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आपके फेफड़ों के लिए अच्छी, पटाखे जलाने वालों के लिए बुरी खबर है

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दिवाली को महज ढाई महीने रह गए हैं. देश के सभी पटाखा प्रेमी बोरे भर पटाखे छुड़ाने की तैयारी कसे बैठे हैं. मगर देश की सबसे बड़ी कोर्ट से सोमवार को इन पटाखा प्रेमियों के लिए बुरी खबर आई है. धूम धड़ाके की इनकी तैयारियों पर पानी फिर सकता है. कपड़ा लत्ता तो ले आओगे, पर पटाखों का मजा पहले जैसा ना पाओगे. कुछ यही लब्बोलुआब है इस खबर का. दरअसल मसला ये है कि सुप्रीम कोर्ट ने पटाखों से उन 5 केमिकल्स को हटाने का आदेश दे दिया है जो पर्यावरण के लिए खतरनाक हैं. मसलन लीथियम, पारा, आर्सेनिक, एंटीमोनी और सीसा का प्रयोग अब पटाखों में नहीं होगा.

कोर्ट का कहना है कि इनसे बहुत वायु प्रदूषण होता है. ऐसे में इन पर पाबंदी लगाना जरूरी है. पर्यावरण की चिंता तो ठीक है, हम सबको करनी चाहिए, पर हिंदुस्तान में एक बड़ा वर्ग ऐसा है जिसके लिए पटाखा बिन दिवाली सून है. वे आशंकित हो सकते हैं कि पटाखे में अब ना पहले जैसा रंग रहेगा ना पहले जैसी आवाज…मगर ऐसा नहीं है. जो असर होगा वो कुछ इस प्रकार है:

लीथियम: ये लाल रंग कब मुझे छोड़ेगा…छोड़ दिया समझो. राजेश खन्ना को छोड़ा कि नहीं पता नहीं ,पर पटाखों को लाल रंग जरूर छोड़ने वाला है. जी हां पटाखे फटने पर जो लाल रंग छा जाता था वो लीथियम की ही कृपा थी. पर अब यह गायब हो सकता है.

crackers 3

एंटीमोनी : पटाखे फटते हैं तो आंखें चौंधिया जाती हैं. अगर आप इंसान हैं तो आपकी भी हुई होंगी. मतलब ये चमक इसी बला एंटीमोनी का कमाल है. ये चमक भी कम हो सकती है.

सीसा : पड़ पड़पड़पड़पड़पड़पड़…पटाखों में ये तीखी आवाज सीसा यानी लेड की वजह से आती है. अब ये भी कुछ कम हो सकती है. बस इत्ती सी बात है. इसलिए पटाखा प्रेमियों को बहुत चिंता करने की जरूरत नहीं है. पटाखे बदस्तूर आप तक पहुंचेंगे. कुछ आवाज या रंग कम हो तो ऐ़डजस्ट कर लेना. माना कि मजा जरूरी है मगर सांस भी तो लेनी है. ऐसे में कोशिश करिएगा ईको फ्रेंडली पटाखे ही खरीदें और जमकर फोड़ें.

शिवकाशी
शिवकाशी में पटाखे बनाते कारीगर.

क्रैकर सिटी पर विशेष सख्ती

न्यायमूर्ति मदन बी लोकुर की अध्यक्षता वाली पीठ ने यह पाबंदी लगाई है. आदेश तब सुनाया गया जब केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के सदस्य सचिव ने शीर्ष अदालत को बताया कि पटाखे चलाने से होने वाले वायु प्रदूषण के मानक अब तक तय नहीं हुए हैं और यह काम 15 सितंबर तक पूरा होगा. पीठ ने कहा कि यह सुनिश्चित करना पेट्रोलियम एवं विस्फोटक सामग्री सुरक्षा संगठन की जिम्मेदारी है कि विशेषकर तमिलनाडु के शिवकाशी में आदेश का पालन हो. शिवकाशी पर विशेष नजर इसलिए क्योंकि यह देश का सबसे बड़ा पटाखा उत्पादन केंद्र है. 90 प्रतिशत से भी अधिक पटाखे का व्यापार यहां से किया जाता है इसलिए इसे क्रैकर सिटी के नाम से जाना जाता है. यहां वर्ष के लगभग 300 दिन पटाखों का निर्माण होता है और दीवाली की रात सिर्फ 4-5 घंटे में इसकी खपत हो जाती है. शिवकाशी में पटाखों का बिजनेस 1000 करोड़ से भी उपर का है.

पटाखों का इतिहास भी जान लीजिए

पटाखों के आविष्कार के बारे में कई कथाएं प्रचलित हैं. इनमें से एक है चीन थ्योरी. यानी पटाखों का आविष्कार एक दुर्घटना के कारण चीन में हुआ. खाना बनाते समय एक रसोइए ने गलती से पोटैशियम नाईट्रेट आग पर डाल दिया था. इससे उठने वाली लपटें रंगीन हो गईं, जिससे लोगों की उत्सुकता बढ़ी. फिर रसोइए के प्रधान ने साल्टपीटर के साथ कोयले व सल्फर का मिश्रण आग के हवाले कर दिया, जिससे काफी तेज़ आवाज़ के साथ रंगीन लपटें उठी. बस, यहीं से आतिशबाज़ी यानी पटाखों की शुरुआत हुई. वैसे पटाखों का पहला प्रमाण वर्ष 1040 में मिलता है, जब चीनियों ने इन तीन चीज़ों के साथ कुछ और रसायन मिलाते हुए कागज़ में लपेट कर फायर पिल बनाई थी.

चीन में सबसे पहले पटाखे की खोज हुई थी.
चीन में पटाखे की खोज एक हादसे में हुई थी.

यूरोप में पटाखों का चलन सबसे पहले वर्ष 158 में हुआ था. यहां सबसे पहले पटाखों का उत्पादन इटली ने किया था. जर्मनी के लोग युद्ध के मैदानों में इन बमों का इस्तेमाल करते थे. इंग्लैंड में इनका उपयोग समारोहों में किया जाता था. इस तरह से 14वीं शताब्दी के शुरू होते ही लगभग सभी देशों ने बम बनाने का काम शुरू कर दिया था. अमेरिका में इसकी शुरूआत 16वीं शताब्दी में मिलिट्री ने की थी. पटाखों की खोज की जानकारी पश्चिमी और यूरोपीय देशों तक 14वीं सदी में चीन की यात्रा पर आए माकरे पालो के सहयोग से पहुंची. अंग्रेज वैज्ञानिक रोजर बेकन ने आतिशबाजी के काले पाउडर का इस्तेमाल सैन्य हथियारों के लिए करने का अध्ययन किया. यह आतिशबाजी 1486 में इंग्लैंड में राजा हेनरी VII की शादी के दौरान पहुंची. हेनरी VIII के शासनकाल में विलियम शेक्सपीयर ने इसका उल्लेख किया है.

भारत में ऐसे हुई एंट्री

भारत में मुगल साम्राज्य से पहले पटाखों के साथ दिवाली मनाने का कोई प्रमाण नहीं है. उस दौर में दिवाली दीयों से मनाई जाती थी. गुजरात के कुछ इलाकों में छिटपुट जलने वाले पटाखे यूज होते थे. (1667 में औरंगजेब ने दिवाली पर सार्वजनिक रूप से दीयों और पटाखों के प्रयोग पर पाबंदी लगा दी थी.) मुगलों के बाद, अंग्रेजों ने एक्स्प्लोसिव एक्ट पारित किया. इसमें पटाखों के लिए इस्तेमाल होने वाले कच्चे माल को बेचने और पटाखे बनाने पर पाबंदी लगा दी गई.

अय्या नाडर
अय्या नादर के साथ शनगुमा नादर.

1923 में, अय्या नादर और शनमुगा नादर ने इस दिशा में पहला कदम रखा. दोनों काम की तलाश में कलकत्ता गए और एक माचिस की फैक्ट्री में काम करना शुरू किया. इसके बाद अपने घर शिवकाशी लौट आये. वहां पर माचिस फैक्ट्री की नींव डाली. शिवकाशी तमिलनाडु का इलाका है.पटाखों का निर्माण 1923 में 2 कारखानों से शुरू हुआ, 1942 में दो से तीन हुए और 2001 तो इन कारखानों की संख्या सिर्फ शिवकाशी में 450 तक पहुंच गयी. अब 800 से भी अधिक कारखाने सिर्फ शिवकाशी में हैं. और पूंजीवादियों ने इसे 2000 करोड़ की इंडस्ट्री बना दिया है.


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