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गांवों में हर तीन में से दो डॉक्टरों के पास ना तो डिग्री है और ना ही वे इलाज के काबिल हैं

देश के गांवों में औसतन हर तीन में से दो डॉक्टरों के पास न तो ऑफिशियल डिग्री है, न ही वो लोगों का इलाज करने के लिए पूरी तरह काबिल हैं. ये जानकारी सामने आई है देश के पब्लिक और प्राइवेट हेल्थ केयर सिस्टम को लेकर किए गए एक रिसर्च से.

हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक– गांवों में औसतन तीन स्वास्थ्य कार्यकर्ता हैं. लेकिन इनमें से 86 फीसदी प्राइवेट डॉक्टर ही हैं. उनमें से भी 68 फीसदी के पास कोई कायदे की मेडिकल ट्रेनिंग नहीं है. ये जानकारी 19 राज्यों के करीब 1519 गांवों पर किए गए रिसर्च से सामने आई है. नई दिल्ली के सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च (CPR) के रिसर्चर ने ये रिसर्च की है.

WHO की रिपोर्ट में भी यही बात

CPR की रिपोर्ट 2016 में आई वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाइजेशन (WHO) की रिपोर्ट की बात को भी और पुख़्ता करती है. हेल्थ वर्कफोर्स ऑफ इंडिया के नाम से आई WHO की उस रिपोर्ट में दो बातें सामने आई थीं –

1. भारत में एलोपैथिक प्रैक्टिस से जुड़े 57.3 फीसदी डॉक्टरों के पास उचित मेडिकल क्वालिफिकेशन नहीं है.

2. इनमें से भी 31.4 फीसदी तो ऐसे हैं, जो स्कूली लेवल तक ही पढ़े हैं.

हालांकि इससे क्वालिटी पर राय नहीं बना सकते

हालांकि CPR की रिपोर्ट में एक और ख़ास बात कही गई है –

“हालांकि इस केस में ये नहीं कह सकते कि क्वालिफिकेशन का क्वालिटी से सीधा रिश्ता है. उदाहरण के लिए तमिलनाडु और कर्नाटक जैसे राज्यों के कई कम ट्रेनिंग प्राप्त स्वास्थ्य कार्यकर्ता भी यूपी-बिहार के कई प्रशिक्षित डॉक्टरों से बेहतर काम कर रहे हैं.”

रिपोर्ट के मुताबिक –

1. ग्रामीण भारत में कुल स्वास्थ्यकर्मियों में से करीब 68 फीसदी कम ट्रेनिंग प्राप्त या यूं कहें कि इनफॉर्मल स्वास्थ्यकर्मी हैं.

2. इनमें से भी 24 फीसदी आयुष डॉक्टर हैं, जो वैकल्पिक तरीकों से इलाज करने में यकीन करते हैं. जैसे आयुर्वेद वगैरह.

3. सिर्फ 8 फीसदी ही हैं, जिनके पास MBBS या इस स्तर की डिग्री हो.

रिपोर्ट में कहा गया है कि गांव के लोग अच्छी स्वास्थ्य सुविधाओं से इसलिए भी वंचित हैं क्योंकि ये उनके लिए बहुत दूर है. या तो वे इतनी दूर-दूर जाएं इलाज कराने के लिए, या फिर गांव में ही कम प्रशिक्षित लोगों से इलाज कराएं. ऐसे में अधिकतर समय वे दूसरा विकल्प ही चुन लेते हैं.


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