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छात्राओं के कपड़ों में हाथ डालने और यौन शोषण के आरोपी प्रोफ़ेसर को BHU ने बुला लिया, अब बवाल हो गया

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सितम्बर 2017 : 23 तारीख. काशी हिन्दू विश्वविद्यालय यानी BHU. एक शाम पहले कैम्पस के अन्दर यूनिवर्सिटी की एक छात्रा का यौन उत्पीड़न होता है. और कैम्पस की छात्राएं BHU के मेन गेट पर आ जाती हैं. प्रदर्शन शुरू होता है. कहा जाता है कि कैम्पस में लड़कियां सुरक्षित नहीं हैं.

सितम्बर 2018 : 23 तारीख़. लड़कियां अपने आन्दोलन का एक साल मनाने उतरती हैं. अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् के लड़कों से गालीगलौच और मारपीट तक की नौबत आ जाती है. पुलिस केस दर्ज होता है.

सितम्बर 2019 : 14 तारीख. शाम 6 बजे. लड़कियां फिर से मेन गेट पर आ जाती हैं. फिर से वही सवाल. लड़कियां कैम्पस में सुरक्षित नहीं हैं. कैम्पस में कर्फ्यू लगाया जा रहा है. बंदिशें लगाई जा रही हैं. यौन उत्पीड़न के आरोपी शिक्षक को बर्ख़ास्त करने की मांग करती हैं. और ये प्रदर्शन इस खबर के लिखे जाने तक जारी है.

BHU Protest 1

हुआ क्या?

अक्टूबर 2018. BHU के जंतु विज्ञान विभाग यानी जूलॉजी विभाग की छात्राएं टूर पर ओडिशा जाती हैं. अपने प्रोफ़ेसर शैल कुमार चौबे के साथ. लौटकर आरोप लगाती हैं, कुलपति के पास शिकायत दर्ज करती हैं कि प्रोफ़ेसर चौबे ने गलत तरीके से उनके साथ व्यवहार किया. खासकर कोणार्क के सूर्य मंदिर में. यहां की संभोगरत मूर्तियों के बारे में बता रहे गाइड से छात्राओं से बार-बार कहा, “पॉइंट पर आओ.” इशारा साफ़ था. प्रोफ़ेसर साहब पर आरोप है कि छात्र-छात्राओं के सामने सेक्स के बारे में बात करना चाह रहे थे. यही नहीं. प्रोफ़ेसर साहब पर आरोप है कि उन्होंने एक छात्रा को दबोचकर उसके कपड़ों के भीतर हाथ डाल दिया. बाकी छात्राओं ने बताया कि वे छात्राओं से उनके कपड़ों के बारे में, उनके शरीर के अंगों के बारे में, या तो दूसरे अर्थों में सेक्स के बारे में बात करते रहते थे.

प्रोफ़ेसर चौबे की बहाली के बाद से ही BHU गर्म है.
प्रोफ़ेसर चौबे की बहाली के बाद से ही BHU गर्म है.

मामला उठा तो जांच बैठी. कुलपति ने इसे इंटरनल कम्प्लेंट्स कमिटी (ICC) को भेजा. और आरोपों को सही पाया गया. प्रोफ़ेसर चौबे निलंबित. लेकिन इस साल जुलाई में यूनिवर्सिटी ने उन्हें फिर से नौकरी पर वापिस बुला लिया. BHU ने कहा कि उन्हें चेतावनी देकर छोड़ दिया गया है. वे किसी यूनिवर्सिटी में कुलपति नहीं बन पाएंगे.

बहाली से लेकर अब तक छिटपुट मांगें उठती रहीं कि उन्हें बर्ख़ास्त किया जाए. लेकिन ये मांग नहीं मानी गयी. और अब बीएचयू के सामने एक और प्रदर्शन है.

क्या हैं प्रदर्शन कर रहे छात्राओं की मांगें?

सबसे पहली और बड़ी मांग. यौन उत्पीड़न के आरोपी प्रोफ़ेसर एसके चौबे को बर्ख़ास्त किया जाए. और उनके खिलाफ तत्काल प्रभाव से कानूनी जांच बिठाई जाए.

यौन उत्पीड़न के आरोपी एसके चौबे
यौन उत्पीड़न के आरोपी एसके चौबे

दूसरी मांग. BHU में जेंडर सेंसिटाइज़ेशन कमिटी अगेंस्ट सेक्सुअल हरासमेंट यानी GSCASH की स्थापना की जाए. ये मांग 2017 के आन्दोलन के समय भी उठी थी. GSCASH में हमेशा छात्रों और शिक्षकों की ओर से प्रतिनिधि मौजूद होते हैं. जांच होती है. और जांच के बाद यथोचित कार्रवाई की जाती है. लेकिन इस मांग को अब तक नहीं माना गया. GSCASH की जगह Women Grievance Cell की स्थापना कर दी गई है, जिसे छात्र लॉलीपॉप कहते हैं. ऐसा इसलिए क्योंकि इसी सेल के तहत तमाम जांच होती हैं और आरोप सही पाए जाने पर भी आरोपी की बहाली हो जाती है.

GSCASH की मांग BHU आन्दोलन के समय भी उठी थी.
GSCASH की मांग 2017 के BHU आन्दोलन के समय भी उठी थी.

और तीसरी मांग. कर्फ्यू ख़त्म किया जाए. छात्राएं कह रही हैं कि कैम्पस में लड़कों और लड़कियों के बीच भेदभाव किया जाता है. लड़के जब भी हॉस्टल से बाहर जाएं या वापिस आयें, कोई फर्क नहीं पड़ता है. लेकिन लड़कियों को रात 10 बजे तक हॉस्टल में दाखिल हो जाना होता है. और बाहर निकलने के लिए तमाम ख़त लिखने पड़ते हैं या अभिभावकों को फ़ोन करना पड़ता है. ये मांग भी दो सालों से उठाई जा रही है. इस मांग पर कुछ कार्रवाई तो की गयी है, कुछ हॉस्टलों में आने-जाने की टाइमिंग पर पाबंदी कम की गई है, लेकिन फिर भी एक तयशुदा वक़्त निर्धारित है. इस वजह से ये मांग अब भी उठ रही है.

हॉस्टलों में समय की पाबंदी लगाना एक बड़ा मुद्दा रहा है.
हॉस्टलों में समय की पाबंदी लगाना एक बड़ा मुद्दा रहा है.

इस समय क्या हो रहा है?

BHU का मेनगेट. इसे सिंहद्वार भी कहते हैं. यहां पर 14 सितम्बर की शाम 6 बजे से लड़कियां बैठी हुई हैं. धरने पर. नारे लगा रही हैं. गाने गा रही हैं. कविताएं पढ़ रही. अपनी इन तीन मांगों के साथ. BHU के छात्र शाश्वत उपाध्याय बताते हैं,

“रात को 11 बजे छात्र अधिष्ठाता एमके सिंह, रजिस्ट्रार नीरज त्रिपाठी, सोशल साइंस फैकल्टी डीन आरपी पाठक और चीफ प्रोक्टर ओपी राय छात्राओं से मिलने आये. मांगें नहीं मानीं. कहा कि 4-5 दिन का समय चाहिए. क्यों? क्योंकि विश्वविद्यालय के कुलपति राकेश भटनागर दिल्ली में हैं. छात्रों ने कहा कि हवाई जहाज से दिल्ली से बनारस आने में 2-3 घंटे ही लगते हैं. इस पर छात्रों को जवाब दिया गया कि वे किसी ज़रूरी काम से गए हुए हैं.”

छात्रों की मांगें नहीं मानी गईं, तो छात्रों ने भी धरना ख़त्म करने की मांग नहीं मानी. इस समय सैकड़ों छात्र BHU के मेनगेट पर बैठे हुए हैं.

14 सितम्बर की रात की तस्वीर. छात्र धरने पर बैठे हुए हैं.
14 सितम्बर की रात की तस्वीर. छात्र धरने पर बैठे हुए हैं.

क्या कहा विश्वविद्यालय ने?

हमने आरोपी प्रोफ़ेसर शैल कुमार चौबे से बात करने की कोशिश की. उन्होंने हमारे फ़ोन का कोई जवाब नहीं दिया. हमने अपने प्रश्नों के साथ उन्हें मेल लिख भेजा. उत्तर आया. उन्होंने कहा,

“मैं निर्दोष हूं और मैंने टूर पर पूरी निष्ठा के साथ अपनी ड्यूटी बतौर गार्जियन और टीचर निबाही थी. मेरे पिछले कामों के ही आधार पर मुझे, तीन और टीचरों और दो लैब असिस्टेंट को इस टूर पर भेजा गया था. एक छात्रा की तबीयत खराब थी तो उसके भी अभिभावक गए हुए थे. मैंने अपना जवाब और सारे सबूत दे दिए हैं, जिससे पता चलता है कि टूर सफल था और मैं निर्दोष हूं.”

उन्होंने ये भी कहा कि विश्वविद्यालय के नियमों के मुताबिक़ और कुछ नहीं कह सकता हूं. ज्यादा जानकारी के लिए विश्वविद्यालय प्रशासन से संपर्क करने के लिए कहा. इस बीच यूनिवर्सिटी के जनसंपर्क अधिकारी राजेश सिंह से बात हुई. कहा कि जांच में यूनिवर्सिटी ने पाया कि आरोप सच हैं. उन्होंने यूनिवर्सिटी का पक्ष रखते हुए कहा,

“BHU ने पहले आरोपी प्रोफ़ेसर के खिलाफ आरोप सही पाकर उन्हें निलंबित कर दिया था. फिर उन्हें सेंसर कर दिया गया है. वे किसी यूनिवर्सिटी के कुलपति नहीं बन सकते हैं. ये किसी टीचर को दी गयी सबसे बड़ी सजा हो सकती है. और यूनिवर्सिटी की एग्जीक्यूटिव कौंसिल के पास इतने ही अधिकार थे.”

आंदोलन पर बात करते हुए राजेश सिंह ने कहा,

“इनमें से अधिकतर छात्र विश्वविद्यालय के नहीं हैं. बाहर के लोग हैं. और जो छात्र हैं, वे दूसरे विभागों के हैं. आप ही बताइये, 32 हज़ार छात्रों में से 60-70 लोगों को ही क्यों आंदोलन करना है. ये लोग मोटीवेटेड हैं. आज़ादी का नारा लगा रहे हैं. ढपली बजा रहे हैं. इन लोगों को ऑन स्पॉट फैसला चाहिए.”

बीएचयू का हालिया इतिहास बताता है कि यौन शोषण और छात्राओं की सुरक्षा को लेकर कैम्पस में कुछ सबसे बड़े आन्दोलन हो चुके हैं. सितम्बर 2017 का आंदोलन भी इसी सवाल को लेकर था, जिसके बाद पुलिस ने छात्रों पर लाठीचार्ज करके आन्दोलन को कुचलने की कोशिश की. कहा जाता है कि इसी घटना के बाद तत्कालीन कुलपति गिरीशचंद्र त्रिपाठी को अनिश्चितकाल के लिए छुट्टी पर भेज दिया गया था.

हॉस्टल में कुलपति के हवाले से आई नोटिस
हॉस्टल में कुलपति के हवाले से आई नोटिस

हालिया आन्दोलन को भी कुचलने की कोशिश शुरू हो चुकी है. सूत्रों ने बताया है कि विश्वविद्यालय के हॉस्टलों में तालाबंदी शुरू हो चुकी है. लिखा गया है कि कुलपति के आदेश के बाद ऐसा किया गया है. छात्राओं को बाहर निकलने नहीं दिया जा रहा है. और जो बाहर मेनगेट पर प्रदर्शन पर बैठी हैं, उन पर दबाव डाला जा रहा है कि वे वापिस हॉस्टल में आएं.


लल्लनटॉप वीडियो : मंदिर में लड़कियों का यौन शोषण करने वाले प्रोफ़ेसर को BHU ने वापस बुलाया

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