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अपना दल: ये मां-बेटी नहीं, सास-दामाद का झगड़ा है, जानें अंदर की कहानी

ई तो होना ही था. अपना दल अब भाजपा का नहीं रहा. अमित शाह से हाथ छुड़ाकर अपने रास्ते चल दिया है. यूपी चुनावों से ठीक पहले.

लखनऊ में शुक्रवार को ‘अपना दल’ की मीटिंग के बाद पार्टी प्रेसिडेंट कृष्णा पटेल ने बीजेपी से ‘कट्टी’ का ऐलान कर दिया. वो नाक फुलाए हुए हैं क्योंकि बीजेपी ने उनकी बिटिया अनुप्रिया पटेल को केंद्र में मंत्री बना दिया. मां-बेटी में एकदम नहीं बनती. पिछले साल कलह ज्यादा बढ़ गई थी, जिसके बाद कृष्णा ने अनुप्रिया को पार्टी से निकाल दिया था.

लेकिन ये झगड़ा मां-बेटी का भी है और सास-दामाद का भी. रोहनिया उपचुनाव की सीट के चक्कर में मां-बेटी का पुराना शीत युद्ध खुल्लमखुल्ला सामने आ गया. वह इस अदावत का प्रस्थान बिंदु था. कैबिनेट विस्तार उसी का विस्तार है. आइए उस दुश्मनी की बात करते हैं जो 2017 यूपी चुनावों की अहम पॉलिटिकल घटना साबित हो सकती है. कुर्मी वोट बंटे तो क्या होगा? नहीं बंटे तो किधर जाएंगे? आकलन होने लगे हैं. आइए, जरा कल, आज और कल को टटोल लिया जाए.

अनुप्रिया पटेल
अनुप्रिया पटेल

35 साल की अंग्रेजीभाषी अनुप्रिया तेजी से ताकत जुटा रही थीं, लेकिन पिछले साल  मां ने अपनी ही पार्टी से निकाल दिया. लेकिन तब तक वह सांसद हो चुकी थीं. दिल्ली के नामी लेडी श्रीराम कॉलेज से पढ़ी हैं. दिल्ली की सेमिनारों में उन्हें बुलाया जाता और वहां पिछड़ों का पक्ष वह अंग्रेजी-मिश्रित-हिंदी में रखतीं. बीजेपी को कैडर वाली मां और शानदार प्रोफाइल वाली बेटी में से एक को चुनना था. अमित शाह ने अनुप्रिया पर दांव खेला.

अमित शाह इतने नादान नहीं कि इसका खतरा न समझते हों. आप चतुराई ही कहिए कि ये जानते हुए भी वो 6 दिन पहले कृष्णा पटेल के साथ मंच साझा कर आए. 2 जुलाई को अपना दल संस्थापक दिवंगत सोनेलाल पटेल का जन्मदिन था. कृष्णा पटेल की वाराणसी में ‘जनस्वाभिमान रैली’ थी, जिसमें अमित शाह पहुंचे. कुर्मियों को ये संदेश देने का मकसद था कि असली मसीहा हम ही हैं, क्योंकि हमारे पास दिल्ली की ताकत है. इसी मंच से अमित शाह ने नीतीश कुमार को ‘वोटकटवा’ कहा; जो कुर्मी वोटरों के सहारे यूपी में अपनी ताकत का विस्तार चाह रहे हैं.

नीतीश के साथ कुर्मी मोर्चा बनाएंगी अनुप्रिया की मां?

बीजेपी से तलाक के बाद अपना दल प्रवक्ता आरबीएस पटेल बोले, ‘बीजेपी ने गठबंधन धर्म नहीं निभाया. अनुप्रिया की गतिविधियों के बारे में बताए जाने के बावजूद बीजेपी ने इसका संज्ञान नहीं लिया.’ कृष्णा पटेल अब नीतीश कुमार के साथ मिलकर कुर्मी मोर्चा बनाने की फिराक में हैं. 21 अगस्त को वह वाराणसी में रैली करेंगी.

कृष्णा पटेल ने बीजेपी के साथ बहुत कामयाबी हासिल की, लेकिन अब मामला पर्सनल हो गया है. इसलिए उन्होंने अपने ‘सजातीय’ नीतीश कुमार से गठजोड़ का मन बना लिया है. खबर उड़ रही है कि अपना दल और जेडीयू के बीच गठबंधन का औपचारिक ऐलान अगस्त में हो सकता है. नीतीश तो ये भी चाहेंगे कि कांग्रेस को भी जोड़कर यूपी में भी महागठबंधन बना लें. कुछ पत्रकारों का दावा है कि कृष्णा पटेल और उनकी बिटिया पल्लवी की इस बारे मे शरद यादव से फोन पर बात हुई है. अगले राउंड की बातचीत आमने-सामने होगी, जिसमें नीतीश भी मौजूद होंगे.


UP में कुर्मियों का असर

यानी अब यूपी की लड़ाई में तीन कुर्मी मोर्चे होंगे. एक तरफ मां कृष्णा पटेल, नीतीश कुमार और अपना दल का संगठन और पारंपरिक कैडर. दूसरी तरफ NDA की तरफ से बेटी अनुप्रिया पटेल, मंत्री संतोष गंगवार और राज्यसभा सांसद विनय कटियार. तीसरा खेमा होगा बेनी प्रसाद वर्मा का. वो प्रदेश के सबसे असरदार कुर्मी नेता रहे हैं. 2009 लोकसभा चुनाव में जब कांग्रेस यूपी से 22 सीटें लाई थी, तो उसका सबसे बड़ा ओबीसी चेहरा वर्मा ही थे. वर्मा सपा से कांग्रेस में गए थे, अब वापस सपा में आ गए हैं.

कुर्मी, यादव के बाद प्रदेश की दूसरी सबसे बड़ी ओबीसी जाति है. 1954 की जाति जनगणना के मुताबिक, सूबे में 6 फीसदी कुर्मी थे. अब उनकी संख्या 8-9 फीसदी मानी जाती है. इलेक्शन कमिशन के मुताबिक, 403 विधानसभा सीटों पर उकी मौजूदगी है. लेकिन 16 जिलों में उनकी संख्या काफी कुछ तय करती है. ये जिले पूर्वांचल के हैं- संतकबीर नगर, मिर्जापुर, सोनभद्र, बरेली, जालौन, उन्नाव, फतेहपुर, प्रतापगढ़, कौशांबी, इलाहाबाद, सीतापुर, बहराइच, श्रावस्ती, बलरामपुर, सिद्धार्थनगर और बस्ती. इन 16 जिलों में 6 से 11 फीसदी कुर्मी वोट हैं, जो जीतते को हराने के लिए काफी हैं.

यूपी में कुर्मियों के कई सरनेम हैं. पटेल, निरंजन, वर्मा, सचान, गंगवार, कटियार आदि. उत्तर प्रदेश के कुर्मी आर्थिक तौर पर मजबूत रहे हैं. उनके पास ज़मीनें भी रही हैं. बिजनेस और सरकारी नौकरियों में भी उनकी हिस्सेदारी कम नहीं है. कानपुर-इलाहाबाद और बनारस मंडल की सीटों के कुर्मी वोटों पर अपना दल की ठीक-ठाक पकड़ है. अब यही देखना बाकी है कि कुर्मी वोटर तीनों मोर्चों में बंटता है या किसी एक खेमे के पास एकमुश्त जाता है.


अपना दल का इतिहास: मायावती से जले तो अलग हुए

अपना दल बना था नवंबर 1995 में. अनुप्रिया के पिता डॉ. सोनेलाल पटेल फाउंडर थे. वो कांशीराम के करीबी थे और बीएसपी के फाउंडर नेताओं में थे. लेकिन कांशीराम जब मायावती को पार्टी में अहमियत देने लगे तो सोनेलाल पटेल को ये बात पसंद नहीं आई. विनम्रता वैसे भी मायावती का गुण कभी नहीं रहा. इससे पटेल की नाराजगी बढ़ती चली गई. 1995 में बीएसपी को पहली बार गठबंधन सरकार बनाने का मौका मिला. मुख्यमंत्री पद के लिए कांशीराम ने मायावती को चुना. ये सरकार 5 महीना चली. जून से अक्टूबर तक. लेकिन इससे बीएसपी के ब्लैडर में नाराजगी की हवा इतनी भर चुकी थी कि कई लोग पार्टी छोड़ गए.

सोनेलाल पटेल भी इन्ही में से थे. मायावती सरकार गिरने के तीन हफ्तों के अंदर उन्होंने ‘अपना दल’ बना लिया. बीएसपी का जोर तब दलित वोटों पर ही ज्यादा था. लेकिन सोनेलाल पटेल ने अपना दल को सभी जाति-धर्मों की पार्टी बताया. उनकी शुरुआती पॉलिटिक्स को आप उनके झंडे से समझिए. उनके झंडे में दो रंग थे, भगवा और नीला. भगवा हिंदुत्व का रंग है और दलित बहुजनवादियों का रंग है. इलेक्शन कमिशन ने उन्हें चुनाव चिह्न दिया, ‘कप और प्लेट.’

अपना दल का झंडा

लेकिन पहली सीट लेने के लिए अपना दल को सात साल इंतज़ार करना पड़ा. माफिया डॉन से नेता बने अतीक अहमद 2002 में इलाहाबाद से अपना दल के टिकट पर चुनाव जीत गए. मगर ये पार्टी की नहीं, अतीक की अपनी जीत थी. इससे पार्टी की लोकप्रियता में कोई इजाफा नहीं हुआ. 2007 विधानसभा और 2009 लोकसभा चुनाव में इन्हें एक्कौ सीट नहीं मिली.

BJP से हाथ मिलाया और वारे-न्यारे हो गए

2009 में सोनेलाल पटेल की बिटिया अनुप्रिया ने राजनीतिक महत्वाकांक्षी नौजवान आशीष सिंह से शादी कर ली. इसके 20 दिन बाद सोनेलाल पटेल सड़क हादसे में गुजर गए. 14 साल हो गए थे उन्हें पार्टी बनाए, पर दुर्भाग्य कि विधायकी तक नसीब नहीं हुई. उनके बाद पत्नी कृष्णा पटेल ने पार्टी का काम-काज अपने हाथ में ले लिया. इस दौरान अनुप्रिया और आशीष, पार्टी को और पार्टी के भीतर खुद को मजबूत बनाने में जुटे रहे.

मिर्जापुर और वाराणसी के आसमान में उड़ने वाले पक्षी बताते हैं कि अनुप्रिया-आशीष ने इस दौरान पार्टी की कमान हासिल करने की कोशिश भी कई बार की, लेकिन कृष्णा पटेल ने उन्हें कामयाब नहीं होने दिया. कुछ राजनीतिक जानकार बताते हैं कि सोनेलाल पटेल जब जिंदा थे तो अनुप्रिया को ही अपना राजनीतिक वारिस बनाना चाहते थे.

काफी इंतजार के बाद 2012 में अपना दल को कामयाबी मिली. अनुप्रिया पटेल वाराणसी की रोहनिया सीट से विधानसभा चुनाव जीत गईं. यहां से उनका कद पार्टी में बढ़ने लगा. इस चुनाव में अपना दल ने सर्जन अयूब की बनाई पीस पार्टी के साथ गठबंधन किया था जो उस इलाके में मुसलमानों की पार्टी कही जाती है. लेकिन दो साल में ही कृष्णा पटेल अपना मुस्लिम प्रेम त्यागकर बीजेपी के साथ आ गई. 2014 का लोकसभा चुनाव उन्होंने अमित शाह की अगुवाई वाली बीजेपी के साथ लड़ा. अपना दल दो सीटों पर लड़ी और जीत भी गई.

2014 चुनाव से पहले. मिर्जापुर की रैली में मोदी के साथ कृष्णा पटेल.
2014 चुनाव से पहले. मिर्जापुर की रैली में मोदी के साथ कृष्णा पटेल.

पहली बार पार्टी के दो नुमाइंदे  दिल्ली की संसद तक पहुंचे. ये थे मिर्जापुर सीट से अनुप्रिया पटेल और प्रतापगढ़ से हरिवंश सिंह. यह चौंकाने वाली कामयाबी थी. कुछ ही दिनों बाद विश्वनाथगंज विधानसभा में उपचुनाव हुए. अपना दल के राकेश वर्मा जीत गए. एक पार्टी जो लंबे समय तक चुनावी कामयाबी के लिए तरसती रही, उसे बीजेपी से दोस्ती का जबरदस्त फायदा मिला था.

कामयाबी सबसे झिलती नहीं है, वही हुआ कि फिर गुब्बारा फट गया

फिर बवाल हो गया. अनुप्रिया के संसद जाने से रोहनिया विधानसभा सीट खाली हो गई थी. अनुप्रिया चाहती थीं कि इस सीट से उनके पति आशीष को कैंडिडेट बनाया जाए. लेकिन अनुप्रिया बहुत ताकत बटोरती जा रही थीं. इसलिए कृष्णा पटेल ने अपने दामाद को ये सीट देने से इनकार कर दिया. कृष्णा पटेल खुद चुनावी मैदान में उतरीं.

अनुप्रिया ने मां के लिए प्रचार भी नहीं किया, बल्कि बताते हैं कि अंदरखाने उन्हें हराने में लग गईं. नतीजे आए तो कृष्णा हार चुकी थीं. उनके पास खीझ निकालने का एक ही तरीका था. उन्होंने वो फैसला ले लिया, जो वो कई सालों से टाल रही थीं. बिटिया अनुप्रिया को महासचिव पद से हटा दिया. आने वाले कुछ महीनों में ये दरार और बढ़ी. 7 मई 2015 को अनुप्रिया और उनके 6 करीबी नेताओं को पार्टी ने ‘कट लो’ की पर्ची थमा दी.

कृष्णा पटेल, अनुप्रिया पटेल.
कृष्णा पटेल, अनुप्रिया पटेल.

बताते हैं कि यूपी चुनाव से पहले अनुप्रिया पटेल को केंद्र में लाने का फैसला अमित शाह का था. कुर्मी वोट बिना बंटे अगर बीजेपी को मिल गया तो उनकी आधी बाधा पार समझो. कृष्णा और नीतीश के मेल के लिए अमित शाह संभवत: मानसिक तौर पर तैयार भी होंगे. लेकिन अगर ये दोनों ताकतें कांग्रेस के साथ मिल गईं तो क्या समीकरण बनेंगे, ये नए सिरे से सोचना पड़ेगा.

क्या अनुप्रिया बीजेपी की हो जाएंगी?

सूत्र बताते हैं कि इसकी संभावना है, पर बहुत ज्यादा नहीं. अनुप्रिया अपने अगल-बगल के छुटभैये नेताओं के लिए बीजेपी में सम्मानजनक हैसियत चाहेंगी, जो वहां मिलने से रही. अमित शाह भी किरण बेदी के बाद दूसरा रिस्क लेने के मूड में नहीं हैं. बीजेपी के पुराने नेता और कैडर अनुप्रिया को सिर पर बैठाने से नाराज हो सकते हैं.

लेकिन फिर चुनाव निशान का पंगा तो पड़ेगा ही. क्योंकि अनुप्रिया के कोटे से चुनाव लड़ने वाले किस सिंबल से लड़ेंगे? वैसे लोग बताते हैं कि अनुप्रिया खुद को अपना दल की अध्यक्ष ही लिखती हैं. दरअसल कृष्णा और अनुप्रिया दोनों ने चुनाव आयोग को इस बाबत चिट्ठी दी थी. बताते हैं कि चुनाव आयोग ने दोनों को कोर्ट से मामला निपटाने को कहा. चुनाव आयोग की उस चिट्ठी के आधार पर दोनों खुद को अध्यक्ष बताते हैं, लेकिन कोई कोर्ट नहीं जाता, क्योंकि तब एक की अध्यक्षता तयशुदा तौर पर चली जाएगी. हालांकि इसमें शक नहीं है कि अपना दल का पारंपरिक कैडर कृष्णा पटेल के साथ है. जो नौजवान महत्वाकांक्षी हैं, कम समय में ज्यादा चाहते हैं, इंटरनेट-सोशल मीडिया जानते हैं, वो अनुप्रिया के साथ हैं.

लेकिन अमित शाह ने अपना शॉट खेल दिया है. अब कृष्णा पटेल की बारी है. नीतीश का असर बिहार के बाहर नहीं है. हालांकि उनकी छवि कुर्मी वोटरों में अच्छी ही है. उनके पास कैडर कमजोर है. इसमें कृष्णा पटेल मदद कर सकती हैं. और कांग्रेस ने अगर इन दोनों को साथ ले लिया, तो इसका क्या असर होगा, अभी कहना मुश्किल है. पर अमित शाह की खोपड़ी में खूब न्यूरॉन हैं. वो इसका आकलन कर रहे होंगे. क्या पता इसका नुकसान कम हो और फायदा ज्यादा.


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