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शर्त लगा लो, प्रॉपर्टी पर कब्जा दिलाने का ऐसा फर्जीवाड़ा पहले कभी नहीं सुना होगा

आपने किसी मकान पर कब्जे के लिए नकली डॉक्युमेंट बनवाने जैसे फर्जीवाड़े के बारे में पहले सुना होगा. लेकिन कर्नाटक (Karnataka) में एक प्रॉपर्टी को कब्जाने के लिए जो तरीका अपनाया गया, वो अपनेआप में यूनीक है. क्योंकि इसमें कथित रूप से सरकारी वकील और कोर्ट अधिकारी तक के शामिल होने की बात सामने आ रही है. जब इस फर्जीवाड़े का मामला हाई कोर्ट पहुंचा और गहराई से जांच की गई तो इस तरह के 118 मामलों में कथित रूप से सरकारी वकील सहित दूसरे वकीलों की मिलीभगत भी सामने आई है. केस में पुलिस ने अब तक 12 लोगों को गिरफ्तार भी किया है. आइए जानते हैं क्या है ये पूरा गोरखधंधा.

कैसे सामने आया मामला?

नवंबर 2020. एक प्राइवेट फर्म शाह हरिलाल बीकाबाई एंड कंपनी ने कर्नाटक हाई कोर्ट में एक याचिका दायर की. ये याचिका एक निचले कोर्ट के ऑर्डर के खिलाफ दायर की गई थी. असल में 2018 में फर्म को उत्तरी बेंगलुरु (Bengaluru) की एक संपत्ति से बेदखल कर उसे खाली करने की कोर्ट डिक्री जारी की गई थी. इसमें आदेश था कि फर्म इस संपत्ति को खाली कर दे.

फर्म ने हाई कोर्ट को बताया कि 1954 से जमीन पर उसका कब्जा है. अगस्त 2020 में दायर एक पुलिस शिकायत के बाद बेदखली प्रक्रिया शुरू हुई. पुलिस की मदद से कंपनी को जगह से बेदखल किया गया. बेदखली रोकने में विफल रहने के बाद कंपनी ने हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था.

हाई कोर्ट ने मामले की तह तक जाने के लिए निचली अदालत के आदेश और कार्यवाही को ध्यान से परखा. उसने पाया कि स्मॉल कॉज कोर्ट में बेदखली का मामला दर्ज होने के कुछ ही दिनों बाद प्रॉपर्टी के मालिकों और किरायेदारों ने तो बेदखली की समयसीमा पर समझौता कर लिया है.

प्रॉपर्टी के मालिकों ने पुलिस सुरक्षा के तहत बेदखली के लिए एक डिक्री प्राप्त की है और प्राइवेट फर्म शाह हरिलाल बीकाबाई एंड कंपनी को बेदखल करने का प्रयास शुरू कर दिया. लेकिन चौंकाने वाली बात ये थी कि किराएदार के तौर पर फर्म नहीं, बल्कि कोई फर्जी नाम था.

4 नवंबर 2020 को, जस्टिस कृष्णा दीक्षित की सिंगल बेंच ने स्मॉल कॉज कोर्ट के रजिस्ट्रार को इस गंभीर मामले में पुलिस जांच शुरू करने और अदालत के संदिग्ध अधिकारियों के खिलाफ घरेलू जांच करने को कहा. कोर्ट ने कहा कि धोखाधड़ी और जालसाजी आमतौर पर अंदरूनी सूत्रों की भागीदारी के बिना नहीं होते हैं.

उसी महीने रजिस्ट्रार ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई. लेकिन जांच में तेजी तब आई जब राज्य सरकार ने मामले को सीआईडी ​​को सौंप दिया. 26 जून 2021 को जस्टिस दीक्षित ने फिर एक बार मामले पर सख्त टिप्पणी की. उन्होंने कहा,

“अदालत के रिकॉर्ड को जाली बनाकर और डिप्टी रजिस्ट्रार और दूसरे कार्यालयों की मुहरों को गढ़कर ये बड़ा घोटाला किया गया, इसके बावजूद मामले की जांच में उल्लेख करने योग्य कोई प्रगति नहीं हुई है.”

इसके बाद कर्नाटक के तत्कालीन चीफ जस्टिस अभय श्रीनिवास ओका की अध्यक्षता में हाई कोर्ट की एक खंडपीठ ने मामले को एक जनहित याचिका में बदल दिया. इसकी जांच सीआईडी ​की निगरानी में शुरू हुई. सीआईडी ​​ने 17 अगस्त को एक रिपोर्ट पेश की. कहा कि राजस्व अधिकारियों को 71 स्मॉल कॉज कोर्ट में शामिल सूट संपत्तियों के रिकॉर्ड प्रस्तुत करने का नोटिस जारी किया गया है.

Justice BV Nagarathna को साल 2008 में कर्नाटक हाई कोर्ट में एडिशनल जज के तौर पर नियुक्त किया गया था. दो साल बात उनकी नियुक्ति स्थाई हो गई. (फोटो: कर्नाटक ज्युडिशरी)
कर्नाटक हाई कोर्ट की सक्रियता की वजह से फर्जीवाड़े का ये बड़ा मामला सामने आया है. (फोटो: कर्नाटक ज्युडिशरी)

ऐसे होता था प्रॉपर्टी का फर्जीवाड़ा

अंग्रेजी अखबार द इंडियन एक्सप्रेस की खबर के मुताबिक, ये पूरा फर्जीवाड़ा एक सिंडिकेट की तरह चल रहा था. इसमें सबसे पहले किसी प्रॉपर्टी के फर्जी कागज बनवाए जाते हैं. उसके बाद उसे किराए पर लेने वाले के फर्जी कागज तैयार किए जाते हैं. मतलब प्रॉपर्टी मालिक और किराएदार दोनों फर्जी होते हैं. इसके बाद मामला स्मॉल कॉज कोर्ट में ले जाया जाता है. स्मॉल कॉज कोर्ट ऐसी विशेष अदालतें होती हैं, जो प्रॉपर्टी से जुड़े छोटे विवाद निपटाने के लिए बनाई गई हैं. दीवानी मामलों में तेजी से फैसले के लिए इन कोर्ट का निर्माण किया गया है.

फर्जीवाड़े के तहत मामला कोर्ट में जाने के बाद इस तरह से पैरवी की जाती है कि कोर्ट हमेशा किराएदार के खिलाफ ही फैसला सुनाता है. ऐसा होने से प्रॉपर्टी पर मौजूद किराएदार को संपत्ति खाली करने के लिए डिक्री या अदालती फरमान जारी हो जाता है.

अब चूंकि अदालती फरमान मिल गया है तो पुलिस की भी मदद मिल जाती है और असली किराएदार को प्रॉपर्टी से बेदखल कर दिया जाता है. एक तरफ पुलिस के साथ मिल कर प्रॉपर्टी खाली कराने का काम चल रहा होता है तो दूसरी तरफ फर्जी मकान मालिक और किराएदार दिखावे के लिए सुलह समझौता कर लेते हैं. मतलब खेल खत्म, पैसा हजम. कोर्ट को लगता है कि मामला सुलह-समझौते के बाद खत्म हो गया. जबकि बेदखल हुए प्रॉपर्टी पर बरसों से किराए पर रह रहे असली किराएदार.

इस तरह का काम करने के लिए पूरा एक रैकेट बनाया गया है. ये लोग प्रॉपर्टी की कीमत में कुछ प्रतिशत का कमीशन लेकर ये पूरा फर्जीवाड़ा करते थे. अब तक सिर्फ बेंगलुरू में इस तरह के 118 मामले सामने आ चुके हैं. जांच में कम से कम 6 वकीलों और एक पूर्व सरकारी वकील का नाम आ चुका है. 12 लोगों को गिरफ्तार किया गया है. हालांकि तीन वकीलों और पूर्व सरकारी वकील ने अग्रिम जमानत ले ली है. अब कहा जा रहा है कि आने वाले दिनों में सीआईडी जालसाजी, फर्जीवाड़े और कोर्ट को धोखा देने के दर्जनों मामले दायर करेगी. ये सभी मामले स्मॉल कॉज कोर्ट के रजिस्ट्रार के रिकॉर्ड के आधार पर खंगाले जा रहे हैं.


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