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चंद्रमा पर पहुंचने वाला है चंद्रयान-2, कैसे करेगा काम?

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कल का दिन भारतीय स्पेस रीसर्च के लिए बड़ा दिन था. भारत से लांच होने के कुछ हफ़्तों बाद चंद्रयान-2 कल चंद्रमा की कक्षा में दाखिल हो गया. और अब 7 सितम्बर का दिन आएगा. अनुमान के अनुसार रात-बिरात चंद्रयान-2 चंद्रमा की सतह पर उतरेगा. और भारत का दूसरा मिशन चंद्रमा एक और चरण पार कर लेगा.

चंद्रयान को आंध्र प्रदेश के श्री हरिकोटा के सेंटर से 22 जुलाई को लॉन्च किया गया था. लॉन्चिंग के बाद चंद्रयान ने कई दिनों तक पृथ्वी की कक्षा के चक्कर लगाए थे. इस चक्कर लगाने में चंद्रयान की पृथ्वी की कक्षा से दूरी बढ़ती गयी और चंद्रयान चाँद के करीब होता गया. और आखिर में चंद्रयान ने 14 अगस्त को पृथ्वी की कक्षा छोड़ दी.

चंद्रयान की लॉन्चिंग (पीटीआई)
चंद्रयान की लॉन्चिंग (पीटीआई)

30 दिनों की यात्रा के बाद चंद्रयान-2 जब चांद की कक्षा में पहुंचने वाला था तो सबसे बड़ी चुनौती थी की चंद्रयान की स्पीड कितनी होगी. अगर चंद्रयान बहुत तेज़ गति से चांद की कक्षा के करीब पहुंचता, तो संभव था कि चंद्रमा चंद्रयान को उछाल देता और चंद्रयान वापिस अंतरिक्ष में जाकर कहीं खो जाता.

और वहीं अगर चंद्रयान कहीं बहुत धीमी गति से चंद्रमा की ओर बढ़ता तो चंद्रमा का गुरुत्वाकर्षण चंद्रयान को तेज़ी से अपनी ओर खींच लेता और चंद्रयान चंद्रमा की सतह से टकरा जाता. जिससे उसे नुकसान भी पहुंच सकता था. इसके लिए चंद्रयान की गति न तो बहुत तेज़ न बहुत धीमे होती. उसे एकदम सही गति से चंद्रमा की कक्षा में दाखिल करवाने में भारतीय स्पेस एजेंसी इसरो को सफलता मिली है.

चंद्रयान-2 के बारे में जानकारी देते इसरो के चेयरमैन के. सिवन (पीटीआई)
चंद्रयान-2 के बारे में जानकारी देते इसरो के चेयरमैन के. सिवन (पीटीआई)

चंद्रमा की कक्षा में दाखिल होने के पहले चंद्रयान की गति 39,240 किलोमीटर प्रति घंटे की थी. चूंकि अंतरिक्ष में हवा है नहीं, तो स्पीड टेक्स थी. कितनी तेज़? बस समझ लीजिए कि हवा में ध्वनि की गति की लगभग तीस गुना ज्यादा तेज़. इसरो के चेयरमैन डॉ. के सिवन ने कहा,

एक छोटी सी त्रुटि भी चंद्रयान 2 की चंद्रमा के साथ मुलाकात नाकाम कर सकती है.”

और इसके लिए चंद्रयान की स्पीड 90 परसेंट तक कम की गयी. तब कहीं चंद्रयान चंद्रमा की कक्षा में 118 किलोमीटर की ऊंचाई पर जाकर स्थापित हो सका.

लॉन्चिंग के बाद चंद्रयान-2 (पीटीआई)
लॉन्चिंग के बाद चंद्रयान-2 (पीटीआई)

अब चंद्रयान अगले दो-तीन हफ़्तों तक चंद्रमा की कक्षा के चक्कर लगाएगा. फिर आएगी तारीख 7 सितंबर. इस दिन चंद्रयान के दो हिस्से ऑर्बिटर और इम्पैक्टर एक दूसरे से अलग हो जाएंगे. ऑर्बिटर चंद्रमा की कक्षा में चक्कर काटता रहेगा, जबकि इम्पैक्टर ऑर्बिटर से अलग होकर चंद्रमा की सतह पर उतरेगा. अपने विक्रम लैंडर के सहारे. और चंद्रमा की सतह पर उतरते ही इम्पैक्टर में से प्रज्ञान रोवर बाहर निकलेगा और चंद्रमा की सतह पर खोजबीन शुरू करेगा.

1 सितंबर तक चार बार चंद्रयान-2 बदलेगा अपनी कक्षा

जी हां. और आगे का प्लान ये है.

21 अगस्त की दोपहर 12.30-1.30 बजे के बीच चंद्रयान-2 121×4303 किलोमीटर की कक्षा में दाखिल हुआ.

28 अगस्त की सुबह 5.30-6.30 बजे के बीच चंद्रयान-2 178×1411 किलोमीटर की कक्षा में दाखिल होगा.

30 अगस्त की शाम 6.00-7.00 बजे के बीच चंद्रयान-2 126×164 किलोमीटर की कक्षा में दाखिल होगा.

01 सितंबर की शाम 6.00-7.00 बजे के बीच चंद्रयान-2 114×128 किलोमीटर की कक्षा में दाखिल होगा.

और फिर आएगा 7 सितम्बर का दिन. चंद्रमा पर फाइनल लैंडिंग होगी और फिर शुरू होगी पानी की खोज.

चंद्रयान का काम क्या?

दो ही ग्रह हैं. मंगल और चंद्रमा. जिन पर जीवन की खोज की जा रही है. जीवन के लिए हवा और पानी ज़रूरी है. और सब जगह यही खोज हो रही है.चंद्रयान-1 को जो मिला, वो पानी के कुछ हिस्से ही थे. कुछ कण ही मिले थे. पानी का कोई बहुत बड़ा भंडार नहीं था. पानी का कोई स्रोत भी नहीं मिला था. अब उसकी ही खोज हो रही है.

इस बारे में इसरो ने भी मीडिया को बताया. इसरो ने कहा था,

“चंद्रयान-1 से हमें चंद्रमा पर पानी के कण मिले थे. इस पर ज्यादा शोध होना चाहिए. चंद्रमा की सतह पर पानी कहां-कहां और किस रूप में मौजूद है, और क्या सतह के नीचे और वहां के पर्यावरण में मौजूद है, इस पर और जांच की आवश्यकता है.”

जैसे हमारे ग्रह पर उत्तरी और दक्षिणी ध्रुव हैं, वैसे चंद्रमा पर भी हैं. और इसरो का मानना है कि चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर बहुत बड़ी परछाई दिखती है. और ये परछाई किसी न किसी वजह से पानी की उपस्थिति की ओर इशारा है. और इसके आसपास ही चंद्रयान की लैंडिंग होनी है. और पानी किसलिए क्योंकि आगे आने वाले समय में चंद्रमा को एक स्टेशन की तरह इस्तेमाल किया जा सके, जिससे आगे के स्पेस की रीसर्च जारी रह चुके.

दस सालों में चंद्रयान में क्या बदला?

पहला चंद्रयान तो अभी से दस सालों पहले अंतरिक्ष में गया था. साल 2009 में. दूसरे का डिज़ाइन 2009 में ही पूरा हो गया था. सारा कुछ भारत ने खुद बनाया. जिस टूल की मदद से चंद्रयान चन्द्रमा की सतह पर उतरेगा, उसे लैंडर कहते हैं. जिसका नाम भारत ने ‘विक्रम’ रखा है. विक्रम साराभाई के नाम पर. इसरो के चेयरमैन और भारत में स्पेस मिशनों के पिता कहे जाने वाले विक्रम साराभाई.

चंद्रयान का रोवर और लैंडर
चंद्रयान का रोवर और लैंडर

पिछले वाले चंद्रयान में कुछ चीज़ें NASA ने दी थी, इस बार सब भारत में बना है. चंद्रयान बनाने में कुल 978 करोड़ रुपयों का खर्च आया था. और अगर जानना हो तो इस बार के चंद्रयान का वजन, मतलब रॉकेट और रॉकेट में पड़ने वाले ईंधन और चंद्रयान के हरेक हिस्से का वजन मिलाकर 3,850 किलो है. कुल इतने वजन की एक साथ पृथ्वी से लॉन्चिंग हुई. चंद्रयान में कुल 14 हिस्से हैं.

जहां रोवर चांद की धरती पर टहल-टहलकर आंकड़े जुटाएगा और पानी की तलाश करेगा, वहीं ऑर्बिटर कक्षा में चांद के चक्कर लगाएगा. करीब दो सालों तक.


ये वीडियो देखिए, चंद्रयान के बारे में पूरी जानकारी है यहां : 

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