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10वीं में 98% और 12वीं में 94% नंबर लाने वाली लड़की ने खुदकुशी कर ली

एस प्रदीपा. ये उसका नाम था. 17 साल की लड़की थी. पढ़ने में बहुत अच्छी. 10वीं में 98 फीसद नंबर लाई. इन्हीं नंबरों की बदौलत एक प्राइवेट स्कूल ने उसे स्कॉलरशिप दी. अपने यहां दाखिला देकर 11वीं और 12वीं की उसकी पढ़ाई का पूरा खर्च उठाया. 12वीं में भी उसके 93.75 पर्सेंट नंबर आए. फिर उसने आत्महत्या कर ली. क्यों? क्योंकि वो NEET नहीं निकाल पाई. पिछले साल और फिर इस साल, दोनों ही साल वो NEET में फेल हो गई. NEET माने नैशनल ऐलिजबिलिटी टेस्ट. 4 जून, 2018 को NEET का रिजल्ट आया. इसी दिन शाम को उसने चूहे मारने वाला जहर पीकर अपनी जान दे दी. NEET की परीक्षा जब से शुरू हुई, तब से ही विवादित है. रीजनल बोर्ड वालों का कहना है कि परीक्षा का सिस्टम ही ऐसा है कि वो पिछड़ जाते हैं.

ये प्रदीपा का घर है. प्रदीपा के पिता राजमिस्त्री हैं. प्रदीपा की बड़ी बहन ने MSC किया है. उसका भाई इंजिनियरिंग की पढ़ाई कर रहा है (फोटो: ANI)
ये प्रदीपा का घर है. प्रदीपा के पिता राजमिस्त्री हैं. प्रदीपा की बड़ी बहन ने MSC किया है. उसका भाई इंजिनियरिंग की पढ़ाई कर रहा है (फोटो: ANI)

पिता राजमिस्त्री, बच्चों को पढ़ाने की बहुत फिक्र की उन्होंने
तमिलनाडु का तिरुवन्नामलाइ. यहीं के एक दलित परिवार की बेटी थी प्रदीपा. 10वीं तक तमिल-मीडियम वाले सरकारी स्कूल में पढ़ती थी. प्रदीपा के पिता राजमिस्त्री का काम करते हैं. बच्चों को पढ़ाने-लिखाने की काफी फिक्र की उन्होंने. उनकी बड़ी बेटी ने MSC की. बेटा इंजिनियरिंग की पढ़ाई कर रहा है. प्रदीपा डॉक्टर बनना चाहती थी. लेकिन औरों की जान बचाने की सोचने वाली लड़की ने खुद की ही जान ले ली. 2017 में भी तमिलनाडु की एक लड़की ने ऐसे ही खुदकुशी की थी. उसका नाम अनीता था. कई छात्र इल्जाम लगाते हैं कि NEET की परीक्षा में गैर-हिंदी भाषी स्टूडेंट्स को दिक्कत आती है. अनीता के साथ कुछ और छात्रों ने सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका डाली थी. उनका कहना था कि NEET का सिस्टम ही ऐसा है कि सेंट्रल बोर्ड से पढ़ने वाले बच्चों को पास होने में मदद मिलती है. बाकियों के लिए टेस्ट निकालना मुश्किल हो जाता है.

720 में से बस 39 नंबर
प्रदीपा ने पिछले साल जब NEET की परीक्षा दी थी, तब 700 में से बस 155 नंबर मिले उसको. उसको नैचुरोपथी मेडिकल कॉलेज में एक कोर्स मिला. उस कॉलेज की फीस देने की हालत में नहीं था परिवार. सो प्रदीपा ने एक साल रुककर दोबारा 2018 में परीक्षा देने का फैसला किया. लेकिन इस बार उसको 720 में से बस 39 नंबर मिले.

ये प्रदीपा की मार्कशीट है. 10वीं में 99 पर्सेंट नंबर. 12वीं में 93.7 फीसद नंबर. फिर भी लड़की ने निराशा में जान दे दी. हद बुरा है ये.
ये प्रदीपा के 12वीं क्लास की मार्कशीट है. 10वीं में 99 पर्सेंट नंबर. 12वीं में 93.7 फीसद नंबर. फिर भी लड़की ने निराशा में जान दे दी. हद बुरा है ये.

विपक्ष कह रहा है, NEET बैन करो
प्रदीपा की मौत पर तमिल नेताओं की भी नजर गई. राज्य विधानसभा में भी ये मुद्दा उठा. विपक्षी पार्टियों ने हल्ला-हंगामा किया. उनका कहना था कि तमिलनाडु को NEET बैन कर देना चाहिए. DMK के कार्यकारी अध्यक्ष स्तालिन ने केरल, कर्नाटक, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, पुदुच्चेरी और पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्रियों से भी अपील की है. कि वो भी अपने राज्य में NEET पर प्रतिबंध लगा दें. उनका कहना है कि ये पैटर्न ग्रामीण और गरीब परिवारों के बच्चों से मौके छीनता है. बंगाल, गुजरात, केरल जैसे राज्य तो पहले से ही NEET का विरोध करते आ रहे हैं.

One more girl committed suicide due to low scores in NEET ! Politicians here you have chicken 65 on your plate !…

Posted by S.Arun Kumar on Monday, June 4, 2018

NEET के आने से पहले क्या सिस्टम था?
NEET लागू होने से पहले तमिलनाडु में मेडिकल में दाखिले का अलग सिस्टम था. छात्रों को उनकी 12वीं की परीक्षा के नंबरों के आधार पर मेडिकल में दाखिला मिलता था. इस सिस्टम का एक फायदा था. गांव और दूर-दराज के छात्रों को भी मौका मिलता था. बड़े शहरों में रहने वाले और आर्थिक तौर पर ठीक-ठाक परिवारों से आने वाले बच्चे कोचिंग क्लास जाते थे. जबकि ग्रामीण इलाकों के बच्चों को ऐसे मौके नहीं मिलते थे. इसीलिए 12वीं की परीक्षा के आधार पर चुने जाने वाला सिस्टम उनको भी बराबरी का मौका देता था.

NEET को लेकर विवाद क्या है? 
गैर-हिंदी भाषी राज्य शुरुआत से ही NEET पर ऐतराज जताते आए हैं. NEET के रिजल्ट पर काफी बहस भी हुई है. इल्जाम है कि इसमें सेंट्रल बोर्ड के छात्रों का दबदबा है. जबकि प्रदेश बोर्ड के छात्रों के साथ भेदभाव किया जाता है. पश्चिम बंगाल और गुजरात ने तो बहुत आपत्ति की इसपर. दोनों राज्यों को अपनी प्रादेशिक भाषा (बांग्ला और गुजराती) में प्रश्नपत्र लेने के लिए भी बहुत संघर्ष करना पड़ा. प्रादेशिक भाषा का ऑप्शन देने की मांग पर पहले तो CBSE राजी ही नहीं हुआ. लेकिन जैसे-जैसे मांग बढ़ी, CBSE पर दबाव बढ़ा. उसे रीजनल लैंग्वेज का विकल्प देना पड़ा. लेकिन इल्जाम खत्म नहीं हुए. कहा गया कि NEET के सवाल ऐसे होते हैं, जो कि CBSE के सिलेबस को फेवर करते हैं. मतलब जिसने CBSE से पढ़ा होगा, उसको फायदा होगा. फिर CBSE ने क्या किया कि अलग-अलग प्रश्नपत्र के सेट बनाने शुरू कर दिए. अलग-अलग भाषाओं के लिए अलग-अलग सेट. फिर इल्जाम लगा कि प्रादेशिक भाषा के प्रश्नपत्रों के मुकाबले हिंदी माध्यम के सवाल ज्यादा आसान होते हैं. उनका कहना था कि अगर CBSE अलग भाषाओं के लिए अलग-अलग क्वेश्चन सेट बनवा रहा है, तो इस परीक्षा को यूनिफॉर्म टेस्ट कैसे कहा जा सकता है? ये तो सरासर भेदभाव है.

विवाद बढ़ने के बाद 2017 में HRD मंत्रालय ने CBSE से सफाई देने को कहा. उसके बाद मंत्रालय ने ऐलान किया कि 2018 से सारी प्रादेशिक भाषाओं के सवाल भी अंग्रेजी और हिंदी के प्रश्नपत्रों जैसे होंगे. कोई अंतर नहीं होगा उनमें (फोटो: CBSE)
विवाद बढ़ने के बाद 2017 में HRD मंत्रालय ने CBSE से सफाई देने को कहा. उसके बाद मंत्रालय ने ऐलान किया कि 2018 से सारी प्रादेशिक भाषाओं के सवाल भी अंग्रेजी और हिंदी के प्रश्नपत्रों जैसे होंगे. कोई अंतर नहीं होगा उनमें (फोटो: CBSE)

विवाद इतना बढ़ा कि केंद्र को दखल देना पड़ा
NEET के ऊपर लगने वाले इल्जामों की लिस्ट अभी खत्म नहीं हुई है. ये भी सामने आया कि हिंदी और बांग्ला मीडियम की परीक्षा में सवालों की संख्या कम-ज्यादा होती है. इन्हीं कारणों की वजह से राज्यों का कहना है कि NEET में रीजनल लैंग्वेज के छात्र CBSE के छात्रों से पिछड़ जाते हैं. वैसे एक बात और बता देते हैं. CBSE वाले स्कूलों में रीजनल लैंग्वेज से पढ़ाई नहीं करवाई जाती. वैसे तमाम स्कूल राज्य सरकार से मान्यताप्राप्त होते हैं. इन तमाम आरोपों और विवादों के बीच केंद्र सरकार को दखलंदाजी करनी पड़ी. 2017 में HRD मंत्री प्रकाश जावरेकर ने वादा किया कि 2018 की परीक्षा में सारे प्रश्नपत्र एक जैसे होंगे. कि 2018 में जो परीक्षा होगी, उसमें प्रादेशिक भाषाओं के प्रश्नपत्र अंग्रेजी वाले सवालों का अनुवाद होंगे. मतलब एक जैसे सवाल. इस बार ऐसा हुआ भी. लेकिन भेदभाव के आरोप खत्म नहीं हुए हैं.


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