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बिहार के चार लाख टीचर्स और वहां के मुख्यमंत्री, दोनों की बात सुनिये और बताइये कौन सही है?

बिहार में नियोजित शिक्षकों की अनिश्चितकालीन हड़ताल चल रही है. पटना में 17 फरवरी से ही टीचर हड़ताल पर हैं. कई मांगे हैं, जिनमें प्रमुख हैं- रेगुलर अध्यापकों के बराबर सुविधाएं और वेतन दिया जाए. साथ ही राज्य कर्मचारी का दर्जा दिया जाए. उनकी इस हड़ताल में अब माध्यमिक स्कूल के शिक्षक भी शामिल हो गए हैं.

26 फरवरी को विधानसभा के सत्र में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने कहा कि किसी भी सूरत में नियोजित शिक्षकों को रेगुलर शिक्षकों के बराबर वेतन नहीं दे सकते, हम उनका वेतन बढ़ाएंगे, लेकिन किसी दबाव के सामने नहीं झुकेंगे. इसके बाद पूर्व सीएम और RJD नेता राबड़ी देवी ने कहा कि बिहार में शिक्षकों के साथ अन्याय हो रहा है, सरकार को जाकर उनसे बात करनी चाहिए. नियोजित शिक्षकों की मांग बहुत पुरानी है और इस पर सरकार को कोई फैसला लेना चाहिए.

नीतीश कुमार ने क्या कहा

बिहार विधान परिषद में राज्यपाल के अभिभाषण पर सवालों का जवाब देते हुए नीतीश कुमार ने कहा,

‘छात्रों की परीक्षा होने वाली है और आप हड़ताल करोगे? क्या ये शिक्षकों का काम है? हम आपको नियमित शिक्षकों के बराबर वेतनमान नहीं दे सकते हैं, क्योंकि बिहार में और भी काम करने है. सब कुछ शिक्षकों को ही दे दिया जाए, तो क्या सड़कें नहीं बनाई जाएं? क्या अस्पताल नहीं बनाए जाएं? लोगों को सुविधाएं नहीं दी जाएं? बहाली सरकार के स्तर पर नहीं बल्कि पंचायत और नगर निकाय के स्तर से की गई है. अयोग्य शिक्षकों की बहाली कर शिक्षा व्यवस्था को नष्ट किया गया, लेकिन फिर भी हमने इनकी नौकरी बचाई.’

क्या है मामला

साल 2003. RJD की सरकार. तब बिहार की मुख्यमंत्री राबड़ी देवी. ऐलान किया गया कि ग्रामीण स्तर पर बेरोजगारी से जूझ रहे युवाओं को रोजगार के अवसर दिए जाएंगे. इसके लिए शिक्षामित्र नियुक्त किए गए. उस समय दसवीं और बारहवीं के अंकों के आधार पर इन शिक्षकों को 11 महीने के कांट्रैक्ट पर रखा गया. इन्हें मासिक 1500 रुपये का वेतन दिया जाता था. धीरे-धीरे उनका अनुबंध भी बढ़ता रहा और वेतन भी. फिर 2005 से नीतीश कुमार की सरकार ने इन्हें नियोजित शिक्षक (Contract Teacher) की मान्यता दे दी.

नियमित और नियोजित शिक्षकों में क्या है अंतर  

बिहार में साल 2005 में नीतीश कुमार की सरकार बनने के बाद वहां नियोजित शिक्षकों की भर्ती शुरू हुई थी. इसके लिए कोई नए नियमित अध्यापक नियुक्त नहीं हुए. सारी भर्तियां नियोजित पदों पर की गईं. ये शिक्षक तो हैं, मगर सीधे तौर पर बिहार सरकार के कर्मचारी नहीं कहलाते. इनकी नियुक्ति पंचायतीराज के तहत पंचायत और ब्लॉक स्तर पर की गई, इसलिए उन्हें वो सुविधाएं नहीं मिलतीं, जो वहां नियमित शिक्षकों को मिलती हैं.

नियमित शिक्षक बिहार सरकार के कर्मचारी कहलाते हैं, जिसकी वजह से उन्हें पे स्केल, ट्रांसफर, अधिक छुट्टियां, दुर्घटना बीमा आदि सुविधाएं मिलती हैं. लेकिन नियोजित शिक्षकों को ऐसी कोई सुविधा नहीं दी जाती. उन्हें बस एक तय सैलरी पर नियुक्त किया गया है, जो नियमित अध्यापकों से काफी कम है.

28 जनवरी को नियोजित अध्यापकों ने सरकार को पत्र लिखा था
28 जनवरी को नियोजित अध्यापकों ने सरकार को पत्र लिखा था

हमारी बात बिहार राज्य शिक्षक संघर्ष समन्वय समिति के मीडिया प्रभारी मनोज कुमार से हुई. मनोज ने बताया,

हमारी नौकरी की कोई सेवा शर्त नहीं है, न ही बिहार सरकार के रेगुलर शिक्षकों के बराबर वेतन मिलता है. हम ट्रेंड होने के बाद भी अनट्रेंड माने जाते हैं. हमें अनुकंपा का भी लाभ नहीं मिलता. मतलब नौकरी के दौरान अगर किसी कर्मचारी की मृत्यु हो जाती है, तो उसके परिजनों या आश्रितों को नौकरी नहीं मिलती. न ही सामान्य भविष्य निधि का कोई लाभ मिलता है, जो सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइन है. सरकार की तरफ से कोई दुर्घटना बीमा भी नहीं कराया जाता, जबकि ये सारी सुविधाएं सरकारी अध्यापकों को दी जाती हैं. सबसे बड़ी बात वेतन की है. हमें अधिकतम 30 हजार रुपये मिलते हैं, जबकि नियमित शिक्षकों को 70 हजार तक वेतन मिलता है.

कोर्ट में कब, क्या हुआ

नियोजित अध्यापकों का यह विवाद सुप्रीम कोर्ट तक चला था. सबसे पहले अगस्त, 2017 में हाईकोर्ट ने शिक्षकों के पक्ष में फैसला सुनाते हुए सरकार को समान वेतन देने का निर्देश दिया था. लेकिन फिर बिहार सरकार हाईकोर्ट के इस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट गई. सुप्रीम कोर्ट से मई, 2019 में फैसला सरकार के पक्ष में आया. सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के फैसले को पलटते हुए बिहार के करीब चार लाख नियोजित शिक्षकों को नियमित करने से इनकार कर दिया था.

सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि बिहार सरकार के द्वारा शिक्षकों के लिए दो अलग-अलग वर्ग रखना उचित है और नियोजित शिक्षकों के अधिकारों का कोई उल्लंघन नहीं हुआ है, न ही उनके साथ कोई भेदभाव किया गया है.

हमसे बातचीत में नियोजित अध्यापक धनंजय मिश्र ने कहा-

सरकार ने पहले कहा था कि हाईकोर्ट का फैसले जो भी होगा, हमें स्वीकार्य है. बीजेपी नेता और उप मुख्यमंत्री सुशील मोदी ने कई बार यह बात मंच से कही. वहां जब हम लोग जीत गये, तो सरकार ही अपनी तरफ से सुप्रीम कोर्ट चली गई. यह कहां तक जायज है. हम सरकार से कहना चाहते हैं कि हाईकोर्ट के फैसले पर विचार करे और हमें नियमित करे.

सरकार कर रही है कार्रवाई

बिहार में बोर्ड की परिक्षाएं चल रही हैं. हड़ताल पर बैठे शिक्षकों को ड्यूटी करनी थी. हड़ताल पर जाने से पहले शिक्षकों के संगठन बिहार राज्य शिक्षक संघर्ष समन्वय समिति ने 28 जनवरी सरकार को पत्र लिखकर बातचीत करने को कहा था. पत्र में 17 फरवरी से हड़ताल का भी जिक्र था. किसी भी तरह की बातचीत न होने के बाद शिक्षक हड़ताल पर चले गए. हड़ताल के दौरान ही सरकार की तरफ से चेतावनी मिलती रही, जिसके बाद 25 फरवरी को 117 शिक्षकों को कारण बताओ नोटिस जारी कर दिया गया. साथ ही बिहार में चल रही मैट्रिक परीक्षा में ड्यूटी पर न पाये जाने वाले 200 से अधिक नियोजित शिक्षकों को कारण बताओ नोटिस जारी किए गए.

 बिहार सरकार के आदेश के बाद दोअध्यापकों पर FIR की गई है
                                    बिहार सरकार के आदेश के बाद दोअध्यापकों पर FIR की गई है

अब दो शिक्षकों- मनोज कुमार और मुस्तफा आजाद को बर्खास्त कर दिया गया है. दोनों पर 17 फरवरी को FIR भी हुई है. मुस्तफा ने हमसे बातचीत में कहा कि उन्होंने अभी FIR की कॉपी देखी नहीं है. लेकिन पता चला कि एग्जाम सेंटर पर मारपीट और हिंसा करने का मामला दर्ज है, जबकि वे धरनास्थल पर हैं. बर्खास्तगी के लिए 40 से अधिक शिक्षकों को चिह्नित किया गया है. शिक्षा विभाग ने अपने सभी जिला पदाधिकारियों को पत्र लिखकर कार्रवाई करने का निर्देश दिया है.


वीडियो देखें: प्रशांत किशोर के कैंपेन ‘बात बिहार की’ से नीतीश, तेजस्वी और कन्हैया कुमार पर क्या असर पड़ेगा?

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