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DU ने महाश्वेता देवी और दो दलित लेखिकाओं की कृतियों को सिलेबस से हटाया तो बवाल हो गया

दिल्ली यूनिवर्सिटी (DU) के एक फैसले पर विवाद हो गया है. ये फैसला जुड़ा है मशहूर लेखिका महाश्वेता देवी और दो तमिल दलित लेखिका बामा फॉस्टिना सूसाईराज और सुकीरथरानी की कृतियों को सिलेबस के हटाने से. अंग्रेज़ी विभाग के ग्रैजुएट डिग्री पाठ्यक्रम से इन्हें हटाने का फ़ैसला हुआ है. गौर करने की बात ये है कि मंगलवार 24 अगस्त को यूनिवर्सिटी की विद्वत परिषद यानी अक़ादमिक काउंसिल की मीटिंग में तमाम सदस्यों ने इसका विरोध किया था. उसके बावजूद फैसले को मंजूरी दे दी गई.

डिसेंट नोट में मेंबर्स ने क्या लिखा?

अक़ादमिक काउंसिल के 15 निर्वाचित सदस्यों ने इस फैसले का विरोध किया. उन्होंने एक डिसेंट नोट भी परिषद को सौंपा. इस डिसेंट नोट में कहा गया कि सेमेस्टर 5 के लर्निंग आउटकम बेस्ड करिकुलम फ्रेमवर्क (LOCF) में जो बदलाव किया गया है, वो सही नहीं है. निगरानी समिति ने पहले दो दलित लेखिकाओं – बामा और सुकीरथरानी को हटाने की बात कही थी. उनकी जगह “उच्च जाति की लेखिका रमाबाई” को ले आए. इसके बाद समिति ने अचानक महाश्वेता देवी की प्रसिद्ध कहानी ‘द्रौपदी’ को बिना कोई अकादमिक तर्क दिए BA (Hons) इंग्लिश के कोर्स से हटा दिया. ये कहानी एक आदिवासी महिला के बारे में है.

इस नोट पर दस्तखत करने वालों में काउन्सिल सदस्य मिथुराज धूसिया भी शामिल थे. उनका कहना है कि ‘द्रौपदी’ को 1999 से पाठ्यक्रम में पढ़ाया जा रहा है. ये यूजीसी टेम्पलेट का हिस्सा है. इसके बजाय एक छोटी कहानी ‘सुल्तानाज ड्रीम्स’ को जगह दी गई है.

हालांकि धूसिया आरोप लगाते हैं कि ये फेरबदल राजनीतिक कारणों से किए गए हैं. उन्होंने कहा,

“पाठ्यक्रम के पुनर्गठन का काम पहले से चल रहा है. एक साल पहले परिषद ने पाठ्यक्रम में बदलावों को देखने के लिए निगरानी समिति का गठन किया था. लेकिन समिति सिर्फ़ अपने सुझाव दे सकती है. इनके पास कुछ भी बदलने का अधिकार नहीं है. नए बदलावों पर 15 निर्वाचित सदस्यों ने असहमति जताई, लेकिन फिर भी उन्हें मंज़ूरी दे दी गई.”

ऐसे फेरबदल आमतौर पर निगरानी समिति की सिफारिश पर होते हैं. लेकिन जो निगरानी समिति है, उसमें अंग्रेज़ी विभाग से कोई स्थायी सदस्य नहीं है. शिक्षकों का आरोप है कि अंग्रेजी विभाग के हेड को समिति में केवल विशेष आमंत्रित सदस्य के तौर पर रखा गया है, जिनके पास मत का अधिकार नहीं होता है.

समिति के अध्यक्ष का क्या कहना है?

निगरानी समिति का इस मसले पर कुछ और रुख़ है. टाइम्स ऑफ़ इंडिया की रिपोर्ट में समिति के अध्यक्ष एम के पंडित के हवाले से कहा गया है कि निगरानी समिति की नियुक्ति कार्यकारी परिषद यानी एग्जिक्यूटिव काउंसिल द्वारा की जाती है. यह विश्वविद्यालय की निर्णय लेने वाली सर्वोच्च समिति है. यह पैनल 6 साल से अधिक समय से काम कर रहा है. विशेष रूप से पाठ्यक्रम के मामलों को देखने के लिए इसका गठन किया गया है. खासकर तब जबकि अक़ादमिक काउंसिल और एग्जिक्यूटिव काउंसिल की बैठकें नहीं होतीं. जातिवाद के आरोपों को नकारते हुए पंडित कहते हैं कि वह किसी भी शिक्षाविद की जाति नहीं जानते, ना ही उन्हें जाति से कोई मतलब है.

पहले भी सिलेबस पर हुए हैं विवाद

ये पहला मौक़ा नहीं है जब पाठ्यक्रम में फेरबदल को लेकर बवाल हो रहा है. RSS से जुड़े शिक्षक संगठन नैशनल डेमोक्रेटिक टीचर्स फ़्रंट (NDTF) ने पाठ्यक्रम में कम्युनिस्ट विचारधारा पढ़ाए जाने का आरोप लगाया था. NDTF ने इतिहास के सिलेबस में ‘डेमोक्रेसी एट वर्क’ पेपर के तहत नक्सलवाद पढ़ाए जाने पर भी आपत्ति जताई थी. गुजरात और मुजफ्फरनगर के दंगों पर अंग्रेज़ी किताबों को पढ़ाए जाने पर 2019 में विवाद हुआ था.


वीडियो- CAA-NRC का विरोध करने वाले शायर, जिनके नाम से ही इलाहाबाद यूनिवर्सिटी का मुशायरा रद्द हुआ

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