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अमित शाह के फोन का कमाल, गुजरात में रायता फैलते-फैलते रह गया

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बगावत. गुजरात बीजेपी का इस शब्द से पुराना नाता रहा है. 1995 का वो साल कौन भूल सकता है जब बीजेपी ने गुजरात की 182 विधानसभा सीटों में से 121 पर विजय हासिल की. सरकार बनी. केशुभाई पटेल मुख्यमंत्री बने. और खेल भी शुरू हो गया. सत्ता मिलते ही केशुभाई पटेल ने पार्टी के भीतर संभावित विरोधियों को ठिकाने लगाना शुरू किया. नए मंत्रिमंडल में ऐसे किसी भी विधायक को जगह नहीं दी गई, जिनके टिकट के लिए शंकर सिंह वाघेला ने सिफारिश की थी. फिर क्या था. शंकर सिंह वाघेला की नजर उन पर टेढ़ी हो गई.

सितंबर 1995 आया. केशुभाई अमेरिकी दौरे के लिए निकल रहे थे. उन्होंने वाघेला से पूछा कि क्या उन्हें नरेंद्र मोदी से कोई दिक्कत है. वाघेला ने दो टूक जवाब देते हुए कहा- मुझे मोदी नहीं, आपसे दिक्कत है. जब आप लौटेंगे तो आप मुख्यमंत्री की कुर्सी गवां चुके होंगे. ऐसा ही हुआ. केशुभाई पटेल को सीएम पद से हाथ धोना पड़ा. हालांकि नया सीएम बीजेपी का ही था. इसके पीछे अटल बिहारी वाजपेयी थे, जिन्होंने शंकर सिंह वाघेला की तीन शर्तें मानकर उन्हें मना लिया था. वरना वाघेला तो 47 विधायक लेकर खजुराहो निकल भी लिए थे. पार्टी तोड़ने के लिए. अगस्त 1996 में फिर वो ऐसा कर ही गुजरे और कांग्रेस का समर्थन लेकर 23 अक्टूबर 1996 को गुजरात के 12वें सीएम बन गए.

1995 में गुजरात में बीजेपी सरकार के बनने और बिगड़ने की कहानी इन्हीं तीनों किरदारों पर केंद्रित है.
1995 में गुजरात में बीजेपी सरकार के बनने-बिगड़ने की कहानी इन्हीं तीनों किरदारों पर केंद्रित है.

ये हालात तब के हैं जब बीजेपी के 121 विधायक थे. बहुमत से 30 ज्यादा विधायक. 2017 विधानसभा चुनाव में तो मामला 99 पर ही अटक गया है. और एक बार फिर सत्ता के गलियारों में नाराजगी की सुगबुगाहट होने लगी है. डिप्टी सीएम नितिन पटेल की नाराजगी की. नाराजगी सीएम पद को लेकर नहीं है. मंत्रालयों के बंटवारे को लेकर है. नितिन पटेल ने मीडिया से भी अनौपचारिक बातचीत में कहा – वे सिर्फ इतना चाहते हैं कि उनका सम्मान बना रहे. खैर उनका सम्मान बचाने के लिए पार्टी अध्यक्ष अमित शाह ने मोर्चा संभाल लिया है. बताया जा रहा है कि शाह से फोन पर बातचीत के बाद नितिन पटेल ठंडे पड़ गए हैं. उन्हें फाइनेंस मिनिस्ट्री मिलने की भी खबर है. गांधीनगर जाकर पदभार संभालने की भी घोषणा नितिन ने कर दी है.

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माने फिलहाल तो सरकार ट्रैक पर आ गई है. मगर पिछले कुछ दिनों में जो हुआ वो ये बताने के लिए काफी है कि इस बार गुजरात में सरकार की गाड़ी हौले-हौले चलने वाली है. खबरें आ रहीं थीं कि करीब 10 विधायक नितिन पटेल के समर्थन में आ गए हैं. हालांकि नितिन पटेल ने समर्थन की बात को सिरे से खारिज कर दिया. वहीं पटेल की विधानसभा सीट मेहसाना में प्रदर्शन की भी खबरे हैं. सरदार पटेल ग्रुप के नेता लालजीभाई ने नितिन पटेल को मुख्यमंत्री बनाने की मांग पर सोमवार को मेहसाना बंद का आह्वान किया है. हालांकि नितिन पटेल ने इस मांग को लालजीभाई की दिल की भावना बताया.

हार्दिक ने कांग्रेस जॉइन करने की पेशकश कर दी थी

नितिन पटेल की नाराजगी की खबरों के बीच पाटीदार नेता हार्दिक पटेल तुरंत एक्टिव हो गए थे. नितिन पटेल को साथ आने की पेशकश भी कर दी थी. कहा था कि अगर बीजेपी में नितिन पटेल का सम्मान नहीं हो रहा है, तो वे कांग्रेस जॉइन कर सकते हैं. वे नितिन पटेल के लिए कांग्रेस पार्टी से बात करेंगे ताकि उन्हें सही जगह मिले और उनकी साख पर कोई सवाल ना उठे. कहा कि वे डिप्टी सीएम नितिन पटेल से मिलने जाएंगे. नितिन पटेल ने भी इस पर कहा था कि कोई भी मुझसे मिलने आ सकता है. हार्दिक पटेल भी आ जाएं तो मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता.

विभागों के बंटवारे ने बढ़ाई खटास

इस अनबन का सबसे अहम कारण विभागों के बंटवारे को माना जा रहा है. उपमुख्यमंत्री पटेल विभागों के वितरण से खुश नहीं हैं. वह गृह और शहरी विकास मंत्रालय चाहते थे, जो उन्हें नहीं मिला. साथ ही उनको 2 अहम विभाग राजस्व और वित्त विभाग भी नहीं दिए गए. पटेल को सड़क एवं भवन, हेल्थ एवं फैमिली, नर्मदा, कल्पसार, चिकित्सा और शिक्षा विभाग की जिम्मेदारी मिली है. मुख्यमंत्री रूपाणी, नितिन पटेल और भाजपा अध्यक्ष जीतू वघानी विवाद को निपटाने के लिहाज से मुख्यमंत्री आवास पर 28 दिसंबर को मिले भी थे. इस कारण पहली कैबिनेट बैठक में नए नवेले मंत्रियों को करीब 4 घंटे तक इंतजार करना पड़ा था.

नाराजगी की खबर यहां से भी

सूत्र बताते हैं कि सरकार में अनबन की एक और खबर है. वडोदरा से विधायक और पूर्व मंत्री राजेंद्र त्रिवेदी ने भी विरोध का झंडा बुलंद कर रखा है. उन्होंने मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री के सामने वडोदरा से एक भी विधायक को कैबिनेट में शामिल नहीं किए जाने पर नाराजगी जताई है. उन्होंने 10 विधायकों के साथ पार्टी छोड़ने की धमकी भी दी है.

विजय रुपाणी और नितन पटेल. ये दोनों नेता गुजरात चलाते रहेंगे.
विजय रुपाणी और नितन पटेल में फिलहाल तो सब ठीक हो गया है.

खैर फिलहाल तो रायता फैलने से बच गया है. मगर नंबर गेम में इस बार कमजोर पड़ी बीजेपी को शुरुआती दिनों में ही इसके साइड इफेक्ट दिखने लगे हैं. इस बार तो अमित शाह ने समझा-बुझाकर मामला शांत कर दिया है. मगर ये शांति कब तक बनी रहेगी ये देखने वाला होगा.


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