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2017 आते-आते हल्दीघाटी का युद्ध महाराणा प्रताप जीत गए

आज महाराणा प्रताप का जन्मदिवस है.

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लगता है हमारे देश में एक अजीब तरह के पागलपन का वायरस छिड़का गया है. पिछले दिनों ज़रूर कोई एलियन स्पेस-शिप आर्यावर्त में उतरा था, जिसने हवा में कुछ घोल दिया है. वरना लोग-बाग यूं पगलाए हुए घूमते नज़र नहीं आते. नित-नई मूर्खताओं का सृजन कर रहे हैं हम. अभी पिछली मूर्खता से उबरे नहीं होते कि किसी नई मूर्खता का शिगूफा छिड़ जाता है. वैसे ये बोल्ड में लिख लीजिए, ऐसा कुछ लोग कर रहे हैं, बाकी हम सब बड़े भले लोग हैं. हमारा इतिहास प्रेम तो आजकल उफ़ान पर आए दूध की तरह उबल-उबल कर बह रहा है. आम आदमी से लेकर नेताओं तक, फिल्मस्टार्स से लेकर हिस्ट्रीशीटर्स तक सभी लोग हिस्ट्री में गैरमामूली दिलचस्पी लेने लगे हैं. हमारा बस चले तो हम फिर से इतिहास में घुस जाएं और एक-एक घटना अपनी अध्यक्षता में करवाएं.

ज़रा पिछले कुछ महीनों की घटनाएं रिव्यू भर कर लें तो साफ़ नज़र आ जाएगा कि ज़्यादातर मौकों पर ‘टॉक ऑफ़ दी नेशन’ क्या मुद्दा रहा है. इतिहास. टीपू सुलतान, औरंगज़ेब, बाबर, गांधी, नेहरू, पटेल, तैमूर, पद्मावती, खिलजी यही सब सुनने को मिला बार-बार. सोशल मीडिया पर तलवारें भांजी गईं. बाकायदा युद्ध लड़े गए. इतिहास की बातों के चक्कर में लोगों के वर्तमान दोस्त बिछड़ गए. लोगों का बस नहीं चल रहा था कि वो अपनी मर्ज़ी का इतिहास लिख डालें.

खैर, लोगों का चले ना चले सरकारों का तो चलता है. ऐसी ही एक कोशिश राजस्थान यूनिवर्सिटी करने जा रही है. आईडिया भाजपा विधायक का है. जयपुर से भाजपा विधायक मोहनलाल गुप्ता ने ये सुझाव दिया है कि यूनिवर्सिटी की किताबों में फेरबदल कर ‘हल्दीघाटी के संग्राम’ में अकबर की जगह महाराणा प्रताप को विजेता दिखाया जाए. उनका कहना है कि कई सारे इतिहासकारों ने इस घटना को गलत तरीके से लिखा है. 1576 में हुई इस फेमस लड़ाई में जीत महाराणा प्रताप की हुई थी.

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टाइम्स ऑफ़ इंडिया से बात करते हुए मोहनलाल गुप्ता ने कहा, “कोर्स की किताबों में इतिहास को तोड़-मरोड़ कर पढ़ाया जा रहा है. अब समय आ गया है इसमें बदलाव किया जाए और इस पीढ़ी के साथ आने वाली पीढ़ियों को भी सही इतिहास पढ़ाया जाए.” इसके अलावा उन्होंने किताबों में चार अध्याय और जोड़ने की सिफारिश की. जिनमें से एक स्वामी विवेकानंद के ‘सांस्कृतिक राष्ट्रवाद’ पर होगा.

मोहनलाल गुप्ता राजस्थान यूनिवर्सिटी सिंडिकेट में सरकारी प्रतिनिधि हैं. यानी सरकार की आवाज़ हैं. उनके सुझावों को यूनिवर्सिटी ने सीरियसली ले भी लिया है. RU के इतिहास विभाग के अध्यक्ष के जी शर्मा ने भी कहा है कि उन्होंने खुद इस विषय पर रिसर्च की है और पाया कि महाराणा प्रताप और अकबर के बीच का युद्ध ड्रॉ रहा था. यूनिवर्सिटी के वाइस  चांसलर राजेश्वर सिंह ने इस प्रस्ताव को हिस्ट्री बोर्ड ऑफ़ स्टडीज के पास भेज दिया है. उन्होंने जानकारी दी कि बोर्ड इसकी जांच करेगा और फिर अकैडमिक काउंसिल को अप्रूवल के लिए भेज देगा.

यहां जानने लायक बात एक और है. TOI में छपी ख़बर के मुताबिक़, राजस्थान सरकार पिछले कुछ दिनों में स्कूल की किताबों में कुछ बदलाव कर भी चुकी है. सालभर पहले उसने मुग़ल बादशाह अकबर के नाम के साथ लगने वाले ‘महान’ शब्द को हटवाया था. इसी तरह कुछ मुस्लिम शासकों पर आधारित कंटेंट में बड़े पैमाने पर छंटनी की थी. पिछले साल जुलाई में सातवीं क्लास के बच्चों की किताबों से जवाहरलाल नेहरू और सरोजिनी नायडू के नाम हटा लिए गए थे. यही नहीं नाथूराम गोडसे द्वारा गांधी हत्या का ज़िक्र भी नहीं था. 

ये एक गैर-ज़रूरी हरकत है. ऐसी ही एक हरकत कुछ दिनों पहले बंगाल में ममता बनर्जी कर चुकी हैं. उन्होंने पाठ्यक्रम की किताबों से ‘रामधोनु’ शब्द हटवा कर ‘रोंगधोनु’ करवा दिया था. लॉजिक था कि रामधोनु से धार्मिक ध्वनि आती है. उस वक़्त उनकी भी बहुत छीछालेदर हुई थी. राम को जबरन हटाओगे तो चीजें रोंग हो ही जाएंगी.

इस तरह के गैर-ज़रूरी शोशे अक्सर इन नेताओं द्वारा पब्लिक में छोड़े जाते हैं और जनता तमाम ज़रूरी मुद्दों को भुलाकर इनमें व्यस्त रहने लगती है. इतिहास पर गर्व ज़रूर करें लेकिन उसे नाक का मसला ना बनाएं. हमारे वर्तमान की ऐसी-तैसी हुई जा रही है और हम इतिहास का लॉलीपॉप चूस रहें हैं. सैंकड़ों साल पहले क्या हुआ था इसे लेकर फिल्मकारों को पीट रहे हैं, एक नवजात बच्चे को देशद्रोही बता रहे हैं, आततायियों को किसी धर्म से जोड़ कर गद्दारी के फतवे जारी कर रहे हैं. ये ना सिर्फ गैर-ज़रूरी है बल्कि नुकसानदेह भी है.

हल्दीघाटी में महाराणा प्रताप की जीत हुई थी या अकबर की इसपर सर धुनने से इलाके की टूटी सड़क ठीक नहीं हो जाने वाली. वो ठीक तभी होगी जब हम इतिहास से निकाल कर वर्तमान में आएंगे और अपने रहनुमाओं को घेरेंगे. उनसे ये पूछने की अक्ल रखेंगे कि, “हल्दीघाटी तो ठीक है लेकिन हल्दी के रेट इतने क्यों बढ़ रहे हैं?”


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