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अयोध्या पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला मंजूर नहीं, रिव्यू पिटिशन दायर करेगा AIMPLB

ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड. यानी एआईएमपीएलबी ने 17 नवंबर यानी रविवार को एक बैठक की. अयोध्या भूमि विवाद पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद ये बैठक बुलाई गई थी. बैठक में 45 सदस्य शामिल हुए. इस बैठक में तय हुआ कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ रिव्यू पिटिशन दायर की जाएगी. साथ ही AIMPLB का कहना है कि उसे मस्जिद के बदले दूसरी जगह पर दी जाने वाली 5 एकड़ जमीन मंजूर नहीं है. उन्हें वही जमीन चाहिए जहां बाबरी मस्जिद बनी थी. उनका कहना है कि वे इसलिए अदालत नहीं गए थे कि उन्हें दूसरी जगह जमीन दे दी जाए.

बोर्ड की वर्किंग कमिटी की बैठक में क्या फैसला लिया गया. बोर्ड के सचिव जफरयाब जिलानी ने इस बारे में मीडिया को बताया. उन्होंने कहा,

9 नवंबर को सुप्रीम कोर्ट ने अयोध्या पर फैसला सुनाया था. हम कोर्ट के फैसले के खिलाफ पुनर्विचार याचिका दाखिल करेंगे. बोर्ड का कहना है कि मस्जिद की जमीन के बदले मुसलमान कोई और ज़मीन कबूल नहीं कर सकते.

उन्होंने आगे कहा,

बोर्ड का मानना है कि मस्जिद की जमीन अल्लाह की है. और शरीयत कानून के मुताबिक, वह किसी और को नहीं दी जा सकती. उस जमीन के लिए आखिरी दम तक कानूनी लड़ाई लड़ी जाएगी. 23 दिसंबर 1949 की रात बाबरी मस्जिद में भगवान राम की मूर्तियां रखा जाना असंवैधानिक था. फिर सुप्रीम कोर्ट ने उन मूर्तियों को आराध्य कैसे मान लिया.

रिव्यू पिटिशन का आधार क्या होगा? AIMPLB के सदस्य कासिम रसूल इलियास ने इस बारे में जानकारी दी.


#सुप्रीम कोर्ट ने माना है कि बाबर के सेनापति मीरबाकी ने बाबरी मस्जिद का निर्माण कराया गया था.

#1857 से 1949 तक बाबरी मस्जिद की तीन गुंबदों वाली इमारत और अंदरुनी हिस्सा मुस्लिमों के कब्जे में माना गया है. फिर फैसले में मंदिर के लिए जमीन क्यों दी गई.

#कोर्ट ने माना है कि बाबरी मस्जिद में आखिरी नमाज 16 दिसंबर, 1949 को पढ़ी गई थी, यानी वह मस्जिद के रूप में थी. फिर भी इस पर मंदिर का दावा क्यों मान लिया गया.

#सुप्रीम कोर्ट ने माना है कि 22-23 दिसंबर, 1949 की रात को चोरी से या फिर जबरदस्ती मूर्तियां रखी गई थीं. इसके बाद इन मूर्तियों को देवता नहीं माना जा सकता.

#गुंबद के नीचे कथित रामजन्मभूमि पर पूजा की बात नहीं कही गई है. ऐसे में यह जमीन फिर रामलला विराजमान के पक्ष में क्यों दी गई.

#सुप्रीम कोर्ट ने खुद अपने फैसले में कहा है कि रामजन्मभूमि को पक्षकार नहीं माना जा सकता. फिर उसके आधार पर ही फैसला क्यों दिया गया.

#सुप्रीम कोर्ट ने माना कि 6 दिसंबर, 1992 में मस्जिद को गिराया जाना गलत था. इसके बाद भी मंदिर के लिए फैसला क्यों दिया गया.

#कोर्ट ने फैसले में कहा कि हिंदू सैकड़ों साल से पूजा करते रहे हैं, इसलिए पूरी जमीन रामलला को दी जाती है, जबकि मुस्लिम भी तो वहां इबादत करते रहे हैं.

#सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के आर्टिकल 142 का इस्तेमाल करते हुए कहा है कि जमीन हिंदुओं को दी गई है. इसलिए 5 एकड़ जमीन दूसरे पक्ष को दी जाती है. इसमें वक्फ ऐक्ट का ध्यान नहीं रखा गया, उसके मुताबिक मस्जिद की जमीन कभी बदली नहीं जा सकती.

#एएसआई के आधार पर ही कोर्ट ने यह माना कि किसी मंदिर को तोड़ कर मस्जिद का निर्माण नहीं हुआ था. ऐसे में कोर्ट का यह फैसला समझ से परे है.

क्या होता है रिव्यू पिटीशन?

पुनर्विचार याचिका. यानी अंग्रेज़ी में रिव्यू पिटीशन. इसमें अदालत के दिए किसी फैसले पर पक्षकार कोर्ट से आग्रह करता है कि वो अपने निर्णय पर फिर से विचार करे. इसे दाखिल करने की एक मियाद होती है. अगर रिव्यू पिटीशन डालनी है, तो फैसला दिए जाने के 30 दिन के भीतर डाली जानी होगी. कोई भी पक्षकार फैसले को लेकर सुप्रीम कोर्ट में पुनर्विचार याचिका दाखिल कर सकता है.

याचिका दाखिल होने के बाद गेंद होती है अदालत के पाले में. कोर्ट तय करेगा कि वो पुनर्विचार याचिका को कोर्ट में सुने या फिर चैंबर में. बेंच अपने स्तर पर ही याचिका खारिज कर सकती है. या फिर इससे ऊपर के बेंच में इसे ट्रांसफर कर सकती है. हालांकि कोर्ट के फैसले से जुड़ा अब तक का इतिहास बताता है कि बेंच अपने स्तर पर ही याचिका पर फैसला लेता है. रिव्यू पिटीशन में सुप्रीम कोर्ट को फैसले की गलतियों के बारे में बताना होता है. इसमें वकीलों की जिरह की जगह फैसले के रेकॉर्ड्स पर विचार होता है. कोर्ट अपने अधिकार के तहत याचिका को तुरंत सुनने, बंद कमरे में सुनने या खुली अदालत में सुनने का फैसला करेगी.


अयोध्या फैसला: बांग्लादेश में पीएम मोदी और चीफ जस्टिस रंजन गोगोई को लेकर क्या अफ़वाह फैलाई जा रही है?

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