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जनसंख्या नीति का समर्थन या विरोध करने से पहले ये खबर पढ़ लीजिए

आबादी की बहस को लेकर समय का पहिया पूरा घूम चुका है. भारत एक वक्त पॉपुलेशन एक्सप्लोज़न की बात करता था. सरकार लोगों को समझा समझा कर थक रही थी कि आबादी बढ़ने का नुकसान क्या हो सकता है. फिर अचानक भारत को अपनी आबादी में प्रगति का अवसर नज़र आने लगा क्योंकि युवाओं की संख्या बढ़ती जा रही थी. तो बहस इसपर आ गई कि डेमोग्रैफिक डिविडेंट का लाभ कैसे लिया जाए. अब एक बार फिर जनसंख्या के बढ़ने में समस्या को रेखांकित किया जा रहा है. बढ़ती जनसंख्या की चिंता असम के मुख्यमंत्री हेमंत बिस्वा सर्मा को भी है और यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को भी. यूपी सरकार 2022 में होने वाले विधानसभा चुनाव से ऐन पहले एक बिल का ड्राफ्ट ले आई है जिसमें 2 बसे ज़्यादा बच्चों वाले लोगों के पंचायत चुनाव लड़ने पर रोक लगाई जाएगी, उन्हें सरकारी नौकरी और सरकारी सब्सिडी भी नहीं मिलेगी. लेकिन जनसंख्या आखिर है कितनी बड़ी समस्या. क्या जनसंख्या वाकई इतनी तेज़ी से बढ़ रही है कि उसे काबू में करने के लिए बिल की ज़रूरत है? और क्या इसके लिए राज्यों को आक्रामक नीतियां बनानी चाहिए.

देश की समस्याओं वाले विमर्श में अब फोकस जनसंख्या वृद्धि पर शिफ्ट किया जा रहा है. जनसंख्या के बड़े आंकड़े पेश करने पर ये समस्या और बढ़ी लगनी लगती है. 2027 तक भारत दुनिया में सबसे ज्यादा आबादी वाला देश बन जाएगा. आज़ादी के वक्त देश की जनसंख्या 36 करोड़ थी. अब ये 136 करोड़ के करीब हो गई है. 2011 की जनगणना के मुताबिक भारत में हर साल 2 करोड़ 40 लाख बच्चे पैदा होते हैं और 88 लाख लोगों की मौत होती है. यानी हर साल आबादी में डेढ़ करोड़ का इजाफा हो रहा है. जनसंख्या घटाने की जरूरत के लिए एक और आंकड़ा दिया जाता है. कि हमारे पास दुनिया का 2.4 प्रतिशत भूभाग है. लेकिन दुनिया की आबादी में 18 प्रतिशत हिस्सेदारी है. यानी संसाधनों के हिसाब से आबादी ज़्यादा है. और इन आंकड़ों के आधार पर हम मानते भी हैं कि आबादी पर नियंत्रण होना चाहिए. लेकिन ये नियंत्रण कैसे हो और कितना हो. क्या हमें उस नियंत्रण के लिए आक्रामक सरकारी नीतियों की ज़रूरत है? क्या चीन की तरह कोई नीति अपनाने की ज़रूरत है, या फिर एक धीमी प्रक्रिया के तहत जनसंख्या की दर अपने आप घट जाएगी. या कानून के बजाय कोई और तरीका अपनाना चाहिए?

उत्तर प्रदेश की सरकार नई जनसंख्या नीति लाई है. तो इस नई जनसंख्या नीति के गुणदोषों की विवेचना होनी चाहिए. पहले ये समझिए कि जनसंख्या नीति है क्या? 2021-2030 के लिए प्रस्तावित इस नीति के जरिए सरकार परिवार नियोजन को लेकर लोगों को जागरूक करने पर फोकस करेगी. परिवार नियोजन कार्यक्रम के अंतर्गत गर्भ निरोधक उपायों की सुलभता को बढ़ाया जाना और सुरक्षित गर्भपात की समुचित व्यवस्था देने की कोशिश होगी. इसके अलावा स्वास्थ्य सेवाओं को बेहतर बनाया जाएगा ताकि नवजात मृत्यु दर, मातृ मृत्यु दर को कम किया जा सके. इस नीति का उद्देश्य 11 से 19 वर्ष के किशोरों के पोषण, शिक्षा और स्वास्थ्य के बेहतर प्रबंधन के अलावा, बुजुर्गों की देखभाल के लिए व्यापक व्यवस्था करना भी है. ऐसा सरकार की तरफ से बताया गया है. इसके अलावा उत्तर प्रदेश की प्रजनन दर घटाकर 2026 तक 2.1 और 2030 तक 1.9 तक लाने की योजना है.

नई जनसंख्या नीति के तहत यूपी सरकार ने जो लक्ष्य रखे हैं, उन्हें पूरा करने के लिए कानून भी लाया जा रहा है. यूपी जनसंख्या विधेयक 2021 का ड्राफ्ट तैयार किया गया है. अभी इस पर लोगों की राय मांगी जा रही है. इस ड्राफ्ट में क्या क्या प्रावधान हैं –

# 2 से अधिक बच्चे होने पर सरकारी नौकरियों में आवेदन नहीं कर पाएंगे.
# 2 बच्चों से ज़्यादा वाले स्थानीय निकाय का चुनाव नहीं लड़ पाएंगे.
# दो बच्चों से ज्यादा वाले को सब्सिडी वाली सुविधाओं का फायदा नहीं मिलेगा.
# जो जनसंख्या नीति का पालन करेगा, उसे प्रोत्साहन दिए जाएंगे. अगर कोई सरकारी नौकरी में है तो उसे अतिरिक्त वेतन वृद्धि दी जाएगी, उसके पेंशन प्लान में सरकार का कंट्रीब्यूशन 3 परसेंट बढ़ेगा. प्राधिकरण के मकान और प्लॉट के आवंटन में वरीयता दी जाएगी. बच्चों की शिक्षा, चिकित्सा निशुल्क होगा. इस तरह की कई सुविधाएं दी जाएंगी.
# परिवार नियोजन के तरीके अपनाने वालों को प्रोत्साहन दिया जाएगा. जैसे अगर बीपीएल परिवार एक बच्चे के बाद नसबंदी करा लेता है तो उसे एक लाख रुपया एकमुश्त दिया जाएगा.
# ग्रेजुएशन तक बच्चे की पढ़ाई और इलाज राज्य सरकार के जिम्मे होगा.
# बच्चों को मेडिकल और इंजीनियरिंग जैसे कॉर्सेस में दाखिले के दौरान वरीयता दी जाएगी. एक ही संतान होने पर प्रोत्साहन ज्यादा दिया जाएगा.
# इसमें कोई दंडात्मक प्रावधान नहीं रखा गया है. जो व्यक्ति बातों को नहीं मानेगा, उसे प्रोत्साहन नहीं मिलेगा. बस ये ही मूल फॉर्मूला है.

यूपी में जनसंख्या वृद्धि का हाल बाकी राज्यों की तुलना में कैसा है?

जनसंख्या वृद्धि का पैमाना फर्टिलिटी रेट या प्रजनन दर को बनाया जाता है. प्रजनन दर यानी एक महिला अपने जीवनकाल में कितने बच्चों को जन्म देगी, इसके अनुमान के आधार पर औसत प्रजनन दर निकाली जाती है. राज्यवार प्रजनन दर के आकंड़े नीति आयोग की वेबसाइट पर मिलते हैं. इनके मुताबिक देश में 2016 में कुल प्रजनन दर 2.3 थी. और इसके घटने का पैटर्न मिलता है. अगर हम थोड़ा और पीछे जाएं तो साल 2000 में प्रजनन दर 3.2 थी जो 2016 तक घटकर 2.3 हो गई. अगर यूपी की बात करें तो 2016 में प्रजनन दर थी 3.1. यानी राष्ट्रीय औसत से ज्यादा. लेकिन यूपी में भी प्रजनन दर घटने का पैटर्न रहा है.

यहां साल 2000 में प्रजनन दर 4.7 थी जो 2016 तक घटकर 3.1 रह गई. सीएम योगी आदित्यनाथ अपने जनसंख्या नीति में इसे घटाकर अगले 10 साल में 1.9 तक लाने का लक्ष्य रख रहे हैं. और इसके लिए एक कानून ला रहे हैं. हालांकि कई धार्मिक नेता और राजनेता इसके विरोध में भी आ गए हैं. बिहार के मुख्यमंत्री नीतिश कुमार जनसंख्या नीति के कानून पर बयान आया है कि सिर्फ कानून बनाकर जनसंख्या दर नहीं घटाई जा सकती, महिलाएं पढ़ी लिखी होंगी तभी जनसंख्या घटेगी. ये बात भी सही है. लेकिन क्या कानून की ज़रूरत नहीं है?

पिछले कई सालों जनसंख्या वृद्धि वाले विमर्श को एक समुदाय विशेष के आसपास रखा जाता है. हमने कई ऐसे बयान सुने होंगे जिसमें मुस्लिमों पर जनसंख्या बढ़ाने का आरोप लगता है. इसमें कितनी सच्चाई है? आंकड़ों के सहारे समझते हैं कि हमारी जनसंख्या वृद्धि घट रही है या बढ़ रही है. और क्या किसी समुदाय विशेष में जनसंख्या वृद्धि दर बढ़ रही है. धार्मिक आधार पर प्रजनन दर के आकंड़ों की तुलना करते हैं. और ये आंकड़े जुटाता है नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे. शॉर्ट में कहते हैं NFHS. इसके 2004-05 के आंकड़ों के मुताबिक मुस्लिमों में प्रजनन दर 3.4 थी. इसको थोड़ा और सरल करके बताएं तो -औसतन हर 10 मुस्लिम महिलाएं 34 बच्चों को जन्म देती थी. हिंदुओं में 2004-05 में प्रजनन 2.6 थी. यानी 10 महिलाओं के 26 बच्चे. यानी हिंदुओं के बजाय मुस्लिमों में प्रजनन दर 30.8 फीसदी ज्यादा है. आसान गणित लगाएं तो हर 10 महिलाओं पर हिंदुओं के बजाय मुस्लिमों में 10 बच्चे ज्यादा पैदा होते थे.

ये तो हुई 2004-05 वाले सर्वे की बात. अब लेटेस्ट सर्वे पर आते हैं. 2015-16 में नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे ने धर्म के आधार पर प्रजनन दर के आंकड़े दिए. इसके मुताबिक हिंदुओं में प्रजनन दर 2.6 से घटकर 2.1 रह गई है. यानी 2004-05 में 10 हिंदू महिलाएं औसतन 26 बच्चे पैदा करती थी, तो 2015-16 में 10 महिलाएं 21 बच्चे ही पैदा करती हैं. यानी औसतन हर महिलाए से 2 बच्चे. अब मुस्लिमों की बात करते हैं. मुस्लिमों में प्रजनन दर 3.4 से घटकर 2.6 हो गई. यानी 2004-05 में अगर हर 10 मुस्लिम महिलाओं के 34 बच्चे होते थे तो 2015-16 में घटकर ये संख्या 26 हो गई.

तो इन आंकड़ों से क्या नतीजा निकलता है. ये कि हिंदू और मुस्लिम दोनों में प्रजनन दर घट रही है. मुस्लिमों में अभी भी हिंदुओं से प्रजनन दर ज्यादा है. लेकिन पहले जितनी ज्यादा नहीं है. 2004-05 में हिंदू महिलाओं से मुस्लिम महिलाओं की प्रजनन दर 30.8 फीसदी ज़्यादा थी. 2015-16 में ये गैप घटकर 23.8 फीसदी हो गया. और इस घटने और बढ़ने का एक पैटर्न रहा है. आज़ादी के वक्त हिंदुओं और मुस्लिमों की प्रजनन दर में सिर्फ 10 फीसदी का फर्क था. उस वक्त दोनों समुदायों में ज़्यादा बच्चे पैदा करने का चलन था. 1970 के दशक में सरकार ने परिवार नियोजन के आक्रामक कदम उठाए तो उसके बाद से हिंदू महिलाओं में प्रजनन दर घटती चली गई. और मुस्लिम और हिंदू वाला गैप बढ़ गया. 1992-93 में ये गैप 33 फीसदी का था. इसके बाद से कम हो रहा है और लेटेस्ट आंकड़ों के हिसाब से 23.8 फीसदी का है, जैसा हमने पहले बताया.

अब हम उस पहलू पर आते हैं कि ज्यादा बच्चे पैदा करने के नुकसान जब इतने सालों से बताए जा रहे हैं, तो लोग मान क्यों नहीं रहे. यानी सरकार के कम्यूनिकेशन में कहां दिक्कत आती है. 1950 के दशक से ही केंद्र की सरकार ने आबादी कंट्रोल करने पर ध्यान देना शुरू कर दिया था. परिवार नियोजन के कार्यक्रम सरकारें लगातार चलाती आई हैं. लेकिन अब भी लोगों में कई तरह की भ्रांतियां हैं. नसबंदी को लेकर डर है, गर्भ निरोधक गोलियों को लेकर कई तरह के डर हैं. और कई जगह बच्चे पैदा करने को धार्मिक मान्यताओं से भी जोड़ लिया जाता है. तो अगर कोई सख्त कानून ना लाए तो, सरकार लोगों को कैसे आबादी के नियंत्रण के लिए मनाए. सरकार के स्तर पर और समाज के स्तर पर क्या होना चाहिए.

हमारा ये मानना है कि संसाधनों वाली कमी से अलग, ज्यादा बच्चे पैदा करना महिला के लिए भी ज़ुल्म है. कितनी ही महिलाओं की डिलवरी के दौरान मौत हो जाती है. बच्चे पैदा करने का असर महिला के स्वास्थ्य पर पड़ता है. हमारे समाज में ज्यादातर बच्चों की पूरी देखभाल का जिम्मा महिलाओं पर आता है. पुरुषों की भागीदारी कम होती है. यानी हर तरह से भुगतना महिलाओं को ही पड़ता है. इसलिए कम बच्चे पैदा करने पर जागरुकता होनी चाहिए. और अगर जागरुकता असर नहीं कर रही तो सरकारी सुविधाओं में कम बच्चे पैदा करने वालों को लाभ दिया जाना चाहिए. लाभ की भाषा सबको समझ में आती है. इसमें किसी समुदाय विशेष को निशाना बनाने की जरूरत भी नहीं है. आबादी कम रखना सबके हित में है. अगर किसी समुदाय को इस बारे में शंका हो तो सरकार को उनकी शंका भी दूर करने चाहिए. इस पहल में समाज और सरकार दोनों की बराबर की भागीदारी होनी चाहिए.


वीडियो- योगी सरकार की जनसंख्या नीति के पीछे बड़ा मकसद क्या है?

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