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बालाकोट हमले से पहले NSA अजीत डोभाल ने पाक को दिया था ये तगड़ा मैसेज, किताब में नया दावा

14 फरवरी 2019 और 26 फरवरी 2019. भारत के लोगों को ये दो तारीखें लंबे वक्त तक याद रहेंगी. जम्मू-कश्मीर के पुलवामा में जिस आत्मघाती आतंकी हमले में सीआरपीएफ के 40 जवानों की मौत हो गई थी, उसे 14 फरवरी 2019 को ही अंजाम दिया गया था. और इस हमले के 12 दिन बाद यानी 26 फरवरी 2019 को भारतीय वायुसेना ने पाकिस्तान की सीमा में घुसकर उसके बालाकोट इलाके में बमबारी की थी. लेकिन क्या इन दो तारीखों के बीच कुछ और भी हुआ था?

ये सवाल इसलिए, क्योंकि जल्दी ही आने वाली एक किताब में पुलवामा हमले से जुड़ा एक बड़ा दावा किया गया है. किताब के हवाले से बताया गया है कि पुलवामा आतंकी हमले के बाद भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (NSA) अजीत डोभाल और रिसर्च एंड एनालिसिस विंग (रॉ) ने पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी ISI के अधिकारियों से बैक चैनल बातचीत की थी.

बैक चैनल बातचीत का मतलब होता है इनफॉर्मल बातचीत. जिसका कोई रिकॉर्ड नहीं होता है. कोई प्रचार नहीं होता है.

जर्नलिस्ट एड्रियन लेवी और कैथी स्कॉट-क्लार्क की नई किताब ‘स्पाई स्टोरीज़: इनसाइड दि सीक्रेट वर्ल्ड ऑफ़ द रॉ एंड द आईएसआई’  इसी हफ्ते पब्लिश हो रही है. ये भारतीय और पाकिस्तानी खुफिया एजेंसियों के कथित गुप्त खुलासों पर आधारित है. किताब के कुछ हिस्सों के आधार पर दि हिंदू और इंडियन एक्सप्रेस ने कुछ घटनाओं के बारे में लिखा है.

दि हिंदू के मुताबिक, किताब के लेखकों ने लिखा है कि पुलवामा हमले के बाद ISI अधिकारियों ने दोनों पत्रकारों से संपर्क किया था. उन्होंने जैश-ए-मोहम्मद (JeM) के प्लान के बारे में जानकारी होने से इन्कार किया था. किताब में कहा गया है कि हमले को अफनागिस्तान के हेलमंद में प्लान किया गया था, न कि पाकिस्तान में. हालांकि, अजीत डोभाल और डिप्टी NSA राजिंदर खन्ना ने पाकिस्तानी अधिकारियों के संदेशों पर “भरोसा नहीं है” और “पाकिस्तानी सेना को अपमानित करने” के लिए बालाकोट हवाई हमले किए.

Ajit Doval Attends Investiture Ceremony
भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल. (तस्वीर- पीटीआई)

पठानकोट एयरबेस हमले में वर्दी वालों ने मदद की थी!

दि हिंदू के मुताबिक, किताब के लेखकों ने पठानकोट एयरबेस हमले को लेकर भी एक खुलासा किया है. उन्होंने लिखा है कि हमले के बाद भारतीय जांचकर्ताओं ने पाया था कि भ्रष्ट स्थानीय पुलिस अधिकारियों ने जैश के चार आतंकवादियों को पठानकोट एयरबेस में घुसकर हमला करने में मदद की थी. इस हमले में सुरक्षा बलों के सात जवान मारे गए थे. तब मोदी सरकार ने हैरानी भरा कदम उठाते हुए पाकिस्तानी जांचकर्ताओं की एक टीम को इस आतंकी हमले की जांच के लिए पठानकोट आमंत्रित किया था. लेकिन कुछ ही समय बाद दोनों देशों के बीच रिश्ते बिगड़ गए. और संयुक्त जांच योजना का कुछ नहीं हुआ. वहीं, जैश-ए-मोहम्मद के खिलाफ दायर NIA की चार्जशीट में इस बात का जिक्र नहीं था कि वर्दीधारी लोगों ने आतंकवादियों की मदद की थी.

कुलभूषण जाधव के बारे में क्या लिखा है?

किताब में कुलभूषण जाधव मामले का भी जिक्र है. पाकिस्तान ने उन्हें वहां कथित रूप से आतंकी हमलों की योजना बनाने के आरोप में मौत की सजा सुनाई थी. दि हिंदू ने लिखा है कि लेखकों ने ये भी निष्कर्ष निकाला है कि कुलभूषण जाधव भारतीय खुफिया एजेंसियों के लिए “ऐसेट” (यानी गुप्त सूचना देने वाले एजेंट) थे, अधिकारी नहीं. भारत ने कुलभूषण जाधव को लेकर पाकिस्तान के तमाम आरोपों का लगातार खंडन किया है और कहा है कि जाधव 2001 में रिटायर्ड हो गए थे और ईरान में पाकिस्तानी एजेंसियों द्वारा उनका अपहरण किया गया था. वहीं, किताब में कहा गया है कि कई भारतीय खुफिया एजेंसियों ने जाधव की ईरान से पाकिस्तान तक पहुंच होने के कारण उन्हें भर्ती करने में रुचि दिखाई थी.

इंडियन एक्‍सप्रेस ने भी किताब के हवाले से लिखा है कि कुलभूषण जाधव को पकड़ने के लिए ISI ने कराची में रह रहे खतरनाक गैंग्सटर उजैर बलोच के नेटवर्क का इस्‍तेमाल किया था. बताया जाता है कि उजैर बलोच के ईरानी बलूचिस्तान से गहरे संबंध हैं. उजैर बलूच एक जमींदार और व्‍यापारी भी है. ISI ने चाबहार शहर स्थित ईरानी बंदरगाह में जासूसी करने में उसका इस्तेमाल किया था.

जुलाई में ICJ के फैसले के बाद 2 सितंबर को पाकिस्तान ने भारतीय अथॉरिटीज़ को जाधव से मिलने दिया. ये पाकिस्तान द्वारा रिलीज़ किए गए जाधव के एक पुराने प्रॉपेगैंडा विडियो का स्क्रीनग्रैब है.
पाकिस्तान द्वारा रिलीज़ किए गए जाधव के एक पुराने प्रॉपेगैंडा विडियो का स्क्रीनग्रैब है.

अखबार के मुताबिक, किताब में ISI से जुड़े एक अधिकारी के हवाले से लिखा है कि 2014 में चाबहार के एक परिसर में ISI ने कुछ लोगों को पकड़ा था, जिन्‍हें वो रॉ अधिकारी मान रहे थे. पकड़े गए लोगों में से एक शख्‍स ऐसा भी था, जिसे वो पहचान नहीं पा रहे थे. लेकिन वो उस जगह पर बार-बार आता जाता रहता था. वो ईरानी नहीं था, लेकिन ऐसा लग रहा था जैसे वो समुद्री माल ढुलाई का काम करता है.

लेखकों ने ISI के एक कर्नल का जिक्र किया है, जिसने बताया कि ISI ने जाधव को पकड़ने में कोई जल्‍दबाजी नहीं की. वो ऐसे मौके की तलाश में थी कि जाधव कोई बड़ा कदम उठाए जिससे उन्हें पकड़ा जा सके.

किताब में ये भी बताया गया है कि जाधव 2001 के संसद हमले से नाराज थे. उन्होंने भारतीय एजेंसियों की सहायता करने की पेशकश की थी. वहीं मुंबई आतंकी हमले के चार साल बाद जाधव ने बताया था कि उनके बलोच परिवार के साथ अच्‍छे संबंध बन गए हैं और उनका संपर्क सीधे उजैर बलोच के भतीजे से हो गया है. किताब के मुताबिक, जाधव को कभी इस बात की भनक तक नहीं लगी कि वो ISI के बिछाए जाल में ही फंस रहे थे. उन्होंने जिस बलोच परिवार में घुसपैठ की थी वो ISI के लिए ही काम कर रहा था.

बुरहान वानी के बारे में क्या लिखा है?

किताब में कश्मीरी आतंकवादी और हिजबुल मुजाहिदीन के कमांडर बुरहान वानी को लेकर भी बड़े खुलासे किए गए हैं. बुरहान वानी के साल 2016 में मारे जाने के बाद पूरी घाटी में विरोध प्रदर्शन हुआ था. लेवी और स्कॉट-क्लार्क का कहना है कि वानी को बहुत पहले ही मारा जा सकता था, लेकिन भारतीय एजेंसियों ने वानी के नेटवर्क में घुसपैठ की थी और लगातार उस पर नजर बनाए रखी ताकि विदेशी आतंकवादियों को फंसाने के लिए उसका इस्तेमाल कर सकें.

दि हिंदू ने लिखा है कि किताब में जिन व्यक्तियों का जिक्र है उन तक पहुंचने की कोशिश की गई, लेकिन उनमें से कोई भी टिप्पणी करने के लिए राजी नहीं हुआ.


किताबवाला: पुलवामा हमले पर लिखी इस किताब के कवर पर उमर फ़ारुख़ की तस्वीर क्यों छापी गई?

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