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पूर्वोत्तर के तीन राज्यों में किसका क्या दांव पर लगा है?

चुनाव आयोग ने पूर्वोत्तर के तीन राज्यों त्रिपुरा, नागालैंड और मेघालय में चुनाव की घोषणा कर दी है. 18 फरवरी को त्रिपुरा में वोटिंग होगी और 27 फरवरी को नागालैंड और मेघालय में. तीनों राज्यों में वोटों की गिनती एकसाथ 3 मार्च को की जाएगी.

जिस तरह हम आठ विविध राज्यों को ‘पूर्वोत्तर’ में गूंथ कर एक कर देते हैं, वैसे ही पूर्वोत्तर में लोग बाकी 21 राज्यों को ‘मेनलैंड’ में गूंथ देते हैं. दोनों में एक अबोला रहता है. लेकिन इधर कुछ दिनों से मेनलैंड की राजनीति ‘चिकन्स नेक’ के रास्ते पूर्वोत्तर में घुसने की भरसक कोशिश में है. तो यहां की राजनीति पुरानी लीक छोड़ रही है. इसलिए इस साल के चुनाव दिलचस्प होंगे. पूर्वोत्तर के लिए भी, मेनलैंड के लिए भी. लल्लनटॉप आपको बताएगा कि पूर्वोत्तर में किसका क्या दांव पर लगा है और वो कौन होंगे जिनपर सबकी नज़र रहेगी.

1. भारतीय जनता पार्टी – चुंबक

देश के दो हिस्से जहां भाजपा ऐतिहासिक रूप से कमज़ोर रही है, वो हैं दक्षिण और पूर्वोत्तर. दक्षिण में जातीय गौरव के लॉजिक ने हिंदुत्व को जड़ जमाने नहीं दी. लेकिन पूर्वोत्तर में संघ की दशकों से चल रही सतत मेहनत का फायदा भाजपा को मिलना शुरू हो गया है. असम में भाजपा एक मज़बूत गठबंधन वाली सरकार चला रही है.

पीएम मोदी के साथ असम के मुख्यमंत्री सोनोवाल. असम पूर्वोत्तर में भाजपा का बेस कैंप है.
पीएम मोदी के साथ असम के मुख्यमंत्री सोनोवाल. असम पूर्वोत्तर में भाजपा का बेस कैंप है.

जहां चुनाव न जीते जा सके, या कोई कसर रह गई, वहां भाजपा ऐसे मज़बूत चुंबक के रूप में तब्दील हुई है जो हर तरफ से, हर झंडे का विधायक अपनी ओर खींच रही है. 2016 में भाजपा ने NDA का पूर्वोत्तर संस्करण लॉन्च किया – NEDA – नॉर्थ ईस्ट डेमोक्रैटिक अलायंस. इसके तहत वो पूर्वोत्त में गैर कांग्रेसी पार्टियों को जमा कर रही है. सिक्किम में पवन चामलिंग की एसडीएफ सरकार NEDA का हिस्सा है.

अरुणाचल प्रदेश में भाजपा चुनाव हारी लेकिन फिर एक रात पूरी सरकार चुपचाप भाजपा में शामिल हो गई. मणिपुर में भी भाजपा ने बहुमत ऐसे ही हासिल किया. नागलैंड में भी भाजपा का स्कोर 1 से चार ऐसी ही पहुंचा. फिलहाल नागालैंड में भाजपा सरकार के साथ ही बैठती है.

पेमा खांडू. अरुणाचल प्रदेश के सीएम. पहले कांग्रेस में थे, अब भाजपा में हैं.
पेमा खांडू. अरुणाचल प्रदेश के सीएम. पहले कांग्रेस में थे, अब भाजपा में हैं.

ये मोमेंटम यदि बना रहे, तो भाजपा के पास इन तीन राज्यों में जीतने और जीतने को ही है.

नागालैंड

केंद्र से मदद का भरोसा दिलाकर भाजपा नागालैंड में अपना स्कोर ऊपर ले जा सकती है. नागालैंड में एनसीपी के एक विधायक को छोड़ दें तो कोई राजनैतिक पार्टी विपक्ष में नहीं है. आठ और विधायक निर्दलीय हैं. ये बात भी भाजपा के पक्ष में ही जाती है. अगर पिछले चुनावों की तरह इस बार बड़ी संख्या में निर्दलीय जीते तो चुनाव बाद भी भाजपा के पास ‘बढ़ने’ के मौके हैं. नागा पीपल्स फ्रंट की आपसी लड़ाई का फायदा भी भाजपा को मिल सकता है. नागालैंड के सीएम रहे नेफ्यू रियो के तो भाजपा में जाने की बातें भी होने लगी हैं.

भाजपा के सामने बस एक रुकावट है. भाजपा अखंड भारत और हिंदुत्व की राजनीति करती है. दूसरी तरफ नागालैंड में बड़ी आबादी ईसाई है और वहां ‘आत्मनिर्णय’ के लिए दुनिया का सबसे पुराना विद्रोह आज भी चल रहा है. केंद्र की भाजपा सरकार विरोधी गुटों से बातचीत कर रही है लेकिन वो उसे एनएससीएन (इसाक मुइवा) से आगे नहीं ले जा पाई है.

नागालैंड के सीएम रहे नेफियू रियो भाजपा में शामिल हो सकते हैं.
नागालैंड के सीएम रहे नेफियू रियो भाजपा में शामिल हो सकते हैं.

मेघालय –

हमारे मानस में मेघालय की पहचान पीए संगमा से ऐसी जुड़ी है कि मेघालय के हालिया सीएम मुकुल संगमा उनके रिश्तेदार समझ लिए जाते हैं. जबकि इन दोनों के बीच कोई रिश्ता नहीं है. फिलहाल भाजपा के पास सिर्फ दो विधायक हैं. लेकिन राज्य की प्रमुख विपक्षी पार्टी युनाइटेड डेमोक्रैटिक पार्टी समेत दो और क्षेत्रिय दल (नेशनल पीपल्स पार्टी और हिल स्टेट पीपल्स डेमोक्रैटिक पार्टी) एनडीए का हिस्सा हैं.

पूर्वोत्तर में सबसे ज़्यादा उम्मीदें भाजपा को मेघालय से ही हैं और वो यहीं सबसे ज़्यादा ज़ोर भी मार रही है. भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह शिलॉन्ग जाकर पार्टी ऑफिस का फीता काट आए हैं और गारो हिल्स में एक सभा भी कर चुके हैं. पार्टी लगातार हालिया विधायकों को अपने पाले में लाने की कोशिश कर रही है जिसकी खबरें रोज़ अखबार छाप रहे हैं. अगर मुकुल संगमा की कांग्रेस सरकार गिरी, तो जीतने वाले गटबंधन में भाजपा का होना तय है. नागालैंड की तरह यहां भी निर्दलीय विधायक बहुत हैं (अनुपात में). यहां भी भाजपा के लिए मौका है.

भाजपा का शिलॉन्ग में कार्यकर्ता सम्मेलन (2015). पार्टी मेघालय में पूरा ज़ोर लगा रही है, बहुत लंबे समय से.
भाजपा का शिलॉन्ग में कार्यकर्ता सम्मेलन (2015). पार्टी मेघालय में पूरा ज़ोर लगा रही है, बहुत लंबे समय से.

त्रिपुरा –

त्रिपुरा में सरकार सीपीआई की है, लेकिन वो इस चुनाव में राज्य की दूसरी विपक्षी पार्टियों का पत्ता साफ करने पर ज़्यादा ज़ोर देने वाली है. कांग्रेस के जो छह विधायक पार्टी छोड़कर तृणमूल में गए थे, वो अब भाजपा में है. मार्च 2017 में तृणमूल के भी 400 नेताओं ने एकसाथ पार्टी छोड़कर भाजपा जॉइन की. और भाजपा जोड़तोड़ भर नहीं कर रही है. चुनावों में उसकी मेहनत का असर दिखने लगा है. त्रिपुरा ट्राइबल एरिया ऑटोनॉमस डिस्ट्रिक्ट काउंसिल के लिए हुए. इसमें भाजपा पांच सीटों पर दूसरे नंबर पर रही. कांग्रेस से आगे. इन चुनावों में भाजपा 8 फीसदी वोट लाई और दो दशक में पहली बार लेफ्ट का वोट शेयर 50 फीसदी से नीचे आया. प्रतापगढ़ और सुरमा विधानसभा सीटों पर उपचुनावों में भी भाजपा दूसरे नंबर पर रही है.

एक और बात है जो भाजपा के पक्ष में जाती है. वो ये कि त्रिपुरा की करीब 35 लाख की आबादी का लगभग एक तिहाई (यानी 12 से 13 लाख लोग) नाथ संप्रदाय को मानने वाला है. नाथ संप्रदाय यानी वो संप्रदाय जिसके मुखिया इस वक्त यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ हैं. बीजेपी को उम्मीद है कि योगी जी इस बार उनके काम आएंगे. भाजपा हर चुनाव पूरी ताकत से, पूरे संसाधनों के साथ लड़ती है. तो अगर तृणमूल और कांग्रेस आपसी लड़ाई में फंसे रहते हैं तो भाजपा त्रिपुरा में दूसरे नंबर पर काबिज़ हो जाएगी. रही बात लेफ्ट को नुकसान पहुंचाने की, तो वो इस बार जितना हो सका, वो भाजपा के लिए बोनस की तरह होगा. क्योंकि भाजपा ये चुनाव सीएम पद के लड़ नहीं रही है.

त्रिपुरा के मुख्यमंत्री मानिक सरकार राज्य में खासे लोकप्रिय हैं.
त्रिपुरा के मुख्यमंत्री मानिक सरकार राज्य में खासे लोकप्रिय हैं.

कांग्रेस – डूबता जहाज़

कांग्रेस फिलहाल सिर्फ कर्नाटक, मेघालय, पॉन्डिचेरी और पंजाब में सरकार चला रही है. तो इन चुनावों में उसका सबसे बड़ा डर यही है कि उसका एक और विकेट न गिर जाए. पूर्वोत्तर में भाजपा जहां भी और जितना भी बढ़ी है, उसका सीधा नुकसान कांग्रेस ने ही उठाया है. उसके काडर से लेकर नेताओं और नेताओं से लेकर विधायकों ने पार्टी छोड़कर उसके चिर प्रतिद्वंद्वी भाजपा को चुना है.

नागालैंड – फिलहाल कांग्रेस के पास राज्य में एक भी विधायक नहीं है. न पार्टी के पास किसी तरह का मोमेंटम ही है.

मेघालय – ये पूर्वोत्तर में कांग्रेस का आखिरी गढ़ है. अरुणाचल में कांग्रेस सत्ता से जिस तरह बाहर हुई है, उसका दोहराव वो यहां नहीं चाहती. भाजपा की उठापटक का राज्य में मिला-जुला असर रहा है. कांग्रेस के पांच विधायक टूटकर नेशनल पीपल्स पार्टी में गए, उसके कुछ ही दिन बाद एनसीपी के मारथॉन संगमा और चार निर्दलीय विधायकों ने ऐलान कर दिया कि वो कांग्रेस जॉइन करेंगे. राज्य में ईसाई बड़ी संख्या में हैं. इसका भी फायदा कांग्रेस को मिल सकता है. कांग्रेस की प्राथमिकत इस बार यही है कि जो बचाया जा सके, बचा लिया जाए. क्योंकि बाकी सारी पार्टियां उसी को टारगेट कर रही हैं.

मुकुल संगमा. पूर्वोत्तर में कांग्रेस के इकलौते सीएम.
मुकुल संगमा. पूर्वोत्तर में कांग्रेस के इकलौते सीएम.

त्रिपुरा – त्रिपुरा में कांग्रेस पिछले चुनावों में दूसरे नंबर पर थी – अकेली पार्टी जो लेफ्ट की आंधी में कोई विधायक जिता पाई. लेकिन उसके बाद से कांग्रेस को बस नुकसान ही हुआ है. उसका काडर टूट कर तृणमूल से भी मिला है और भाजपा से भी. उपचुनावों में वो तीसरे नंबर पर रही है. लेकिन दिसंबर में मुजीबुर इस्लाम के साथ 1000 पार्टी वर्कर तृणमूल छोड़कर वापस कांग्रेस में शामिल हुए. त्रिपुरा में कांग्रेस भी वही करना चाहती है जो भाजपा करना चाहती है – लेफ्ट नहीं तो कौन? इस सवाल का जवाब बनना.

क्षेत्रिय दल – क्या करें क्या न करें

पूर्वोत्तर में जातीय स्वाभिमान की भावना बहुत मज़बूत है. इसलिए यहां क्षेत्रिय दल काफी हैं. लेकिन यहां विधायक बड़ी तेज़ी से पार्टियां बदलते हैं. इसलिए कोई ऐसी पार्टी नहीं है जिसके पास अपना भरोसेमंद काडर हो जो चुनाव दर चुनाव बना रहे. जिन तीन राज्यों में चुनाव हैं उनमें राजनीति करने वाले तमाम दलों में सिर्फ नागा पीपल्स फ्रंट ऐसा है, जो अपने दम पर चुनाव लड़कर सरकार में सीनियर पार्टी बन सके, वो भी तब, जब पिछली बार के नतीजे खुद को दोहराएं. बाकी दलों के पास दो रास्ते हैं – पहला है भाजपा के साथ जाने का. NEDA में शामिल दलों ने यही किया है. लेकिन भाजपा वो पार्टी है जो समय बीतने के साथ दूसरे दलों को खुद में मिला लेने में, या दौड़ से बाहर कर देने में विश्वास रखती है. दूसरा रास्ता है कांग्रेस के साथ रहना. यहां उनकी पहचान बने रहने की संभावना है, लेकिन चुनाव जीतने की नहीं.


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