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यूपी: बिना इजाज़त दाढ़ी रखने पर सब-इंस्पेक्टर सस्पेंड, क्या कहता है नियम?

उत्तर प्रदेश के बागपत ज़िले में एक सब-इंस्पेक्टर को बिना अनुमति दाढ़ी रखने की वजह से निलंबित कर दिया गया है. इंतसार अली बागपत ज़िले के रमाला पुलिस थाने में तैनात थे. इंतसार के मुताबिक़, उन्होंने नवंबर, 2019 से ही पुलिस विभाग में आवेदन डाला हुआ है कि उन्हें दाढ़ी रखने की इजाज़त दी जाए, मगर वो अभी तक पेंडिंग है.

बागपत के एसपी अभिषेक सिंह ने इस मामले पर मीडिया से कहा-

“बागपत के थाना रमाला में पोस्टेड सब-इंस्पेक्टर इंतसार अली को कल निलंबित कर दिया गया. ये बिना अनुमति के दाढ़ी रख रहे थे. इन्हें पहले भी इस प्रकरण में हिदायत दी जा चुकी थी और इनके खिलाफ नोटिस भी जारी हुआ था. इसके बावजूद अपने आचरण में कोई बदलाव नहीं लाना अनुशासनहीनता के दायरे में आता है. इसलिए इन्हें निलंबित कर इनके खिलाफ जांच बिठा दी गई है.”

इंतसार ने मीडिया को बताया कि वो पिछले 25 साल से पुलिस सेवा में हैं, और इससे पहले कभी भी उनकी दाढ़ी की वजह से किसी को कोई दिक्कत नहीं हुई. उन्होंने 1994 में कॉन्स्टेबल के पद पर सर्विस जॉइन की थी. वो शुरू से ही हल्की दाढ़ी रखते थे. मगर पिछले दो साल से उन्होंने लम्बी दाढ़ी रखनी शुरू की. इंतसार ने स्वीकारा कि उन्हें कई बार पदाधिकारियों ने इसके लिए टोका, इसीलिए उन्होंने पिछले साल नवंबर में विभाग में एक अर्ज़ी डाली थी और दाढ़ी रखने की अनुमति मांगी थी, जो कि अभी तक पेंडिंग है.

क्या कहता है कानून

हालांकि भारतीय संविधान का आर्टिकल 25 देश के हर नागरिक को किसी भी धर्म को मानने की, उसके मुताबिक आचरण करने की और धर्म का प्रचार करने की स्वतंत्रता है. कोई भी दाढ़ी रखने या किसी अन्य धार्मिक पहचान अपनाने के लिए स्वतंत्र है. हालांकि पुलिस ड्रेस कोड के अनुसार, सिख समुदाय के लोगों को छोड़कर कोई भी पुलिसकर्मी बिना विभागीय अनुमति के दाढ़ी नहीं रख सकता.

पहले भी आया है ऐसा मामला

ऐसा पहली बार नहीं हुआ है कि पुलिस सेवा में दाढ़ी रखने की वजह से किसी को टोका गया हो. इससे पहले 1985 में भी केरल स्टेट पुलिस में हेड-कॉन्स्टेबल के पद पर नियुक्त मोहम्मद फ़ासी ने राज्य के इंस्पेक्टर जनरल ऑफ़ पुलिस के खिलाफ़ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी कि आईजी उनकी दाढ़ी रखने की अपील को ख़ारिज कर दिया.

मोहम्मद फ़ासी का कहना था कि वो पुलिस के कोड ऑफ़ कंडक्ट का उल्लंघन किये बिना अपने धर्म का पालन करना चाह रहे थे, इसी वजह से उन्होंने इस बारे में इंस्पेक्टर जनरल से अनुमति भी मांगी थी.

इस मामले पर जस्टिस बालाकृष्ण मेनन की बेंच ने इस याचिका को ख़ारिज करते हुए कहा था-

“इसमें कोई शक नहीं है कि याचिकाकर्ता को अपने धर्म के पालन करने का मौलिक अधिकार है. लेकिन जब वो किसी सेवा में नियुक्त हों, खासकर पुलिस सेवा में, तो उन्हें पुलिस के अनुशासन के हिसाब से ही चलना होगा.”


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