह दे रहे हैं.

डॉक्टरों के मुताबिक जितने भी बच्चे मर रहे हैं वे इस बीमारी में हाइपोग्लाइसीमिया के शिकार हो जा रहे हैं. इस केस में शरीर में शुगर की मात्रा बिल्कुल कम हो जाती है. फिर उनके शरीर में इलेक्ट्रोलाइट डिसबैलेंस हो जाने की वजह से उनकी मौत हो जा रही है. इन मौतों पर सरकार से जब सवाल पूछा गया- कि इसे रोक क्यों नहीं पा रहे. तो सरकारें सवाल पर बगलें झांकते लग जाती है.

100 बच्चों के मारे जाने के पहले जब हमने आपके पास जानकारी पहुंचाई थी. तब श्री कृष्ण मेडिकल कॉलेज यानी एसकेएमसीएच के सुपरिटेंडेंट सुनील शाही ने भरोसा दिलाया था-

‘दिल्ली से टीम आ गई है, पूरी मेहनत कर रहे हैं, अब एक भी बच्चे की जान नहीं जाएगी. हम पूरी कोशिश कर रहे हैं.’

लेकिन वो वादे झूठे निकले, शायद उनकी कोशिशें अधूरी रह गई, शायद सरकारों ने बच्चों को बचाने का प्रयास पूरे मन से नहीं किया. खैर, आखिरी बार बच्चों के मरने की संख्या 50 के आस पास थी. लेकिन 4 दिन के भीतर ही ये आंकड़ा 100 को छू गया. मुज़फ्फरपुर के ही एसकेएमसीएच और केजरीवाल अस्पताल के मरीजों की संख्या को जोड़ दें तो ये पौने 4 सौ को पार जा रहा है. हर घंटे नए मरीज़ अस्पताल पहुंच रहे हैं.

बिहार के मुज़फ्फरपुर, सीतामढी, शिवहर, मोतिहारी, छपरा, बेतिया और वैशाली इन ज़िलों में बच्चे लगातार दिमागी बुखार की चपेट में आ रहे हैं. लगातार मौत की आगोश में जा रहे हैं. केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री से जब पूछा गया कि क्या कार्रवाई हो रही है. तो इनका रिएक्शन खुद देख लीजिए-

हालांकि एक दिन पहले हर्ष वर्धन पूरे दल-बल के साथ मुज़फ्फरपुर में थे. डॉक्टर और मंत्रियों की टीम के साथ एसकेएमसीएच में हालात का जायज़ा ले रहे थे. जिसके बाद उन्होंने मीडिया से बात करते हुए कहा था-

4 घंटों में 100 बच्चों और उनके परिजनों से मिला हूं. एक डॉक्टर के तौर पर मैंने सभी मरीजों से मुलाकात की है. डॉक्टरों और रिसर्चर्स को ज़ल्द से ज़ल्द इसका समाधान ढूंढने के लिए कहा गया है. नॉर्वे से एक टीम मौत के पीछे के कारणों का पता लगाने के लिए भी पहुंची है. सैंपल्स जांच के लिए पुणे की एक प्रयोगशाला में भेज दिया गया है. हम जल्दी ही इस पर काबू पा लेंगे. 

इसी प्रेस कॉन्फ्रेंस के वक्त एक ऐसा वाकया आया, जब बिहार के स्वास्थ्य मंत्री मंगल पांडे खुद ही पत्रकारों से सवाल पूछ बैठे. ये सवाल बच्चों की मौत के बीच बिल्कुल अलग था. उन्होंने भारत-पाकिस्तान के बीच चल रहे विश्व कप का लेटेस्ट स्कोर पूछ लिया.

वैसे मंत्री जी के ट्विटर पर भी नज़र दौड़ाएंगे तो बच्चों की मौत से ज्यादा क्रिकेट के ट्वीट्स मिल जाएंगे. ये हालत तब थी जब हर्षवर्धन के सामने भी एक बच्ची की मौत हुई थी. वे एसकेएमसीएच में जब दौरा कर रहे थे, तब एक बच्ची ने उनके सामने दम तोड़ दिया था. उनके अस्पताल से निकलने के बाद भी 9 बच्चों की मौत हो गई. जिसके बाद ये आंकड़ा 100 को छू गया.

दूसरी तरफ बिहार के मुख्यमंत्री हैं नीतीश कुमार. इन्होंने सारे डॉक्टरों, स्वास्थ्य विभाग और डिपार्टमेंट को तो अलर्ट मोड पर रहने को कहा है. लेकिन खुद तीन दिन से दिल्ली में डेरा जमाए हुए हैं. शनिवार को नीति आयोग की बैठक में भाग लेने दिल्ली पहुंचे. फिर रविवार को राजनीतिक मुलाकात की. रविवार की ही शाम पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी से भी मिले. इतने से मन नहीं भरा इनका तो सोमवार को भी राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद से शिष्टाचार मुलाकात करने पहुंच गए.

नेताओं के बाद लोगों की नज़र अब सिर्फ अस्पताल और डॉक्टरों पर टिकी हुई है. स्थानीय पत्रकारों से बात करने पर पता चलता है कि वहां के हालात काफी खराब है. मरीज़ों की स्थिति काफी दयनीय है. अस्पताल में भर्ती मरीज़ों के घरवाले कह रहे हैं कि डॉक्टरों की भारी कमी है. दिन में डॉक्टर्स होते भी हैं तो राम में सिर्फ नर्स से काम चलाया जा रहा है.

कई घरवालों का ये भी कहना है कि आईसीयू में जगह नहीं है, दवाईयां उपलब्ध नहीं है, बच्चे मर रहे हैं. लेकिन बिहार के नगर आवास मंत्री कह रहे हैं- सब ठीक है, अस्पताल में किसी चीज़ की कोई कमी नहीं है.

एक डॉक्टर ने नाम ना छापने की शर्त पर बताया:

इस बीमारी में मरने वाले बच्चों की संख्या और ज्यादा है. जिसका सरकारी डेटा मौजूद नहीं हैं. ऐसे कई गांव-देहात हैं जहां बच्चे इस बीमारी की चपेट में आए हैं और लोकल इलाज़ करा कर अपनी जान पहले ही गंवा बैठे हैं.

फिलहाल हालात ये हैं कि बच्चे हर घंटे अस्पताल पहुंच रहे हैं. सरकार की तरफ से भी लोगों को सतर्क रहने के लिए कहा जा रहा है. बच्चों को धूप में नहीं भेजने की अपील की जा रही है. साथ ही खाली पेट लीची खाने से भी मना किया जा रहा है. क्योंकि कुछ जगहों पर लीची की वजह से भी इंसेफलाइटिस सिंड्रोम फैलने की बात की जा रही है.


बिहार: चमकी बुखार के शिकार बच्चे ही क्यों होते हैं?

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