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'मलंग' के चलते गोवा में शूट होने वाली मूवीज़ का बड़ा नुकसान हो गया!

मलंग. 07 फरवरी, 2020 को रिलीज़ हुई. उसी दिन हमने इस मूवी का रिव्यू भी कर दिया था. हमने ‘मलंग’ के मूवी रिव्यू में कुछ अच्छी बातें बताई हैं, कुछ बुरी. बुरी बातों में सबसे पहले जो चीज़ बताई गई वो है-

गोवा का स्टीरियोटाइप होना. गोवा का नाम सुनते ही हमारे दिमाग में सफेद लाइनें खिंचनी शुरू हो जाती हैं. वहां सिर्फ गांजा, ड्रग्स और सेक्स नहीं होता. आम लोग भी रहते हैं, जो हमें फिल्मों में कभी दिखे ही नहीं.

शायद यही बात गोवा के मुख्यमंत्री को भी लगी होगी. हम ऐसा कह रहे हैं, उनके बयान के चलते.

# क्या कहा गोवा के सीएम ने-

गोवा के सीएम प्रमोद सावंत ने कहा है-

हमारे राज्य की कानून व्यवस्था बहुत अच्छी है. फिल्म बनाने वालों का ध्यान सिर्फ इस बात पर ही क्यूं केन्द्रित रहना चाहिए कि गोवा, ड्रग्स और अन्य नशीली चीजों की जगह है? गोवा में फिल्म बनाने की परमिशन देने से पहले, अब हम कम से कम फिल्म की थीम तो देखेंगे ही. ताकि पता चले कि ये लोग अपनी फिल्म में गोवा के बारे में क्या दिखाने वाले हैं.

‘मलंग’ मूवी के बाद, गोवा में शूटिंग की अनुमति देने से पहले, गोवा की एंटरटेनमेंट सोसायटी मूवी की स्टोरी चेक करेगी. उन फिल्ममेकर्स को शूट की अनुमति नहीं दी जाएगी, जिनकी कहानियां राज्य की छवि को धूमिल कर रही होंगी. एंटरटेनमेंट सोसायटी से अनुमति मिलने के बाद ही ‘हम’ अनुमति देंगे.

‘हम’ मतलब गोवा की सरकार.

# गोवा की कई बार दिखाई गई है ऐसी छवि-

‘दम मारो दम’ के तो नाम में ही ड्रग्स है. इसकी स्टोरी के बैकड्रॉप में गोवा ही था. ऐसे ही 2018 में आई वेब सीरीज़ ‘स्मोक’ का तो थीम ही गोवा का ड्रग माफ़िया थी. यानी ऐसे कई कॉन्टेंट हैं जिनके नाम में ड्रग्स है और मूवी की शूटिंग गोवा में हुई है. साथ ही इसका उल्टा भी देखने को मिलता है. मतलब ‘गो गोवा गोन’ जैसी मूवीज़. जिनके नाम में गोवा है और स्क्रिप्ट में ड्रग्स एक मेन इश्यू.

ये तो वो मूवीज़ या वेब सीरीज़ हैं जिनमें गोवा और ड्रग्स दोनों ही मेन प्लॉट का हिस्सा थे. लेकिन कई और फ़िल्में हैं, कई और फ़िल्मी सीन्स हैं, जिनमें गोवा को ‘ड्रग्स हेवन’ की तरह दिखाया गया है.

लेकिन प्रमोद सावंत का ये कहना थोड़ा अतिशयोक्तिपूर्ण हो जाता है कि फिल्म बनाने वालों का ध्यान सिर्फ गोवा को ड्रग्स हेवन दिखाने पर ही केन्द्रित है. क्यूंकि ‘दृश्यम’ जैसी क्राइम थ्रिलर से लेकर ‘भूतनाथ’ जैसी बाल फिल्मों तक और ‘डियर ज़िंदगी’ जैसी दार्शनिक मूवीज़ से लेकर ‘बॉम्बे टू गोवा’ जैसी क्लासिक्स तक में गोवा का एक बेहतरीन रूप और वहां की बेहतरीन सिनेमैटोग्राफी देखने को मिलती है.

साथ ही गोवा ही नहीं, हिमाचल से लेकर मुंबई, पंजाब तक का ड्रग्स को लेकर स्टीरियोटाइप हुआ पड़ा है. ये गाना सुनिए-

[हालांकि इस गीत में दिखाया गोवा ही गया है. 😉 ]

# स्टीरियोटाइप के बारे में ये भी सच है कि, धुंआ उठा तो आग लगी होगी-

देखिए हर जागरूक इंसान को ‘स्टीरियोटाइप’ से दिक्कत होनी ही चाहिए. लेकिन ये भी तो है कि जब किसी चीज़, व्यक्ति, कॉन्सेप्ट या जगह को स्टीरियोटाइप किया जाता है, तो उनकी भी कुछ न कुछ तो ऐसी हिस्ट्री रहती ही है. वरना जब पहली बार गोवा को ‘ड्रग्स’ से, मुंबई को ‘स्लम’ से और दिल्ली को ‘पॉलिटिक्स’ से रिलेट किया गया होगा, तभी देखने वाले इसको नकार देते. और स्टीरियोटाइप बनते ही नहीं. और ये ‘स्टीरियोटाइप’ फिल्ममेकर्स के लिए एक शॉर्टकट न बन गया होता. होंगी गोवा में और भी चीज़ें, लेकिन सबसे प्रॉमिनेंट क्या है?

आगरा जाएंगे तो आगरा फोर्ट भी देखेंगे. लेकिन आप आगरा फोर्ट देखने नहीं ताजमहल देखने आगरा जाएंगे.

और ये भी तो देखिये कि दोस्तों का ग्रुप जब गोवा जाने का प्लान बनाता है तो उसकी विश लिस्ट में सबसे ऊपर क्या होता है ये किसी छिपा नहीं है. कहने का मतलब ये कि कुछ बात तो ऐसी होगी गोवा में कि उसे ‘ड्रग्स हेवन’ के तौर पर दिखाया जाता है. तो सीएम को भी फिल्मों की शूटिंग पर बैन लगाने से पहले राज्य की उस कानून व्यवस्था को अच्छे से जांच परख लेना चाहिए जिसे वो चाक-चौबंद कह रहे हैं.

# ‘उड़ता पंजाब’ से कितना अलग है ये इश्यू-

'उड़ता पंजाब' से पंजाब सरकार की काफी फजीहत हुई थी.
‘उड़ता पंजाब’ से पंजाब सरकार की काफी फजीहत हुई थी.

उड़ता पंजाब में भी ड्रग्स दिखाया गया था और उसे पंजाब से जोड़कर दिखाया गया था. उस फिल्म को तो रिलीज़ करवाने में ही फिल्ममेकर्स के पसीने छूट गए थे. लेकिन उस फिल्म में अंतिम संदेश ये था कि ड्रग्स बुरा है. जबकि यहां, मलंग में ड्रग्स की स्वीकृति बढ़ाई गई लगती है. मतलब ‘मलंग’ से ‘लाइफ एन्जॉय करना है तो ड्रग्स लो’, टाइप संदेश जाता है.

इसलिए ‘मलंग’ फिल्म से दिक्कत होना लाज़मी है,

# हमारा टेक-

सिंपल है. अगर प्रड्यूसर्स चाहें तो गोवा में शूटिंग किए बिना ही फिल्मों में गोवा की छवि बिगाड़ सकते हैं. काल्पनिक सेट्स से लेकर मॉरिशस जैसी लोकेशंस भी दर्शकों को गोवा कहकर परोसी जा सकती हैं. देखिए इस सुपरहिट गीत को, जिसकी शूटिंग पहले मेरे शहर नैनीताल में होनी थी-

तो किसी चीज़ पर बैन लगाना, किसी चीज़ को सेंसर करना केवल अस्थाई और सतही समाधान है. स्थाई समाधान है, दिक्कत को जड़ से समाप्त करना. यानी ड्रग्स हेवन को ड्रग्स हेल न भी बनाया जा सके तो भी कुछ ऐसे नियम कानून तो बनाए ही जा सकते हैं कि आइंदा गोवा का पर्यायवाची ड्रग्स न बने. साथ ही कानून बनाना ही नहीं उसको सही से लागू करने पर भी ज़ोर होना चाहिए.

लेकिन इस सब चीज़ों के बावज़ूद ‘मलंग’ जैसी मूवीज़ और उसके कंटेंट को कहीं से भी सही नहीं ठहराया जा सकता है.


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