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उत्तराखंड : मोदी सरकार के आश्वासन के बाद फिर से आमरण अनशन पर क्यों बैठ गए हैं आत्मबोधानंद?

हरिद्वार स्थित मातृसदन से जुड़े संत आत्मबोधानंद एक बार फिर से भूख हड़ताल पर बैठे हुए हैं. 18 अगस्त से चल रही ये भूख हड़ताल उत्तराखंड में गंगा पर क्रियाशील विद्युत परियोजनाओं पर रोक लगाने को लेकर है. इसके पहले भी आत्मबोधानंद एक दफ़ा भूख हड़ताल पर बैठ चुके हैं. तब 194 दिनों तक चली उनकी भूख हड़ताल केंद्र सरकार के आश्वासन पर ख़त्म हुई थी.

क्या है पूरा मामला? 

मामला है भिन्न-भिन्न परियोजनाओं पर रोक का और संतों की मौत की हाई लेवल जांच का. पहले बात करेंगे परियोजनाओं की. 

उत्तराखंड में रहने वाला एक धड़ा गंगा और उसकी सहायक नदियों पर चल रही हाइड्रो-इलेक्ट्रिक प्रोजेक्ट यानी पानी से बिजली बनाने वाली परियोजनाओं पर रोक की मांग लम्बे समय से उठाता रहा है. आत्मबोधानंद की भी यही मांग है. वो दावा करते हैं कि उत्तराखंड में गंगा पर चल रही इन परियोजनाओं की वजह से पहाड़ और नदी ख़तरे में हैं.

किन परियोजनाओं की बात हो रही है?

कुल चार परियोजनाएं हैं-

1 – तपोवन विष्णुगाड – क्षमता 520 मेगावाट

2 – विष्णुगाड पिपलकोटी – क्षमता 444 मेगावाट

3 – सिंगोली भटवारी – क्षमता 99 मेगावाट

4 – फाटा ब्यूंग – क्षमता 76 मेगावाट

इनमें से तपोवन विष्णुगाड वो प्रोजेक्ट है, जो 7 फ़रवरी 2021 को चमोली में ग्लेशियर फटने के बाद तबाह हो गया था. दी लल्लनटॉप से बातचीत में आत्मबोधानंद दावा करते हैं,

“यहां पहाड़ों पर बन रहे सारे प्रोजेक्ट्स को देख लीजिए. सबसे पर्यावरण बर्बाद हो रहा है. जान को नुक़सान हो रहा है. 7 फ़रवरी को तपोवन वाले प्रोजेक्ट में जो ग्लेशियर फटने की वजह से बाढ़ आयी, वो तो बस एक उदाहरण है.”

परियोजनाओं पर रोक के अलावा आत्मबोधानंद अवैध खनन का आरोप भी लगाते हैं. कहते हैं,

“आप हरिद्वार से थोड़ा सा नीचे जाइए, आपको कई सारे स्टोन क्रशर चलते हुए मिलेंगे. उन्हें पत्थर तोड़ने के लिए कहां से मिल रहे हैं? जो पत्थर तोड़ते हैं, उनकी कार्बन डेटिंग करवाइए. आपको पता चलेगा कि वो हज़ारों-लाखों साल पुराने पत्थर हैं. मेरी ये भी मांग है कि इस अवैध खनन पर प्रतिबंध लगाया जाए.”

पहले किया था 194 दिन तक अनशन

आत्मबोधानंद इसके पहले साल 2019 में इन्हीं मुद्दों को लेकर 194 दिनों की भूख हड़ताल पर बैठ चुके हैं. तब नेशनल मिशन फ़ॉर क्लीन गंगा यानी NMCG की तरफ़ से आत्मबोधानंद को आश्वासन दिया गया था कि उनकी बातों पर विचार किया जाएगा. मातृसदन से ही जुड़े एक दूसरे संत दयानंद ने बताया,

“उस समय गंगा और उसकी सहायक नदियों पर बन रही परियोजनाओं पर रोक संबंधी विचार विमर्श के लिए कमिटी बनाने की बात हमसे कही गयी थी. इसी पर आत्मबोधानंद ने अपना व्रत ख़त्म किया था. लेकिन उस बात को दो साल से ज़्यादा हो चुके हैं. और ज़रा भी अमल नहीं किया गया है.”

आत्मबोधानंद और उनके साथी कहते हैं कि ये नया आन्दोलन सरकार को उसके वादे याद दिलाने के लिए हैं. ये लोग आरोप लगाते हैं कि सरकार ने 2019 में किया अपना वादा तो पूरा किया नहीं, साथ ही हाइड्रो-इलेक्ट्रिक प्रोजेक्ट्स का निर्माण और तेज़ कर दिया.

आत्मबोधानंद हमसे बातचीत में कहते हैं,

“मैंने कहीं सुना था कि बांधों के ज़रिए जो बिजली बनायी जा रही है, उसकी एक यूनिट की क़ीमत 12 रुपए है, और यही काम आप पनचक्की लगाकर करते हैं तो कीमत 6 से 7 रुपए प्रति यूनिट हो जाती है. और पहाड़ों पर तो हवा की कोई कमी ही नहीं है.”

वो आगे कहते हैं,

“आप माइक्रोडैम बनाते तो कोई बात भी थी. लेकिन सरकार को बड़े डैम बनाने हैं. डैम बन गया, फिर आपको कुछ समय में टरबाइन के ब्लेड बदलने हैं. फिर तो प्रॉफ़िट ही है. और आप देख ही रहे हैं कि लगातार पहाड़ गिर रहे हैं, भूस्खलन हो रहा है, ग्लेशियर फट रहे हैं. तो सरकार वैकल्पिक साधनों के बारे में क्यों नहीं सोच सकती?”

संतों की मौत की जांच की मांग

आंदोलन कर रहे आत्मबोधानंद और उनके सहयोगियों का ये भी कहना है कि बीते कुछ समय में धरना और प्रदर्शन कर रहे संतों की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हुई है.

स्वामी सानंद उर्फ़ प्रोफेसर जीडी अग्रवाल

मातृ सदन के दयानंद हमसे बातचीत में गंभीर आरोप लगाते हैं. वो कहते हैं कि,

“सबसे पहले स्वामी निगमानंद जी ने प्रोटेस्ट किया था. प्रोटेस्ट के बाद उनकी रहस्यमय तरीक़े से तबीयत ख़राब हुई, फिर मौत हो गयी. उसके बाद स्वामी सानंद — जो पहले प्रोफेसर जीडी अग्रवाल के नाम से जाने जाते थे — उन्होंने भी साल 2018 में तपस्या शुरू की. इन्हीं 4 परियोजनाओं के खिलाफ़. वो एकदम ठीक थे. फिर भी प्रशासन ने उन्हें ऋषिकेश एम्स में भर्ती करा दिया. 24 घंटे के अंदर उनकी मौत हो गयी.

उसके बाद साध्वी पद्मावती बैठीं 2019 में तपस्या पर. प्रशासन ने उन्हें भी ज़बरदस्ती दून अस्पताल में भर्ती करा दिया. अस्पताल में उन्हें न जाने क्या सुंघा दिया गया, जिसके बाद उनकी हालत बिगड़ती चली गयी. दिल्ली इलाज कराने से भी रोका गया. इतने में उनकी हालत इतनी ख़राब हो गयी कि वो आज तक व्हीलचेयर पर हैं. हमारे आंदोलन की ये भी मांग है कि इन सभी घटनाओं की CBI या SIT द्वारा जांच की जाए.”

प्रशासन का क्या कहना है?

प्रशासन का पक्ष जानने के लिए हमने बात की हरिद्वार के ज़िलाधिकारी विनय शंकर पाण्डेय से. उन्होंने कहा,

“जिन मामलों की ये लोग CBI जांच चाह रहे हैं, उनमें से दो मामलों की जांच पहले ही हो चुकी है. फिर से जांच की मांग उठाने का औचित्य समझ नहीं आता है. साथ ही ये लोग अवैध खनन की बात करते हैं. उतराखंड में 30 सितंबर तक वैसे ही खनन पर रोक लगी रहती है. इसके अलावा इनका मुद्दा संतों की सुरक्षा का है, तो ज़िला प्रशासन द्वारा इन्हें इनकी सुविधानुसार सुरक्षा मुहैया करायी ही जाती है.”

ज़िलाधिकारी विनय शंकर पाण्डेय आगे कहते हैं कि देखिए, इनकी बहुत सी मांगें ज़िला स्तर पर सॉल्व नहीं की जा सकती हैं. फिर भी एसडीएम सदर और पुलिस विभाग के सर्किल अफ़सर इनसे रोज़ मुलाक़ात करते हैं. डॉक्टरों की टीम रोज़ाना इनकी जांच करने जाती है. मेरे पास लगातार रिपोर्ट आ रही है इनकी, अभी तक साढ़े 4 से 5 किलो वज़न गिर चुका है.


वीडियो : अगर बांध नहीं बनाया जाता, तो उत्तराखंड के चमोली में ये आपदा न होती?

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