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वक़ील ने स्वरा भास्कर पर केस चलाने की परमिशन मांगी, केंद्र सरकार के इस बड़े अधिकारी ने मना कर दिया

फ़िल्म अभिनेत्री स्वरा भास्कर. उनके खिलाफ़ भी कोर्ट की अवमानना का मुक़दमा चलने के आसार बने. एक वक़ील ने अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल से पूछा कि क्या स्वरा भास्कर पर अवमानना का मुक़दमा चलाने में उनकी हामी है? वेणुगोपाल ने मना कर दिया.

वक़ील थे अनुज सक्सेना. उन्होंने 1 फ़रवरी, 2020 को स्वरा भास्कर द्वारा एक पैनल डिस्कशन में कही गयी बात का हवाला दिया. दो पैराग्राफ़ में अनुज सक्सेना ने अपनी बात कही. पहले पैरा में स्वरा भास्कर की अयोध्या जजमेंट पर कही गयी बात का हवाला दिया,

“हम एक ऐसे देश में रह रहे हैं जहां सुप्रीम कोर्ट का कहना है कि बाबरी मस्जिद का विध्वंस ग़ैरक़ानूनी था, और उसी जजमेंट में उन्हीं लोगों को इनाम मिल जाता है, जिन्होंने मस्जिद गिराई थी.”

दूसरे पैरा में स्वरा भास्कर की उस बात का ज़िक्र है, जिसमें उन्होंने सरकार, पुलिस, कोर्ट और संविधान के बात की है. कहा है,

“हम पर ऐसी सरकार का शासन है, जिसका संविधान में कोई यक़ीन नहीं है. हम पर ऐसी पुलिस राज करती है, जिसका संविधान में कोई विश्वास नहीं है. लगता है कि अब हम ऐसी स्थिति में हैं, जहां कोर्ट को भी नहीं पता है कि वो संविधान में भरोसा करती हैं या नहीं. और तब हम क्या करेंगे? और ऐसी स्थिति में हमें आप सबने, और प्रोटेस्ट में शामिल सभी लोगों ने, ये रास्ता दिखाया है कि हम विरोध करेंगे.”

इन दो बयानों पर केके वेणुगोपाल का जवाब सुनिए. उन्होंने कहा,

“पहले पार्ट में जो स्टेटमेण्ट है, वो तो तथ्यात्मक है. और ये बोलने वाले के अपने विचार हैं. इसमें सुप्रीम कोर्ट के जजमेंट का हवाला दिया गया है और ये सुप्रीम कोर्ट पर कोई हमला नहीं है. इसमें सुप्रीम कोर्ट पर कोई कमेंट नहीं किया गया है, ना ही कुछ ऐसा कहा गया है, जिससे सुप्रीम कोर्ट की गरिमा को चोट पहुंचे.”

वेणुगोपाल ने आगे कहा,

“और जो दूसरा स्टेटमेण्ट है, वो थोड़ा अस्पष्ट है. ये किसी ख़ास कोर्ट से जुड़ा हुआ नहीं है और ये एक ऐसी सामान्य-सी बात है, जिसका कोई ख़ास सीरियस नोट नहीं लेगा. मुझे नहीं लगता है कि सुप्रीम कोर्ट की गरिमा और उसकी शक्ति को उससे चोट पहुंचेगी.”

इसके साथ ही वेणुगोपाल ने अवमानना के मुद्दे पर अपनी सहमति देने से इनकार कर दिया.

चलते-चलते छोटी-सी बात

संविधान है. 1971 का contempt of courts act है. इसके सेक्शन 15 में लिखा है कि किसी भी व्यक्ति के खिलाफ़ अवमानना का केस चलाने के लिए अटॉर्नी जनरल या सॉलिसिटर जनरल की सहमति आवश्यक है. 

इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक़, अटॉर्नी जनरल से सहमति नहीं मिली, तो अनुज सक्सेना सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता के पास गए हैं. 


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