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बिहार विधान परिषद चुनाव: जानिए कौन हैं MLC के ये उम्मीदवार, क्यों मिला टिकट

बिहार. यहां इसी साल विधानसभा के चुनाव होने हैं. जनता अपने विधायक चुनेगी. लेकिन उससे पहले राज्य में एक और चुनाव होना है. विधान परिषद का चुनाव. जुलाई में चुनाव है. हालांकि लगता नहीं है कि चुनाव की नौबत आएगी. सभी नौ प्रत्याशियों का लगभग निर्विरोध चुना जाना तय है.

बिहार विधान परिषद में समीकरण के मुताबिक, आरजेडी और जेडीयू के खाते में तीन, बीजेपी के खाते में दो और एक सीट कांग्रेस के पास है. मुख्य विपक्षी पार्टी आरजेडी ने अपने प्रत्याशियों के नाम तय कर लिए हैं. लालू प्रसाद यादव की पार्टी ने तीन सीटों के लिए फारूक शेख, सुनील सिंह और रामबली चंद्रवंशी को चुना है. कांग्रेस ने भी अपने एकमात्र उम्मीदवार का नाम घोषित कर दिया है. तारिक अनवर कांग्रेस के कोटे से विधान परिषद जाएंगे.

इससे पहले सत्ताधारी नीतीश कुमार की पार्टी जेडीयू ने भी अपने तीन प्रत्याशियों के नाम का ऐलान किया था. गुलाम गौस, भीष्म सहनी और कुमुद वर्मा जेडीयू की उम्मीदवार हैं, जबकि बीजेपी की तरफ से सम्राट चौधरी संजय मयूख उम्मीदवार होंगे.

कौन हैं ये उम्मीदवार, और इन पार्टियों ने एमएलसी के लिए इन्हें क्यों चुना है. जानते हैं.

जेडीयू

गुलाम गौस

गुलाम गौस 1998 से 2010 तक तीन बार RJD के कोटे से बिहार विधान परिषद के सदस्य रह चुके हैं. गौस ने 2014 में लालू प्रसाद की पार्टी छोड़ दी थी. फिर जेडीयू में शामिल हो गए थे. चौथी बार उनका विधान परिषद जाना तय है. पुराने नेता है. जेडीयू उनके बहाने बिहार के मुस्लिम वोटर्स को साधना चाहती है. गुलाम गौस का 1974 के जयप्रकाश नारायण आंदोलन में सक्रिय योगदान रहा है. पिछड़े और दलित मुसलमानों की समस्याओं पर हिन्दी और उर्दू समाचार-पत्रों में लिखते रहे हैं.

भीष्म सहनी

पश्चिमी चंपारण जिले के हैं. 2015 में जेडीयू के टिकट पर बगहा से चुनाव लड़ा था, हालांकि हार गए थे. बीजेपी के आरएस पांडेय जो कि पूर्व पेट्रोलियम सचिव हैं उनसे. बहुत ही करीबी मुकाबले में. अब जेडीयू ‘सन ऑफ मल्लाह’ मुकेश सहनी की काट के लिए इन्हें लेकर आई है. प्रदेश संगठन सचिव समेत कई जिलों के संगठन प्रभारी रहे हैं. अभी मोतिहारी जिले का संगठन देख रहे हैं.

कुमुद वर्मा

राजनीतिक परिवार से आती हैं. जहानाबाद लोकसभा चुनाव से टिकट मिलते-मिलते रह गया. 10 दिन तक प्रचार भी कर लिया था. पिता और ससुर राजनीति में रहे हैं. जेडीयू कुशवाहा राजनीति में अपनी पैठ बनाने के लिए लेकर आई है. माना जाता है कि ओबीसी में यादवों के बाद बिहार में सबसे ज्यादा संख्या कुशवाहा की है.

आरजेडी

फारूक शेख

मुंबई के बिल्डर हैं. लोकसभा चुनाव में भी टिकट के लिए लगे थे. शरद यादव की पार्टी लोकतांत्रिक जनता दल से, लेकिन बाद बनी नहीं. शरद यादव को खुद आरजेडी के सिंबल पर लड़ना पड़ा था. अब आरजेडी ने शेख को एमएलसी का प्रत्याशी बनाया है. इसके पीछे दो वजहें बताई जा रही हैं. पहला कि वो मुस्लिम हैं. दूसरा कि चुनाव लड़ने के लिए आरजेडी को चाहिए पैसा जो कि एक के बाद एक चुनाव हारने से उसके पास है नहीं. ऐसे में फारूक शेख पर दाव लगाया गया है.

सुनील सिंह

लालू यादव परिवार के करीबी माने जाते हैं. को-ऑपरेटिव की बड़ी संस्था बिस्कोमान के चेयरमैन हैं. राबड़ी देवी उन्हें राखी बांधा करती हैं. राजद की पुरानी राजनीति यादव, राजपूत और मुसलमान के तहत बनने वाले समीकरण में भी फिट बैठते हैं. नाम का ऐलान होने के बाद उन्होंने कहा कि लालू प्रसाद यादव ने मुझ पर विश्वास किया है. कृषि के क्षेत्र में बिहार को नंबर वन बनाना है.

प्रोफेसर रामबली चंद्रवंशी

बीएन कॉलेज में प्रोफेसर हैं. वही जहां लालू यादव और रामविलास पासवान ने पढ़ाई की है. लंबे समय से रामबली चंद्रवंशी लालू यादव के साथ हैं. पिछड़ा प्रकोष्ठ के प्रदेश अध्यक्ष हैं. अति पिछड़ा वर्ग के चेहरे के तौर पर आरजेडी और लालू यादव ने उनपर भरोसा जताया है.

बीजेपी

सम्राट चौधरी

चार साल पहले बीजेपी में शामिल हुए थे. कुशवाहा समाज से आते हैं.  पहले नीतीश सरकार में मंत्री भी थे, लेकिन मांझी विवाद में वे जीतन राम मांझी के साथ चले गए. फिर मांझी को छोड़ बीजेपी में शामिल हुए थे. पिता भी राजनीति में रहे हैं. कहा जा रहा है कि कुशवाहा वोटों को साधने के लिए बीजेपी ने टिकट दिया है.

संजय मयूख

संजय प्रकाश उर्फ संजय मयूख बीजेपी के राष्ट्रीय मीडिया सह प्रभारी हैं. कायस्थ समाज से आते हैं. अमित शाह के करीबी. हैं दूसरी बार विधान परिषद जा रहे हैं.


वीडियो देखें: बिहार विधानसभा चुनाव 2020 में इस्तेमाल होने वाली EVM M3 कैसे अलग है?

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