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क्या है गौतम नवलखा केस, जिसे सुनने से अबतक CJI समेत सुप्रीम कोर्ट के 5 जज इनकार कर चुके हैं

4 अक्टूबर को भीमा-कोरेगांव केस में गौतम नवलखा को गिरफ्तारी से अंतरिम राहत मिल गई है. अगर सुप्रीम कोर्ट से उनके हक़ में फैसला नहीं आता, तो पुणे पुलिस उन्हें जेल ले जाती. लेकिन उनकी याचिका पर आए आदेश से ज़्यादा सुप्रीम कोर्ट में बीते 1 हफ्ते में हुए घटनाक्रम की चर्चा है. दरअसल, सुप्रीम कोर्ट के पांच जजों ने बीते 1 हफ्ते के अंदर खुद को इस मामले की सुनवाई से अलग किया है. चीफ जस्टिस रंजन गोगोई के अलावा जस्टिस एन.वी. रमन्ना, जस्टिस आर. सुभाष रेड्डी, जस्टिस बी.आर गवई और जस्टिस रविंद्र भट्ट खुद को इस मामले से अलग कर चुके हैं.

गौतम नवलखा.
गौतम नवलखा.

सबसे पहले 30 सितंबर यानी सोमवार के दिन चीफ जस्टिस ने खुद को इस मामले से अलग कर लिया था. इसके बाद यह मामला जस्टिस एन.वी. रमन्ना, जस्टिस आर. सुभाष रेड्डी, जस्टिस बी.आर गवई की बेंच के सामने पेश हुआ. पहले जस्टिस गवई ने खुद को मामले की सुनवाई से अलग किया. फिर शाम तक ख़बर आई कि बाकी दोनों जजों ने भी खुद को सुनवाई से अलग कर लिया है.

(बाएं से दाएं) चीफ जस्टिस रंजन गोगोई, जस्टिस रमन्ना, जस्टिस आर सुभाष रेड्डी और जस्टिस बीआर गवई ने गौतम नवलखा केस से खुद को अलग कर लिया है.
(बाएं से दाएं) चीफ जस्टिस रंजन गोगोई, जस्टिस रमन्ना, जस्टिस आर सुभाष रेड्डी और जस्टिस बीआर गवई ने गौतम नवलखा केस से खुद को अलग कर लिया है.

तीसरी बार यह मामला जस्टिस अरुण मिश्रा, जस्टिस विनीत सरन और जस्टिस रविंद्र भट्ट की बेंच के सामने लिस्ट हुआ. इस बार जस्टिस रविंद्र भट्ट ने इस मामले की सुनवाई से खुद को अलग कर लिया. यानी कुल 4 दिन में 5 जजों ने मामले की सुनवाई से खुद को अलग किया है.

बॉम्बे हाई कोर्ट ने नवलखा पर हुई FIR खारिज नहीं की है.
बॉम्बे हाई कोर्ट ने नवलखा पर हुई FIR खारिज नहीं की है.

गौतम नवलखा को 13 सितंबर को बॉम्बे हाई कोर्ट ने गिरफ्तारी से 3 हफ्ते की अंतरिम राहत दी थी. ये राहत 4 अक्टूबर को ख़त्म हो रही थी. हाई कोर्ट के फैसले के खिलाफ पुणे पुलिस ने 16 सितंबर को याचिका दायर की थी. जब इस मामले की सुनवाई से हफ्ते के शुरूआती 4 दिनों में 5 जजों ने खुद को अलग कर लिया, तो नवलखा की ओर इस मामले पर 4 अक्टूबर से पहले सुनवाई करने की दलील दी गई. जिसे सुप्रीम कोर्ट ने स्वीकारा था. 4 अक्टूबर को जस्टिस अरुण मिश्रा और जस्टिस दीपक गुप्ता की बेंच ने नवलखा को 15 अक्टूबर तक गिरफ्तारी से अंतरिम राहत दी है.

गौतम नवलखा का केस क्या है?

पुणे पुलिस गौतम नवलखा को 1 जनवरी, 2018 के बाद कुछ दिनों तक भीमा-कोरेगांव में चली हिंसात्मक घटनाओं के लिए जिम्मेदार बताती है. 31 दिसंबर 2017 को पुणे में यलगार परिषद की बैठक हुई. पुलिस का आरोप है कि यलगार परिषद की बैठक में दिए भाषणों के चलते यह हिंसा हुई थी.

भीमा-कोरेगांव की हिंसा के बाद प्रदर्शन करते दलित
भीमा-कोरेगांव की हिंसा के बाद प्रदर्शन करते दलित

गौतम नवलखा के साथ-साथ 4 और लोगों को इसी मामले में अभियुक्त बनाया गया है. ये हैं मानवाधिकार कार्यकर्ता और नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी में विजिटिंग प्रोफेसर रहीं सुधा भारद्वाज, सामाजिक कार्यकर्ता और प्रोफेसर रहे वरनन गोंज़ाल्विस, मार्क्सवादी आलोचक वरवर राव और वकील अरुण फरेरा. बाकी चारों फिलहाल हिरासत में हैं.

सुधा भारद्वाज ने छत्तीसगढ़ में मानवाधिकार पर लंबे अरसे से काम किया है.
सुधा भारद्वाज ने छत्तीसगढ़ में मानवाधिकार पर लंबे अरसे से काम किया है.

नवलखा पर UAPA लगा हुआ है. इसके अलावा उन पर इंडियन पीनल कोड की धारा 121, 121a और धारा 124 के तहत मामला चल रहा है. इन धाराओं को सरल भाषा में बताएं तो यह हैं
– देश के खिलाफ जंग की तैयारी करना
– देश के खिलाफ षड्यंत्र रचना
– राजद्रोह.

यलगार परिषद और भीमा-कोरेगांव में हुई हिंसा की जांच पुणे पुलिस कर रही है. मामला लोअर कोर्ट में चल रहा है. नवलखा ने बॉम्बे हाई कोर्ट में उनके ख़िलाफ हुई FIR रद्द करने की याचिका दायर की थी. वहीं पुणे पुलिस साबित करने में लगी रही कि नवलखा के प्रतिबंधित नक्सली संगठनों के साथ लिंक हैं. और नवलखा के बहुत गहरे तरीके से इसमें शामिल होने के सबूत पुणे पुलिस के पास हैं. जब बॉम्बे हाई कोर्ट में इस मामले पर सुनवाई हुई तो कोर्ट ने कहा कि

पुलिस की ओर से जमा किए साक्ष्य देख प्रथम दृष्टया ऐसा लगता है किस मामले की जांच होनी चाहिए. हालांकि यह सब प्रथम दृष्टया है, इसलिए इससे ट्रायल कोर्ट के फैसले में कोई बदलाव नहीं आना चाहिए.

इसके साथ ही बॉम्बे हाई कोर्ट ने नवलखा को 3 हफ्ते की गिरफ्तारी से अंतरिम राहत दी थी. 16 सितंबर को महाराष्ट्र सरकार ने हाई कोर्ट के फैसले के ख़िलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की. वहीं गौतम नवलखा की ओर से मांग की गई कि उनके खिलाफ दायर FIR खारिज हो. सुप्रीम कोर्ट ने उनके खिलाफ दायर FIR खारिज करने से इंकार कर दिया. गौतम नवलखा की ओर से पेश हुए सीनियर एडवोकेट अभिषेक मनु सिंघवी ने सुप्रीम कोर्ट की बेंच से कहा-

गौतम नवलखा सामाजिक कार्यकर्ता हैं और प्रसिद्ध पत्रकार हैं. जस्टिस मिश्रा ने सिंघवी से पूछा कि नवलखा माओवादियों की मदद क्यों कर रहे थे? तो सिंघवी का जवाब था कि वो (नवलखा) PUDR के सदस्य हैं. और किसी भी प्रतिबंधित संगठन के सदस्य नहीं हैं. सिंघवी ने यह भी दावा किया कि नवलखा हमेशा से ही हिंसा का विरोध करते रहे हैं.

नवलखा को अंतरिम राहत तो मिली है. लेकिन बड़ा सवाल ये कि आखिर क्यों इस मामले में देश की सबसे बड़ी अदालत के पांच जजों ने खुद को अलग कर लिया. वो भी बिना कोई कारण दिए. बिना कोई कारण दिए मामले से खुद को अलग करने के बारे में बहस पुरानी है. साल 2015 में नेशनल ज्यूडिशल अप्वाइंटमेंट्स कमिशन एक्ट (NJAC Act) को असंवैधानिक करार देने वाली सुप्रीम कोर्ट की बैंच में रहे जस्टिस कुरियन जोसेफ ने लिखा था कि

ऐसा संस्थान होना, जिसका हॉलमार्क ही पारदर्शिता है, उसमें ठीक यही होगा कि जज अपनी अहम कर्तव्यों का निर्वहन करें और कम से कम किसी मामले से अलग होने पर मोटा-माटी कारण बता दें. ताकि याचिकाकर्ता और सूझ-बूझ वाले नागरिकों को किसी भी तरह की गलतफहमी ना हो कि कार्रवाई से खुद को अलग करने के कारण अप्रासंगिक नहीं है. यह संवैधानिक जिम्मेदारी भी है. पारदर्शी और जिम्मेदार बने रहने की शपथ ली हुई है. किसी जज को मामला छोड़ने के लिए उसके कारण बताने चाहिए.

जस्टिस कुरियन जोसेफ.
जस्टिस कुरियन जोसेफ.

जज अक्सर ऐसे मामलों को छोड़ देते हैं, जहां पर हितों के टकराव की बात सामने आती है. और हितों के ऐसे टकराव का मतलब है जो किसी भी तरह के पक्षपात या पूर्वाग्रह को जन्म देता हो. NJAC Act के मामले में ही सुप्रीम कोर्ट के जज रहे जस्टिस मदन बी लोकुर ने कहा था

किसी मामले की सुनवाई से हटना उतना आसान नहीं है, जितना दिखता है. जो सवाल खड़े होते हैं, वो काफी महत्वपूर्ण होते हैं और ऐसा लग रहा है कि ऐसे मामले बढ़ रहे हैं. इसलिए वक्त आ गया है कि कुछ ठोस और प्रक्रियात्मक नियम इस बारे में बनाए जाएं. अगर सही कानून बनते हैं तो यह उस बेंच के बाकी जजों को होने वाली शर्मिंदगी से बचा सकता है.

जस्टिस मदन बी लोकुर.
जस्टिस मदन बी लोकुर.

गौतम नवलखा के केस में अलग होने वाले पांच जजों में से किसी ने भी नहीं बताया कि वह क्यों हट रहे हैं. ऐसे में इस मामले से जुड़ी कई बातें हवा में तैरने लगी हैं. जिन्हें अफवाहें फैलनी लगी हैं. अब सुप्रीम कोर्ट के बारे में अफवाह फैले तो यह आम जन के कानून पर विश्वास और पारदर्शिता को ठेस पहुंचाता है.


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