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कोरोना पर 'वैज्ञानिकों का पर्दाफाश' करने वाली ट्रेंडिंग डॉक्यूमेंट्री Plandemic में क्या है?

दावा

एक डॉक्यूमेंट्री वीडियो और उसकी क्लिप बहुत वायरल हो रही हैं. वीडियो में एक महिला वैज्ञानिक COVID-19 से जुड़े चौंकाने वाले दावे कर रही हैं. वीडियो में नज़र आ रही ये महिला अमेरिका की वायरॉलजिस्ट जूडी मिकोविट्स हैं. 26 मिनट के इस डॉक्यूमेंट्री स्टाइल वीडियो का नाम है PLANDEMIC DOCUMENTARY: THE HIDDEN AGENDA BEHIND COVID-19 (आर्काइव लिंक).

ये वीडियो आंखें फाड़ देने वाले दावों से भरा है. मसलन –

1. COVID-19 के नाम पर पूरी दुनिया को छला जा रहा है.

2. एंथनी फाउची पूरी दुनिया से झूठ बोल रहे हैं. ( एंथनी फाउची अमेरिका के NIAID यानी National Institute of Allergy and Infectious Diseases के डायरेक्टर और यूएस की COVID-19 टास्क फोर्स के सदस्य हैं)

3. COVID-19 को लेकर सारा हल्ला फाउची, WHO, CDC और तमाम नामी लोगों को साजिश है, जिससे ये लोग डर फैला सकें और अपनी वैक्सीन बेच सकें.

4. मास्क आपको बचाएगा, नहीं बल्कि नुकसान ही पहुंचाएगा. सारे मास्क खोल दो.

ऐसी कई बातों से भरा ये डॉक्यूमेंट्री वीडियो हमारे पास भी पहुंचा. ये दावे COVID-19 को लेकर हमारी समझ को उलट-पलटकर रख देते हैं. इसलिए हमने इसकी पड़ताल शुरू कर दी.

पड़ताल

‘दी लल्लनटॉप’ की पड़ताल में जूडी मिकोविट्स की ओर से किए जा रहे दावे भ्रामक निकले. दावों की तरह वायरल हो रहा वीडियो भी भ्रामक है.

खोजने पर हमें ‘साइंस’ मैगज़ीन का एक आर्टिकल मिला. ‘साइंस’ जर्नल ने प्लानडैमिक नाम के वीडियो में किए गए दावों को तसल्ली से जांचा है. अपने आर्टिकल में ‘साइंस’ ने जूडी मिकोविट्स और इंटरव्यूअर, दोनों की बराबर धज्जियां उड़ाई हैं.

COVID-19 से जुड़े मिकोविट्स के दावों पर साइंस जर्नल में छपी जानकारी

मिकोविट्स : इटली एक बूढ़ी आबादी वाला देश है. वहां लोग इन्फ्लेमेटरी डिस्ऑर्डर्स से बीमार होते रहे हैं. 2019 की शुरुआत में वहां लोगों को एक अनटेस्टेड और नई तरह की इन्फ्लूएंज़ा वैक्सीन दी गई. इसमें H1N1 समेत इन्फ्लूएंज़ा के चार स्ट्रेन्स थे. इस वैक्सीन को कुत्तों की सेल लाइन में बनाया गया था. कुत्तों में बहुत सारे कोरोनावायरस होते हैं.

साइंस : ऐसा कोई साक्ष्य नहीं, जो इन्फ्लूएंज़ा वैक्सीन या कुत्तों में मौजूद कोरोनावायरस को इटली की COVID-19 महामारी से जोड़ता हो.

मिकोविट्स : मास्क पहनने से आपके अंदर का वायरस एक्टिवेट हो जाता है. आप अपने खुद के रीएक्टिवेटेड कोरोना वायरस एक्स्प्रेशन से बीमार होते हैं. और अगर ये वायरस SARS-CoV-2 निकला, तो आप बड़ी मुसीबत में फंस सकते हैं. (SARS-CoV-2 यानी COVID-19 बीमारी देने वाला कोरोना वायरस)

साइंस : ये क्लियर नहीं है कि मिकोविट्स का ‘कोरोनावायरस एक्सप्रेशन’ से क्या आशय है. इस बात के भी कोई प्रमाण नहीं कि मास्क पहनने से वायरस एक्टिवेट हो जाते हैं, जिससे लोग बीमार पड़ सकते हैं.

मिकोविट्स : बीच क्यों बंद कर दिए हैं? बीच की सैंड में सीक्वेंसेज़ होते हैं. समंदर के खारे पानी में हीलिंग माइक्रोब्स होते हैं. बीच बंद करना मूर्खता है.

साइंस : मिकोविट्स ने ये स्पष्ट नहीं किया कि सैंड ‘सीक्वेंसेज़’ से क्या उनका क्या आशय है. इस बात के कोई साक्ष्य नहीं कि समुद्र में पाए जाने वाले माइक्रोब्स COVID-19 के मरीज़ों को ठीक कर सकते हैं.

इंटरव्यूअर के दावे

भ्रामक बातें करने में इंटरव्यूर भाईसाहब ने जूडी मिकोविट्स को कांटे की टक्कर दी. ( सोर्स - प्लैनडेमिक)
भ्रामक बातें करने में इंटरव्यूर ने जूडी मिकोविट्स को कांटे की टक्कर दी. ( सोर्स – प्लैनडेमिक)

इंटरव्यूअर : डॉक्टर जूडी मिकोविट्स अपनी पीढ़ी के सबसे कुशल वैज्ञानिकों में से एक हैं.

साइंस : मिकोविट्स ने 40 साइंटिफक पेपर्स लिखे (Authored) हैं. 2009 से पहले ये साइंटिफक कम्युनिटी में कोई बड़ा नाम नहीं थीं. 2009 में इन्होंने ‘साइंस’ में एक पेपर पब्लिश किया. पेपर में एक रेट्रोवायरस और CFS (Chronic Fatigue Syndrome) के बीच लिंक बनाया गया था. ये पेपर बाद में गलत साबित हुआ और इसे हटा लिया गया. ऐसे में सबसे कुशल वैज्ञानिकों की श्रेणी में रखने की कोई खास वजह नहीं दिखती.

इंटरव्यूअर : जूडी मिकोविट्स की 1991 की डॉक्टोरल थीसिस ने HIV/AIDS के ट्रीटमेंट में क्रांति ला दी.

साइंस : मिकोविट्स की PhD थीसिस का टाइटिल था – ‘Negative Regulation of HIV Expression in Monocytes’. इसका HIV/AIDS के इलाज में कोई प्रत्यक्ष असर देखने को नहीं मिलता है.

इंटरव्यूअर : अपने करियर के चरम पर डॉक्टर मिकोविट्स ने ‘साइंस’ जर्नल में एक ब्लॉकबस्टर आर्टिकल पब्लिश किया. इस कॉन्ट्रोवर्शियल आर्टिकल ने पूरी साइंटिफक कम्युनिटी को हिलाकर रख दिया. इसमें बताया गया था कि एनिमल और ह्यूमन फीटल टिश्यू क्रोनिक डिसीज़ पैदा करने वाली प्लेग्स को बढ़ा रहा था.

साइंस : उस पेपर में ऐसा कुछ नहीं था. उसमें सिर्फ CFS और चूहे के रेट्रोवायरस का एक लिंक बताया गया था.

एक विक्टिम कार्ड खेलते हुए उन्होंने कहा है कि मुझे बिना किसी चार्ज के जेल में रखा गया था. जबकि नेवाडा के वॉशो काउंटी इलाके ने डिस्ट्रिक्ट अटॉर्नी ने उनके खिलाफ एक क्रिमिनल कंप्लेंट दर्ज की थी. मिकोविट्स के खिलाफ Whittemore Peterson Institute (WPI) से अवैध रूप से कंप्यूटर डेटा और बाकी प्रॉपर्टी के चार्ज थे. हालांकि बाद में लीगल चुनौतियों के चलते ये चार्ज लगाने वाले उनके एंप्लॉयर ने इन्हें वापस ले लिया.

इसके अलावा जूडी मिकोविट्स ने अपने वीडियो में एंथनी फाउची, बिल गेट्स समेत दूसरे लोगों और संस्थानों पर कई बातें कही हैं. हम उस छीछालेदर में नहीं पड़ेंगे. आप पढ़ना चाहें, तो साइंस मैगज़ीन के आर्टिकल को पढ़ सकते हैं.

डॉक्यूमेंट्री वीडियो और जूडी मिकोविट्स की कहानी

इंडिया आने से पहले इस वीडियो ने विदेश में खूब सुर्खियां बटोरीं. दो हफ्ते पहले ये वीडियो अमेरिका के सोशल मीडिया पर टॉप ट्रेंड बना रहा. जब हल्ला हुआ, तो कई सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स ने इसे कॉन्सपिरेसी और मिसलीडिंग वीडियो बताकर हटा दिया. हटाने वालों में सबसे आगे थे YouTube, Facebook और Vimeo. मामला यहां नहीं रुका. ये वीडियो दूसरे प्लेटफॉर्म पर शेयर किया गया. इसे डाउनलोड करके ज़्यादा से ज़्यादा शेयर करने की अपील की गई.

इसके बाद जूडी की किताब बेस्टसेलर बन जाती है. किताब का नाम है ‘प्लेग ऑफ करप्शन’. अपने एक वीडियो में जूडी बता रही हैं कि उनकी किताब को न्यूयॉर्क टाइम्स बेस्टसेलर लिस्ट में शामिल किया गया है. साथ उनकी ये किताब अमेज़न के टॉप चार्ट्स पर भी रही. ट्विटर ने इससे जूडी मिकोविट्स और उनकी कॉन्सपिरेसी थ्योरी से जुड़े हैशटैग #PlagueofCorruption और #PlandemicMovie पर बैन लगा दिया है.

पिछले दो हफ्ते जूडी मिकोविट्स, उनके वीडियो और किताब का नाम ट्रेंड बना रहा. इसके बाद न्यूयॉर्क पोस्ट, गार्जियन और वॉशिंगटन पोस्ट जैसी कई न्यूज़ बेवसाइट ने जूडी मिकोविट्स के बारे में लिखा. वीडियो में किए दावों का सबसे मुकम्मल फैक्ट चैक प्रतिष्ठिक जर्नल ‘साइंस’ ने किया है. (जिसे ‘साइंस मैगज़ीन’ के नाम से भी जाना जाता है.)

जूडी मिकोविट्स 

जूडी मिकोविट्स ने जॉर्ज वॉशिंगटन यूनिवर्सिटी से बायोकेमिस्ट्री में PhD की है. इसके बाद उन्होंने 22 साल नेशनल कैंसर सेंटर में काम किया. 2001 में उन्होंने ये नौकरी छोड़ दी. इनका नाम सबसे सुर्खियों में पहली बार 2009 में आया. 2009 में जूडी मिकोविट्स ने एक रिसर्च पेपर को-ऑथर किया. ये रिसर्च पेपर प्रतिष्ठित जर्नल ‘साइंस’ में छपा.

इस पेपर में चूहे से निकले एक रेट्रोवायरस को CFS यानी क्रोनिक फैटीग सिंड्रोम का कारण बताया गया था. इससे पहले किसी को CFS की वजह नहीं मालूम थी. सबको लगा जूडी ने आगे का रास्ता दिखाया है. 11 नवंबर, 2009 को न्यूयॉर्क टाइम्स ने लिखा –

‘इस रिसर्च को इग्नोर नहीं किया जा सकता. ये पिछले महीने दुनिया के सबसे प्रेस्टीजियस और पिकिएस्ट जर्नल ‘साइंस’ में छपी है.’

लेकिन अगले दो साल में फॉलो-अप स्टडीज़ हुईं और इस रिसर्च की फाइंडिंग गलत निकलीं. ‘साइंस’ ने ये रीसर्च पेपर हटा दिया. लेकिन जूडी मिकोविट्स अपनी थ्योरी पर अड़ी रहीं. उन्हें लगा कि ये यूएस के कई नामी साइंसटिस्ट्स की एक साजिश है, जो उनका करियर खराब करना चाहते हैं.

दो ध्रुव. लेफ्ट में जूडी मिकोविट्स और राइट में एंथनी फाउची. (ट्विटर/विकिमीडिया)
दो ध्रुव. लेफ्ट में जूडी मिकोविट्स और राइट में एंथनी फाउची. (ट्विटर/विकिमीडिया)

जूडी मिकोविट्स ने कई बार ऐसे दावे किए हैं, जो बिना किसी ठोस आधार के दूसरों का काम डिस्क्रेडिट करते नज़र आते हैं.

नतीजा

कुल मिलाकर प्लानडैमिक के नाम से वायरल हो रही वीडियो क्लिप के दावे भ्रामक पाए गए. प्रतिष्ठित ‘साइंस’ जर्नल में एक शब्द कई बार इस्तेमाल किया गया है – एविडेंस यानी सबूत. विज्ञान की पढ़ाई में इस शब्द पर बहुत ज़ोर दिया जाता है. जूडी मिकोविट्स के पास भी सिर्फ दावे ही हैं. सबूत नहीं है. इस वीडियो पर भरोसा करना सही नहीं है.


वीडियो – कोरोना वायरस पर बिश्वरूप रॉय चौधरी के दावों का सच क्या है?

कोरोना पर 'वैज्ञानिकों का पर्दाफाश' करने वाली ट्रेंडिंग डॉक्यूमेंट्री Plandemic में क्या है?
  • दावा

    अमेरिकन वायरॉलजिस्ट जूडी मिकोविट्स ने एक वायरल डॉक्यूमेंट्री विडियो में कई सारे दावे किए. दावों का निचोड़ ये कि कोवड-19 नाम की बीमारी एक साजिश है.

  • नतीजा

    जूडी मिकोविट्स के पास कोई भी ढंग का सबूत नहीं है. इनकी कई बातें तो प्लेन झूठ हैं. ये कई बातें घुमाकर और छुपाकर बोल रही हैं. जूडी मिकोविट्स की ऐसे ऊल-जुलूल दावे करने की हिस्ट्री है.

अगर आपको भी किसी जानकारी पर संदेह है तो हमें भेजिए, padtaalmail@gmail.com पर. हम पड़ताल करेंगे और आप तक पहुंचाएंगे सच.

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