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सुकमा हमले के बाद आए नक्सली का बयान समझ में आया? आओ समझाते हैं.

बात तब की है जब पिछली सदी का आठवां दशक अधेड़ हो चुका था. आजादी के बाद देश में सबसे बड़ी राजनीतिक उथल-पुथल बुनी जा रही थी. 7 जून 1974 को जयप्रकाश नारायण ने छात्रों से इंदिरा गांधी की फासीवादी सरकार के खिलाफ संपूर्ण क्रांति करने का आह्वान किया था. ये जेपी का करिश्माई व्यक्तित्व ही था कि हजारों छात्र अपनी पढ़ाई छोड़ कर देश बदलने के लिए सड़कों पर उतर गए थे.

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एक सीनियर पत्रकार उस दौर का रोचक किस्सा सुनाते हैं. वो छात्रों की एक सभा कवर करने के लिए गए थे. वहां पर एक उभरते हुए छात्रनेता भाषण के नाम पर आग उगल रहे थे. फासीवादी इंदिरा के खिलाफ क्रांति लाने के लिए युवाओं को आखरी लड़ाई के लिए कमर कसने की नसीयत दे रहे थे. जब वो मंच से उतरे तो उनसे सवाल पूछा गया कि ये फासीवादी शासन क्या होता है? उनका जवाब था, “ऐसा शासन आएगा जिसमें विरोध करने वाले को फांसी दे दी जाएगी.”

एक संभावना यह भी है कि यह महज लतीफा हो. लेकिन चिंतागुफा में हुआ नक्सली हमला इस दौर की खुरदरी सच्चाई है. उतना ही खुरदरा है नक्सली प्रवक्ता विकल्प का बयान. यह बयान खबर लिखने के लिए ठीक-ठाक मसाला दे देता है लेकिन क्या कोई आम आदमी इस बयान को आसानी से समझ सकता है? जवाब है नहीं. तो हम आपके लिए इस बयान के कुछ शब्दों को डिकोड कर देते हैं ताकि आप कम से कम इसे समझ तो सकें.

फासीवाद

फासीवाद टर्म निकला है इटेलियन शब्द फसिस्को से. इनका माने होता है लकड़ियों का बंडल. वही बंडल जिसके बारे में बचपन में किसान और उसके बेटों वाली कहानी में सुने थे. लेकिन मतलब को छोड़ दो तो असली मामला यह है कि इटली का एक तानाशाह था, मुसोलिनी. मुसोलिनी ने अपनी पार्टी का नाम रखा था नेशनल फासिस्ट पार्टी. परिभाषा-वरिभाषा छोड़ो, बस सीधा सा मतलब समझो. इसका मतलब हुआ तानशाही वाली राजनीति. जिसमें किसी एक समुदाय, धर्म, नस्ल या किसी भी पहचान को दूसरे से बेहतर बता कर उसे पीड़ित करना शुरू किया जाए.

इस शब्द को असली पहचान दिलाई हिटलर ने. जर्मनी में उसने शुद्ध आर्य नस्ल को सबसे बेहतर बता कर लाखों यहूदियों का कत्लेआम मचाया था. दूसरे विश्वयुद्ध के बाद राजनीति की डिक्शनरी में यह शब्द गाली की तरह इस्तेमाल होने लगा.

 कार्यनीतिक प्रत्याक्रमण हमले

यह शब्द सुन कर अच्छे-अच्छों के कान सुन्न हो जाते हैं. यह असल में यह टैक्टिकल काउंटर ऑफेंसिव कैम्पेन का भौंडा अनुवाद है. हर साल अप्रैल से जुलाई तक माओवादी बड़ी प्लानिंग के साथ सुरक्षाबलों पर हमला करते हैं. इसे ही टैक्टिकल काउंटर ऑफेंसिव कैम्पेन या शॉर्ट  में TCOC कहते हैं.

ऐसा इसी समय क्यों होता है? हिंदी में समझाएं तो फागुन से सावन के बीच के समय को कहते हैं बसंत. यानी जंगल में तमाम किस्म की घास और झाड़ियाँ बढ़ने लगती हैं. इससे माओवादियों के लिए घात लगाना आसान हो जाता है. इसलिए हर साल माओवादी हिंसा की बड़ी वारदात इसी समय में होती है.

संघर्ष इलाके

माओवादी अपने इलाके को दो खांचो में बांटते हैं. पहला है आजाद इलाके. मतलब कि ऐसे क्षेत्र जहां उनका पूरा कब्ज़ा हो गया हो. जैसा सिनेमा में नहीं दिखाते हैं, “यहां से भारतीय सरकार की सीमा समाप्त होती है.” टाइप मामला. दूसरा है संघर्ष क्षेत्र. माने जहां पर माओवादी और सरकार के बीच लड़ाई चल रही है.

वर्ग दुश्मन

माओवादी बेसिकली मार्क्स के विचारों को मानते हैं. सामान्य तौर पर मार्क्स को मानने वाले लोग खुद को कम्युनिस्ट कहते हैं. बाबा मार्क्स कहते थे कि दुनियां में दो ही वर्ग हैं. पहला है अमीर और दूसरा है गरीब. अमीर लोग खुद कुछ करते नहीं, बस गरीब मजदूरों की मेहनत पर गुलछर्रे उड़ाते हैं. मार्क्स इसे ही पूंजीवाद कहते हैं. बाबा का कहना है कि जिस दिन गरीब जाग जाएगा वो मुट्ठी भर अमीरों से सत्ता छीन लेगा. इसे ही क्रांति कहा जाता है.

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मार्क्स बताते हैं कि दोनों वर्गों में हमेशा लड़ाई चलती रहती है. इसे ही वर्ग संघर्ष कहा जाता है. तो कम्युनिस्ट अमीरों या पूँजीपतियों जिन्हें बुर्जुआ भी कहा जाता है, उनके खिलाफ जंग छेड़े हुए हैं. क्योंकि जंग तो दुश्मन के खिलाफ होती है तो इनकी भाषा में शोषण करने वाले अमीर हुए वर्ग दुश्मन.

अब इस बयान को सुनो, शायद समझ में ही आ जाए

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