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नरेंद्र मोदी के इस मंत्री के लिए बेटे पर हिंसा की FIR कोई मायने नहीं रखती!

भागलपुर हिंसा के आरोपी और केंद्रीय मंत्री अश्विनी चौबे के बेटे अरिजीत शाश्वत चौबे को पुलिस घटना के 9 दिन बाद भी गिरफ्तार नहीं कर पाई है. इस मामले में जो कसर बची थी, वो 25 मार्च को अश्विनी चौबे के बयान ने पूरी कर दी. उन्होंने FIR को झूठ का पुलिंदा बताते हुए सवाल पूछा है कि आखिर उनका बेटा क्यों सरेंडर करे.

जुलूस के समय अरिजीत चौबे (बाइक पर पीछे खड़े हुए)
जुलूस के समय अरिजीत चौबे (बाइक पर पीछे खड़े हुए)

भागलपुर में 17 मार्च को हिंदू नव वर्ष का जुलूस निकाला गया था, जो नाथनगर इलाके में भयानक हिंसा के साथ खत्म हुआ. भारतीय नव वर्ष समिति ने ये जुलूस अरिजीत के नेतृत्व में निकाला था. जुलूस की इजाज़त के लिए समिति ने SDO ऑफिस में ऐप्लिकेशन भी दी थी, लेकिन प्रशासन की तरफ से इजाज़त दी नहीं गई थी. इस मामले में 19 मार्च को दो FIR दर्ज की गईं, लेकिन अरिजीत को अब तक अरेस्ट नहीं किया गया है.

परमीशन लेने की ऐप्लिकेशन
परमीशन लेने की ऐप्लिकेशन

बेटे अरिजीत की गिरफ्तारी न होने पर केंद्रीय राज्य स्वास्थ्य मंत्री पिता अश्विनी चौबे ने 25 मार्च को बयान दिया,

‘मेरे बेटे ने कोई गंदा काम नहीं किया है. FIR तो झूठ का पुलिंदा है, उसपे क्यों सरेंडर करेगा? अरिजीत कहीं छिपा हुआ नहीं है. वो आज अपने गांव भी गया और भगवान राम की आरती भी उतारी.’

एक केंद्रीय मंत्री का ऐसा बयान देना बेहद शर्मनाक है. ये वही नेता हैं, जो संविधान की शपथ लेकर मंत्री बने हैं. आज वो पुलिस द्वारा दर्ज की गई एक FIR को झूठ का पुलिंदा बता रहे हैं. पुलिस भी हमारे ही सिस्टम का एक हिस्सा है. देशभर में पुलिस को लेकर FIR दर्ज न करने की तमाम शिकायतें आती हैं. यहां पुलिस ने एक केंद्रीय मंत्री के बेटे की गलती पर FIR दर्ज की, तो उसे झूठ का पुलिंदा बताया जा रहा है.

अश्विनी चौबे जिस पार्टी से ताल्लुक रखते हैं, वो बिहार सरकार में हिस्सेदार है. उनकी पार्टी बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह का तर्क है कि उनकी पार्टी को मेघालय में सरकार बनाने वाली पार्टी नहीं कह सकते, क्योंकि न तो उनका मुख्यमंत्री और न उप-मुख्यमंत्री है. लेकिन बिहार में तो उप-मुख्यमंत्री उन्हीं की पार्टी का है. केंद्र में भी उनकी ही पार्टी की सरकार है. इन हालात में भी अगर उनके बेटे के खिलाफ FIR दर्ज हुई है, तो वो कोई बेसिर-पैर की बात तो होगी नहीं.

उप-मुख्यमंत्री सुशील मोदी (बाएं) और मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी (दाएं)
उप-मुख्यमंत्री सुशील मोदी (बाएं) और मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी (दाएं)

अरिजीत के खिलाफ एक FIR के आधार पर वॉरंट जारी किया जा चुका है. जिन धाराओं के तहत ये वॉरंट जारी किया गया है, उनमें से दो गैर-ज़मानती धाराएं हैं. फिर भी अरिजीत का बेखौफ घूमना बिहार सरकार के लिए एक बेशर्म चैलेंज जैसा है. मुख्यमंत्री नीतीश कुमार सुशासन की बात करते हैं. हिंसा के एक आरोपी को गिरफ्तार न कर पाने को वो किस तर्क से सुशासन ठहराएंगे.

अश्विनी चौबे के बयान के अलावा खुद अरिजीत का बयान बहुत ही बेहूदा है. अरिजीत ने कहा है,

‘पुलिस ने अपनी विफलता छिपाने के लिए मेरे खिलाफ FIR दर्ज की है. मैं सरेंडर क्यों करूं? मैंने न्यायलय की शरण में हूं. भागते वो हैं, खोजना उनको पड़ता है, जो कहीं गायब हो गए हों. मैं समाज के बीच में हूं. कोर्ट वॉरंट जारी करता है, तो शरण भी देता है. कोर्ट जाने पर आपको वही करना पड़ता है, जो वो कहता है. अगर पुलिस मुझे गिरफ्तार करने आएगी, तो मैं वही करूंगा, जो वो कहेंगे.’

37 साल के अरिजीत अपना पेशा व्यवसायी बताते हैं, एक बाइक शोरूम के मालिक और 2015 का विधानसभा चुनाव 10,658 वोटों से हार चुके हैं.
37 साल के अरिजीत अपना पेशा व्यवसायी बताते हैं, एक बाइक शोरूम के मालिक और 2015 का विधानसभा चुनाव 10,658 वोटों से हार चुके हैं.

ये वही अरिजीत शाश्वत हैं, जो 2015 में विधानसभा का चुनाव लड़ चुके हैं. सिस्टम से अच्छी तरह परिचित हैं. पर क्या ये राम की आरती उतारते हैं, तो इन्हें गिरफ्तार नहीं किया जाना चाहिए? ये हिंदू नव वर्ष मनाते हैं, तो क्या इनके सारे अपराध माफ हो जाने चाहिए? पहले तो अरिजीत ने प्रशासन की इजाज़त के बिना जुलूस निकाला और अब तर्क दे रहे हैं कि उन्होंने मना भी तो नहीं किया था. अगर सभी व्याख्याएं खुद ही करनी हैं, तो सिस्टम का काम ही क्या है. फिर तो नीतीश कुमार को भी झोला उठाकर चल देना चाहिए.

वॉरंट जारी होने के बावजूद अरिजीत खुला घूम रहे हैं और ADG एसके सिंह कह रहे हैं कि हमने इस मामले में सख्त कदम उठाए हैं.
वॉरंट जारी होने के बावजूद अरिजीत खुला घूम रहे हैं और ADG एसके सिंह कह रहे हैं कि हमने इस मामले में सख्त कदम उठाए हैं.

बात सिर्फ बयानों की नहीं है. बात माइंडसेट की है. बात किसी प्रभावी पद पर रहते हुए सिस्टम का फायदा उठाने की है. आज अरिजीत के खिलाफ वॉरंट है, वो खुला घूम रहा है, फिर भी पुलिस उसे अरेस्ट नहीं कर रही है. अगर उसके पिता बीजेपी की केंद्र सरकार में मंत्री न होते, क्या तब भी पुलिस उसे इसी तरह घूमने देती? क्या तब भी उसे गिरफ्तार नहीं किया जाता!


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