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सभी आरोपियों को बरी करते हुए कोर्ट ने कहा - इन्होंने बाबरी मस्जिद को बचाने की कोशिश की थी

आज लखनऊ की स्पेशल CBI अदालत ने लगभग 28 साल पुराने बाबरी मस्जिद विध्वंस केस में अपना फ़ैसला सुना दिया है. स्पेशल CBI जज एसके यादव ने फ़ैसला सुनाते हुए कहा कि घटना पूर्वनियोजित नहीं थी. जो कुछ हुआ था, अचानक हुआ था.

ये कहते हुए कोर्ट ने सभी आरोपियों को बरी कर दिया. साथ ही ये भी कहा कि अभियोजन पक्ष इन आरोपियों की संलिप्तता को लेकर साक्ष्य पेश नहीं कर सका.

साथ को कोर्ट ने ये भी कहा है कि इन 32 आरोपियों ने बाबरी मस्जिद के विध्वंस को बचाने की कोशिश की. पीछे से भीड़ आयी और उन्होंने ढांचे को गिरा दिया. कोर्ट ने ये भी कहा कि आरोपियों ने किसी भी रूप में भड़काने का काम नहीं किया.

मामले की शुरुआत कहां से हुई?

6 दिसम्बर 1992 से. इस दिन दोपहर 12.15 बजे एक कारसेवक बैरकेडिंग फ़ांदकर बाबरी मस्जिद के भीतर घुस जाता है. एक कारसेवक के पीछे-पीछे कई कारसेवक मस्जिद परिसर में घुस जाते हैं. क़ानूनी भाषा में इस मस्जिद परिसर को विवादित ढांचा कहा गया है. अगले एक से डेढ़ घंटे में पहली गुंबद गिरती है. और धीरे-धीरे कारसेवकों की भीड़ मस्जिद को गिरा डालती है. इसी दिन शाम 5 बजकर 15 मिनट. थाना रामजन्मभूमि में बाबरी मस्जिद विध्वंस केस की पहली FIR दर्ज की जाती है. थानाध्यक्ष प्रियंवदा नाथ शुक्ला. FIR संख्या 197/92. अज्ञात कारसेवकों के खिलाफ़. इस FIR में डकैती, धर्मस्थल को क्षति पहुंचाने और धार्मिक सौहार्द बिगाड़ने समेत आठ धाराओं में मुक़दमा दर्ज किया जाता है. 

इसके 10 मिनट बाद यानी 5:25 मिनट पर इसी थाने में एक दूसरी FIR दर्ज की जाती है. 8 लोगों के खिलाफ़. FIR संख्या 198/92. चौकी इंचार्ज गंगा प्रसाद तिवारी द्वारा. धार्मिक उन्माद भड़काने, अफ़वाह फैलाने, जानमाल की क्षति पहुंचाने, आपराधिक साज़िश रचने जैसी गम्भीर धाराओं में मुक़दमा दर्ज किया गया. इस FIR में बड़े नाम शामिल थे. कौन-कौन से नाम? लालकृष्ण आडवाणी, मुरलीमनोहर जोशी, उमा भारती, विनय कटियार, अशोक सिंघल, गिरिराज किशोर, विष्णु हरि डालमिया और साध्वी ऋतांभरा. इनमें से अशोक सिंघल, गिरिराज किशोर और विष्णु हरि डालमिया की मौत हो चुकी है. 

इन दो प्रमुख FIR के बाद 47 FIR अलग-अलग दिनों पर पत्रकारों की ओर से मस्जिद विध्वंस के दौरान ख़ुद पर हमले के मामले पर दर्ज करवाई गयीं.

शुरू हुई सुनवाई

इसके बाद इस मामले में CBI की जांच शुरू होती है. लंबे समय तक ललितपुर, झांसी में CBI की अस्थायी कोर्ट में मामले 198/92 की सुनवाई होती रही, वहीं लखनऊ की विशेष अदालत में मामले 197/92 की सुनवाई हुई. ललितपुर वाला मामला उठाकर यूपी की रायबरेली कोर्ट में स्थानांतरित कर दिया गया. CBI ने 1994 में कहा कि दोनों मामलों को लखनऊ में सुना जाए.

5 अक्टूबर 1993. CBI ने इस मामले में पहली चार्जशीट दायर की. इस चार्जशीट में शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे, भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी, मुरलीमनोहर जोशी, बृजभूषण शरण सिंह, तत्कालीन मुख्यमंत्री कल्याण सिंह, विहिप नेता अशोक सिंघल, उमा भारती, विनय कटियार, साध्वी ऋतांभरा, गिरिराज किशोर, शिवसैनिक पवन पांडेय, अयोध्या के तत्कालीन डीएम आरएस श्रीवास्तव और एसएसपी डीबी राय का नाम था.

स्पेशल कोर्ट, फिर इलाहाबाद हाईकोर्ट में हुई बहुत सारे उठापटक के बाद ये मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा. 19 अप्रैल 2017 को सुप्रीम कोर्ट ने आदेश जारी किया. आडवाणी और बाक़ी लोगों को आपराधिक साज़िश के आरोप के अधीन लाया गया. और CBI कोर्ट को ये आदेश जारी किया गया कि वो अगले 2 साल में इस मामले की सुनवाई पूरी कर ले. 2 साल की मियाद पूरी हो गयी. फिर 19 जुलाई 2019 को सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई और फ़ैसले की मियाद को 9 महीने के लिए बढ़ा दिया. कहा कि अग़ले 6 महीने में सभी गवाहों और आरोपियों के बयान दर्ज कर लें. और उसके बाद फ़ैसला. इसके बाद बेंच को फिर से एक्सटेंशन दिया गया. 

4 जून 2020 से फिर से आरोपियों की पेशी कोर्ट में शुरू हुई. अगस्त के आख़िर तक फ़ैसला सुनाया जाना था. एक महीने का और एक्सटेशन दिया गया बेंच को. और आख़िर में 30 सितम्बर को कोर्ट ने अपना फ़ैसला सुना दिया.


लल्लनटॉप वीडियो : बाबरी मस्जिद विध्वंस के अगले दिन PM पीवी नरसिम्हा राव ने संसद में क्या कहा?

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