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नन्हे बच्चों को जान लेना सिखा रही है ये किताब

आप अपने 7-8 साल के बच्चे को एक बिल्ली का खून करते देख पाएंगे? आप ऐसा सोच भी नहीं सकते. लेकिन दिल्ली के स्कूल में क्लास 4 के बच्चों को बिल्ली मारना सिखाया जा रहा है. आप स्कूलों में अपने बच्चों को कितने भरोसे से भेजते हैं कि वो वहां जाकर बेहतर जिंदगी जीने के गुर और ढेर सारा ज्ञान सीखकर आएंगे. लेकिन इन किताबों ने आपके मासूम दिल बच्चों को कच्ची उमर में ही खूंखार बना देने की पूरी तैयारी कर रखी है.

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फोटो- ट्विटर, @Priya_Menon

क्लास 4 के बच्चों को इन्वायरमेंट साइंस पढ़ाने के लिए एक किताब लाई गई है. किताब का नाम है ‘Our Green World’. पब्लिशर हैं- PP पब्लिकेशन्स. किताब के एक चैप्टर में सजीव और निर्जीव वस्तुओं में फर्क करना बताया जा रहा है. और ये फर्क देखने के लिए एक बिल्ली को मारना सिखाया जा रहा है. पूरे प्रयोग को सिखाने के लिए बाकायदा इलस्ट्रेशन भी बनाए गए हैं.

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फोटो- ट्विटर, @Priya_Menon

किताब अंग्रेजी में है. उसमें लिखा है,

कोई भी सजीव चीज बिना हवा के कुछ मिनट ही जिंदा रह सकती है. आप एक प्रयोग कर सकते हैं. दो लकड़ी के डिब्बे लीजिए. एक डिब्बे के ढक्कन पर कई छेद कर दीजिए. दोनों डिब्बों में एक-एक बिल्ली का बच्चा रख दीजिए. और डिब्बों को बंद कर दीजिए. कुछ देर बाद डिब्बा खोलकर देखिए. क्या दिखता है? बिना छेद वाले डिब्बे में रखी हुई बिल्ली मर गई है. 

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फोटो- ट्विटर, @Priya_Menon

कितना कोल्ड-ब्लडेड तरीके से बताया गया है ये पूरा प्रयोग. मतलब कितने आराम से बोल दिया कि बिल्ली मर चुकी है. क्या सिखाना चाह रहे आप बच्चों को. यही कि हम इंसान सबसे ज्यादा ताकतवर है. और ये चूहे-बिल्ली, जानवर, इनके साथ तो हम कुछ भी कर सकते हैं. उनको एक छोटे से काम के लिए मार भी सकते हैं. क्योंकि उनकी जान की तो कोई क़ीमत ही नहीं.

अब आप प्लीज ये कुतर्क मत दीजिएगा कि जब मीट के लिए मुर्गों, बकरों को मार दिया जाता है तब आप क्यों नहीं बोलते. मैं एक शाकाहारी हूं और नॉनवेज खाने की हिम्मत नहीं कर पाती क्योंकि उन लजीज कहे जाने वाले खानों को देखते ही मेरा दिमाग में वो निरीह जानवर आ जाता है जिसके गोश्त से वो व्यंजन बना है. और ये मेरी नितांत व्यक्तिगत राय है. लेकिन मेरे नॉनवेजेटिरियन दोस्तों का मत अगर यहां रखूं तो एक फूड-चेन के तहत कुछ जानवरों का कंजम्पशन किया जाता है. वो उसे मारते हैं ताकि उससे कुछ बनाकर खा सकें. और जब तक फूड कंजम्पशन का पिरामिड संतुलित है तब तक सही है.
लेकिन यहां पर सिर्फ एक प्रयोग के लिए बिल्लियों को मारना सिखाया जा रहा. प्रयोग भी ऐसा साधारण जिसमें बिना किसी को नुकसान पहुंचाकर बच्चों को सजीव-निर्जीव चीजों में फर्क करना सिखाया जा सकता है. जब मैं स्कूल में थी और ये चैप्टर आया तो हमें एक पौधे को हवा, पानी, धूप देकर हरा-भरा रखना वाला प्रयोग करना सिखाया गया था. हमें पौधे को जिंदा रखना सिखाया गया था. न कि उसे मार देना. और हमें भी सजीव- निर्जीव चीजों में फर्क करना बखूबी आ गया था.
बच्चों को सिखाने का ये क्या तरीका हुआ कि किसी को मार ही दो. और फिर उस बिल्ली को मारकर आप उसे फेंक ही देंगे. कोई इस्तेमाल तो होगा नहीं. जैसा कि मुर्गा-बकरी मारकर उसका खाना बनाने में होता है.
सिर्फ एक प्रयोग के लिए बिल्ली को मार देना क्रूरता  है. तमाम वैज्ञानिक जो जानवरों पर शैंपू, केमिकल्स, दवाइयों की टेस्टिंग का विरोध करते हैं और खुद भी ऐसा करते हैं, वो जरूरी नहीं कि खुद शाकाहारी हों सिर्फ इसलिए विरोध करते हैं. आपको समझना होगा कि किसी जानवर के कंजम्पशन और उसके साथ क्रूरता में फर्क है. मैंने अपने एक और आर्टिकल में डेनमार्क के ज़ू में होने वाले जानवरों के डाइसेक्शन के बारे में बताया था. जानवरों को सिर्फ इसलिए मार देना कि ज़ू वाले एक ही बाड़े के जानवरों में ब्रीडिंग नहीं होना देना चाहते, किस हद तक सही है.

लोगों ने इस किताब और इसके पब्लिशर्स के खिलाफ फेडरेशन ऑफ इंडियन एनिमल प्रोटेक्शन ऑर्गनाइजेशन (FIAPO) में शिकायत की है. FIAPO ने एक्शने लेते हुए पब्लिशर्स से जवाब मांगा तो किताब के प्रकाशक PP पब्लिशर्स ने कहा कि वो इस किताब को सारे डिस्ट्रीब्यूटर्स से वापस मंगा लेंगे. और आगे से ऐसा कोई कंटेंच किताबों में न जाए, इसका पूरा ध्यान रखेंगे.

PP पब्लिकेशन्स का FIAPO को जवाबी खत
PP पब्लिकेशन्स का FIAPO को जवाबी खत

कुचल के मारा, जलाया, फिर लाश को जानवरों को खिला दिया

 

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