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पड़ताल: सुदर्शन टीवी के 'UPSC जिहाद' शो में सुरेश चव्हाणके के दिखाए हर गलत दावे की पड़ताल

टीवी चैनल सुदर्शन न्यूज़ पर ‘UPSC में जिहाद‘ का दावा करते शो को प्रसारित करने का मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा, तो कोर्ट ने इस कार्यक्रम के आगामी प्रसारण पर रोक लगा दी. कोर्ट ने इस शो के लिए “एक संप्रदाय विशेष के ख़िलाफ़ नफ़रत” रखने और “विभाजनकारी प्रोपेगेंडा” जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया है.

इस मामले में अब भी सुनवाई जारी है. 23 सितंबर 2020 को सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि केंद्र सरकार ने पहली नजर में पाया है कि ‘बिंदास बोल‘ शो प्रोग्राम कोड का उल्लंघन करता है. इसलिए सुदर्शन चैनल से पूछा गया है कि उन पर कार्रवाई क्यों ना हो? उन्हें अपना जवाब 28 सितंबर शाम पांच बजे तक जमा करवाने के लिए कहा गया है.

इससे उलट सुदर्शन न्यूज़ के एडिटर इन चीफ और इस शो के एंकर सुरेश चव्हाणके का दावा है कि उन्होंने ‘UPSC जिहाद’ नाम के शो में गंभीर विषय को छुआ है, जिसे अक्सर मीडिया नज़रअंदाज़ कर देता है.

पहले सुदर्शन न्यूज़ के इस शो के प्रसारण पर दिल्ली हाई कोर्ट ने रोक लगा दी थी. बाद में केंद्र सरकार से इजाज़त मिलने पर सुदर्शन न्यूज़ ने 11 सितंबर को इस खास शो का प्रसारण किया.

शो की शुरुआत में सुरेश चव्हाणके दावा करते हैं

‘मित्रों, जो मेरे पास है, कितना गंभीर है, शायद आप नहीं समझ रहे हो. लेकिन जिनके विरुद्ध मैं बोलने वाला हूं, उन्होंने खुद बता दिया है कि ये बहुत गंभीर है.’

कार्यक्रम के शुरुआती 10 मिनटों में ऑल इंडिया मजलिसे इत्तेहादुल मुस्लिमीन(AIMIM) के नेता अकबरुद्दीन औवेसी को ‘गद्दार और हरामखोर’ कहते हुए उनका एक वीडियो दिखाते हैं. अकबरुद्दीन औवेसी इस वीडियो में कहते हैं,

‘मैं चाहता हूं कि हमारे मुसलमान IAS, IPS, IRS,IFS बनें. सियासी मैदान पर हम लड़ते हैं, लेकिन हमारी ख्वाहिश को दबा दिया जाता है, क्योंकि कुर्सी पर कोई ग़ैर बैठा है.’

अकबरुद्दीन औवेसी के अलावा असद रऊफ और इमरान प्रतापगढ़ी की ब्यूरोक्रेसी और UPSC पर टिप्पणी दिखाते हुए वीडियो प्रसारित किए गए.

सुरेश चव्हाणके के इस वीडियो को यूट्यूब ने कम्युनिटी गाइडलाइंस की अवेहलना मानते हुए हटा दिया है. हालांकि, चैनल के लाइवस्ट्रीम का यूट्यूब कट अभी भी मौजूद है.(आर्काइव लिंक)

सुरेश चव्हाणके के 6 बड़े दावों और कुछ खास एजेंडे से साधी गई टिप्पणियों की विस्तार से पड़ताल करेंगे.

पहला दावा

 “मुस्लिम हिंदुओं से ज़्यादा बार सिविल सेवा परीक्षा दे सकते हैं”

एक ग्राफिक दिखाकर चव्हाणके ने ये दावा किया है. अवसरों (अटेंप्ट) की संख्या से मतलब है कि एक कैंडिडेट अधिकतम कितनी बार सिविल सेवा परीक्षा (CSE) में बैठ सकता है.

Attempt
वायरल दावा.(स्रोत- यूट्यूब/सुदर्शन न्यूज़)

सुरेश चव्हाणके ने शो में दावा किया कि ये हिंदुओं के लिए अधिकतम 6 बार है. वहीं मुस्लिमों के लिए 9 बार. चव्हाणके ने कहा-

“जब मेरे OBC भाई की कैटेगरी में घुस कर कोई परीक्षा देता है, तो उसका कितना असर होता है. जब हमारा जनरल कैटेगरी में परीक्षा देने वाला व्यक्ति है, उसको 6 अटेंप्ट करने का मौका मिलता है. और जो मुस्लिम, उस बेनिफिट के कारण, 9 अटेंप्ट देने का फायदा उसको मिलता है.”

पड़ताल

सुरेश चव्हाणके का मुस्लिम अभ्यर्थियों के ज़्यादा बार परीक्षा देने का मौका मिलने का दावा ग़लत है. हमने UPSC की ओर से 12 फरवरी 2020 को जारी किया गया सिविल सेवा परीक्षा- 2020का नोटिस जांचा. UPSC के मुताबिक-

– जनरल कैटेगरी के पात्र अभ्यर्थी 6 बार सिविल सेवा परीक्षा में बैठ सकते हैं.
– SC/ST के पात्र अभ्यर्थियों पर अटेंप्ट की संख्या लागू नहीं होती. वो न्यूनतम और अधिकतम आयु-सीमा की बीच जितनी बार चाहें सिविल सेवा परीक्षा में बैठ सकते हैं.
– OBC कैटेगरी में परीक्षा देने के पात्र और जो आरक्षण के दायरे में भी आते हों, उन अभ्यर्थियों को 9 बार परीक्षा में बैठने की इजाज़त है.

यानी, UPSC धर्म के आधार पर नहीं, जाति के आधार पर सिविल सेवा में बैठने सकने की संख्या पर छूट देता है.

UPSC में अवसरों की संख्या पर तथ्या.
UPSC में अवसरों की संख्या पर तथ्या.(स्रोत- CSE नोटिस-2020)

यहां सुरेश चव्हाणके का एजेंडा दो और स्तरों पर ग़लत है.

1. भारत में मुस्लिम जनरल कैटेगरी के अलावा OBC, SC/ST कैटेगरीज़ में शामिल हैं. ऐसे में UPSC के नियमानुसार वो इन कैटेगरीज़ के तहत मिलने वाली छूट के हक़दार हैं.

2. चव्हाणके अपने दावे में हिंदुओं की सभी जातियों को एक बनाकर पेश करने लगे. जबकि UPSC के नोटिफिकेशन से साफ है कि SC/ST और OBC, जिसमें हिंदू भी शामिल हैं, वो नियमों के तहते छूट के हक़दार हैं. सुरेश चव्हाणके ने तर्क को ऐसे पेश किया, जैसे वो SC/ST या OBC से संबंध रखने वाले अभ्यर्थियों को हिंदू नहीं मानते या फिर सभी को जनरल कैटगरी में रखते हैं.

दूसरा दावा

“उम्र सीमा में हिंदुओं के मुक़ाबले मुस्लिमों को 3 साल की छूट”

सुरेश चव्हाणके ने एक ग्राफिक दिखाकर दावा किया कि UPSC में हिंदुओं के लिए अधिकतम उम्र 32 साल है, वहीं मुस्लिमों के लिए 35 साल.

उम्र से जुड़ा गलत दावा.
उम्र से जुड़ा गलत दावा.

पड़ताल

हमने दोबारा सिविल सेवा परीक्षा- 2020 का नोटिस पढ़ा. इसके मुताबिक-

अभ्यर्थी की उम्र 1 अगस्त 2020 तक कम से कम 21 और ज़्यादा से ज़्यादा 32 साल होनी चाहिए. लेकिन इसमें छूट मिलेगी-

– अगर उम्मीदवार अनुसूचित जाति(SC) या जनजाति(ST) से है, तो तय उम्र से 5 साल तक की छूट. यानी इस वर्ग से आने वाला अभ्यर्थी अधिकतम 37 साल की उम्र तक सिविल सेवा परीक्षा में बैठ सकता है.

– अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) को तय उम्र से 3 साल की छूट मिलेगी. यानी परीक्षा में बैठने की अधिकतम उम्र 35 साल होगी.

इसके अलावा अगर अभ्यर्थी इन वर्गों से संबंधित होने के साथ-साथ पूर्व सैनिक या विकलांग है, तो वो संचयी आयु-सीमा छूट यानी जाति आधारित छूट और पूर्व सैनिक/विकलांगता आधारित छूट, दोनों के हक़दार होंगे. (पेज 15)

आयु सीमा में मिलने वाली छूट. (स्रोत- CSE नोटिस 2020)
आयु सीमा में मिलने वाली छूट. (स्रोत- CSE नोटिस 2020)

यानी, मामला धर्म का है ही नहीं. उम्र सीमा में छूट जाति के आधार पर दी गई है.

अब फिर से वही दो बातें जो पहले बताईं. यहां सुरेश चव्हाणके का एजेंडा दो स्तरों पर भ्रामक है.

पहला, भारत में मुस्लिम SC/ST, OBC कैटेगरी में आते हैं. इसलिए उन्हें इन कैटेगरीज़ में आने वाले बाकी धर्म के अभ्यर्थियों की तरह उम्र सीमा में छूट मिलती है.

और दूसरा, हिंदू अभ्यर्थियों को बराबर मिलने वाली जाति आधारित छूट को नहीं दिखाया. जनरल कैटेगरी (जिसमें मुस्लिम भी आते हैं) के लिए तय उम्र-सीमा को सब हिंदुओं के लिए एक जैसा बता डाला.

(आप यहां क्लिक करके पूरा नोटिस पढ़ सकते हैं.)

तीसरा दावा

“उर्दू की वजह से मुस्लिमों को फ़ायदा?”

सुरेश चव्हाणके ने दावा किया कि उर्दू की वजह से मुस्लिम अभ्यर्थियों को फायदा मिल रहा है. कहा-

‘सिविल सेवा परीक्षा में अभ्यर्थी की पहचान छुपाने का प्रावधान होता है. लेकिन उर्दू की वजह से एक समुदाय की पहचान रह जाती है. ऐसे में पेपर चेकर उर्दू के होंगे यानी ज़्यादातर मुस्लिम हों, तो उन्हें (अभ्यर्थियों) को मिलने वाले मार्क्स पर सवाल उठता है.’

इसके साथ चव्हाणके ने एक स्लाइड दिखाई, जिसमें उर्दू, संस्कृत और हिंदी के अभ्यर्थियों की सफलता दर दिखाई गई है. इस स्लाइड में चव्हाणके ने अपनी सहूलियत के हिसाब से 2011, 2012, 2013, 2014 और 2017 के आंकड़े दिखाए हैं, जिनमें उर्दू की सफलता दर ज़्यादा दिख रही है.

ये दावा भ्रामक है. पढ़िए नीचे लिखे पैरा में.
ये दावा भ्रामक है. 

पड़ताल

भारत के संविधान की 8वीं अनुसूची में शामिल 22 भाषाओं के साहित्य को मुख्य परीक्षा में वैकल्पिक विषय के तौर पर चुना जा सकता है. इन्हीं में उर्दू, संस्कृत और हिंदी शामिल हैं.

वैसे तो सुरेश चव्हाणके के इस कुतर्क का जवाब कुतर्क से दिया जा सकता है. कहा जा सकता है कि उर्दू की तुलना अगर संस्कृत से करें या किसी भी इलाक़े विशेष की भाषा से करें, तो वहां पर भी धार्मिक पक्षपात या क्षेत्रवाद हो सकता है. लेकिन ऐसे कुतर्क की ज़रूरत नहीं है.

हमने आपको बताया कि कैसे सुरेश चव्हाणके ने अपनी सहूलियत से आंकड़े उठा हैं. हम आपके सामने दो तथ्य रखेंगे-
1. प्रतिशत का खेल
2. किसी और साल के आंकड़े

1. प्रतिशत का खेल समझिए

पहले चव्हाणके के दिखाए 2017 के आंकड़ों पर बात करते हैं. चव्हाणके ने दिखाया कि साल 2017 की सिविल सेवा परीक्षा में-
ऊर्दू की सफलता दर रही – 19.2%
संस्कृत की सफलता दर रही- 7.2%
हिंदी की सफलता दर रही- 7.2%

यानी सिविल सेवा परीक्षा 2017 के आखिर में नियुक्ति के लिए नामित होने वाले इतने प्रतिशत सफल अभ्यर्थियों ने मुख्य परीक्षा(मेंस) में ऊर्दू, संस्कृत या हिंदी के साहित्य को वैकल्पिक विषय के तौर पर चुना था. ये आंकड़े सही दिखाए गए हैं. लेकिन चव्हाणके ने ये नहीं दिखाया कि इन विषयों में कितने अभ्यर्थी बैठे थे और कितनों का चयन हुआ.

UPSC की 69वीं वार्षिक रिपोर्टके मुताबिक, CSE-2017 की मुख्य परीक्षा में-

उर्दू साहित्य को 26 अभ्यर्थियों ने वैकल्पिक विषय चुना, जिसमें से आखिरकार 5 चयनित हुए.
संस्कृत साहित्य को 70 अभ्यर्थियों ने वैकल्पिक विषय चुना, जिसमें से 5 चयनित हुए.
हिंदी साहित्य को 267 अभ्यर्थियों ने वैकल्पिक विषय चुना, जिसमें से 19 चयनित हुए.

सिविल सेवा परीक्षा 2017 में साहित्य को वैकल्पिक विषय चुनने वाले अभ्यर्थी. (स्त्रोत- UPSC की वार्षिक रिपोर्ट)
सिविल सेवा परीक्षा 2017 में साहित्य को वैकल्पिक विषय चुनने वाले अभ्यर्थी. (स्त्रोत- UPSC की 69वीं वार्षिक रिपोर्ट)

यानी उर्दू में परीक्षा देने वालों की संख्या संस्कृत के मुक़ाबले कम थी. इसलिए जब दोनों में बराबर अभ्यर्थी पास हुए, तब प्रतिशत के आधार पर उर्दू की सफलता ज्यादा दिखी. लेकिन तथ्य यही है कि 2017 में संस्कृत और उर्दू चुनने वाले सफल अभ्यर्थियों की संख्या बराबर है- पांच. अगर दूसरी नज़र से देखा जाए, तो उर्दू के मुक़ाबले 2017 में हिंदी चुनने वाले सफल अभ्यर्थियों की संख्या क़रीब चार गुना ज़्यादा है.

2. किसी और साल के आंकड़ों से तुलना

हमने 2017 से एक साल पहले के आंकड़े यानी 2016 के आंकड़े जांचे. UPSC की 68वींवार्षिक रिपोर्ट के मुताबिक-

– 288 अभ्यर्थियों ने हिंदी साहित्य को वैकल्पिक विषय चुना, जिसमें से 36 चयनित हुए. यानी सफलता दर 12.5%
– 80 अभ्यर्थियों ने संस्कृत साहित्य को वैकल्पिक विषय चुना, जिसमें से 12 चयनित हुए. यानी सफलता दर 15%
-30 अभ्यर्थियों ने उर्दू साहित्य को वैकल्पिक विषय चुना, जिसमें से 1 अभ्यर्थी का चयन हुआ. यानी सफलता दर 3.3%

CSE-2016 के उपलब्ध आंकड़े.
CSE-2016 के उपलब्ध आंकड़े(स्रोत- UPSC वार्षिक रिपोर्ट 2017-18, दी लल्लनटॉप)

अब 3.3 प्रतिशत सफलता दर को कोई दिखाकर ये भी बोल सकता है कि मुस्लिमों की मौजूदगी कम है. कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि सुरेश चव्हाणके ने आंकड़ों को तोड़-मरोड़ कर पेश किया. सहूलियत मुताबिक आंकड़े उठाए, सहूलियत मुताबिक दिखा दिया.

चौथा दावा

“इंटरव्यू में मुस्लिमों को फायदा मिलता है”

सुरेश चव्हाणके ने अपने कार्यक्रम में एक इंटरव्यू दिखाया. खुद कहा भी कि ये इंटरव्यू मॉक है. यानी ये UPSC के आधिकारिक इंटरव्यू का वीडियो नहीं था. वीडियो में इंटरव्यूअर ने कैंडिडेट से कहा-

“आपका इंटरव्यू एक साधारण इंटरव्यू नहीं होगा. आपको इंटरव्यू के बारे में एक पूर्व राय बना लेनी चाहिए कि आपका इंटरव्यू साधारण, औसत इंटरव्यू जैसा नहीं जाएगा. इसके कई कारण हैं, एक कारण तो आपकी उम्र बनती है और दूसरा कारण आपका समुदाय बनता है.”

इतना वीडियो चलाने के बाद सुरेश चव्हाणके ने सवाल किया कि इंटरव्यू में ये क्यों कहा जाता है-

‘आपका इंटरव्यू विशेष होगा? क्योंकि आप एक समुदाय (मुस्लिम) से आते हैं. क्या इंटरव्यू में मिलने वाले ज्यादा मार्क्स से इसका संबंध है? अगर नहीं है, तो इसका उत्तर दीजिए. आपके उत्तर को भी सुदर्शन उतना ही जगह देगा, जितना इन आरोपों को लगाने के लिए स्पेस दे रहा है.’

पड़ताल

इस वीडियो के बैकग्राउंड में दृष्टि IAS का लोगो लगा था. कीवर्ड सर्च करने पर हमें पूरा वीडियो मिल गया. 30 मिनट 43 सेकंड के टाइमस्टांप पर आप ये बातचीत देख पाएंगे. ये इंटरव्यू अज़हरुद्दीन ज़हीरुद्दीन क़ाज़ी का है, उन्होंने CSE-2019 में 315 रैंक हासिल किया था.

इसमें इंटरव्यूअर कैंडिडेट से कहते हैं-

आपका इंटरव्यू एक साधारण इंटरव्यू नहीं होगा. आपको इंटरव्यू के बारे में एक पूर्व राय बना लेनी चाहिए कि आपका इंटरव्यू साधारण, औसत इंटरव्यू जैसा नहीं जाएगा. इसके कई कारण हैं, एक कारण तो आपकी उम्र बनती है और दूसरा कारण आपका समुदाय बनता है. बहुत कम मुस्लिम कैंडिडेट्स के इंटरव्यू होते हैं और लगभग सबसे हम कहते हैं कि पहले तैयार कि आपके इंटरव्यू समान्य से कुछ भिन्न तरीके से लिए जाते हैं. इसके फायदे भी हैं नुकसान भी. फायदा है कि आपको पता है कि उस दिशा में जाएगा. नुकसान ज़ाहिर है कि आपके मूल्यांकन के तरीके वही नहीं होते, जो बाकी कैंडिडेट्स के मूल्यांकन के हो रहे होते हैं”

यानी, जहां फायदे-नुकसान की बात कही गई, वो हिस्सा सुरेश चव्हाणके ने हटा दिया. अपनी तरफ से सवाल बना दिया कि “कैसे फायदे की बात वहां हो रही है?”

इससे भी हैरत की बात ये कि सुरेश चव्हाणके एक मॉक इंटरव्यू के आधार पर असली सिविल सेवा इंटरव्यू का मूल्यांकन कर रहे हैं और जवाब भी मांग रहे हैं.

पांचवां दावा

“मनमोहन सरकार ने ‘मुस्लिम यूनिवर्सिटियों’ में कोचिंग सेंटर बनवाए”

सुरेश चव्हाणके ने दावा किया कि पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने UPSC की तैयारी के लिए 5 कोचिंग सेंटर खुलवाए, जिनमें से 4 ‘मुस्लिम यूनिवर्सिटीज़’ में बने. कुछ और यूनिवर्सिटीज़ का नाम लेकर कहा कि क्यों वहां सेंटर नहीं बने. चव्हाणके ने कहा,

“पीएम नरेंद्र मोदी का ये एजेंडा नहीं है, वो मानते हैं कि जो परिश्रम करेगा वो आगे जाएगा. लेकिन यहां तो वो नहीं है. यहां तो फेवरिज़्म(फेवरेटिज़्म) चल रहा है. सपोर्ट सिस्टम चल रही है (मनमोहन सिंह के कार्यकाल में शुरू किया हुआ)”

पड़ताल

सुरेश चव्हाणके का दावा सही है कि मनमोहन सिंह के समय में पांच कोचिंग सेंटर खोले गए थे. ये पांच सेंटर- जामिया मिल्लिया इस्लामियाजामिया हमदर्द यूनिवर्सिटी, अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटीबाबासाहब भीमराव आंबेडकर यूनिवर्सिटी और मौलाना आज़ाद नेशनल उर्दू यूनिवर्सिटी में हैं. लेकिन ये कहना कि यहां सिर्फ मुस्लिमों को पढ़ाया जाता है, ये ग़लत है.

इन पांचों यूनिवर्सिटीज़ में रेज़िडेंशियल कोचिंग अकादमियां(RCA) चलती हैं. जहां अल्पसंख्यकों के साथ-साथ SC/ST, OBC और महिलाओं को मुफ़्त में कोचिंग दी जाती है. RCA की स्थापना के पीछे का मकसदथा कि समाज के हाशिए से आने वाले मेधावी विद्यार्थियों को मदद करना ताकि वो सरकारी और सार्वजनिक क्षेत्र में नौकरियां हासिल कर सकें.

2014 में नरेंद्र मोदी की सरकार आने के बाद इन योजनाओं को चालू रखा गया है. 13 अगस्त 2014 को लोकसभा में एक सवाल का जवाब देते हुए तत्कालीन मानव संसाधन विकास मंत्री स्मृति ईरानी ने कहा था –

UGC की ओर से अल्पसंख्यकों, SC/ST, OBC और महिलाओं को सशक्त करने के लिए रेज़िडेंशियल कोचिंग अकादमियां बनाई जा रही हैं.

यानी नरेंद्र मोदी सरकार ने मनमोहन सिंह सरकार की पहल को आगे बढ़ाया है. मोदी सरकार के दौरान भी मकसद अल्पसंख्यकों और पिछड़ों को प्रशासनिक सेवाओं में आने के लिए प्रोत्साहित करना ही रहा है.

छठा दावा

” सरकार मुसलमानों को आर्थिक मदद देती है, हिंदुओं को नहीं”

चव्हाणके ने ग्राफ़िक्स दिखाकर दावा किया-

‘सरकार से अल्पसंख्यकों को मिलने वाली आर्थिक मदद का सारा फायदा एक कम्युनिटी लेकर जाती है. UPSC,स्टेट PSC, SSC जैसी परीक्षाओं के लिए मिल रही मदद का बड़ा आंकड़ा एक समुदाय का है’

सरकारी मदद में बड़ा शेयर मुस्लिमों को मिल रहा है, ऐसा दावा चव्हाणके ने किया. लेकिन असल में ये जनसंख्या के अनुपात में मिली सीटें हैं.
सरकारी मदद में बड़ा शेयर मुस्लिमों को मिल रहा है, ऐसा दावा चव्हाणके ने किया. लेकिन असल में ये जनसंख्या के अनुपात में मिली सीटें हैं.

वहीं एक और ग्राफ़िक्स दिखाकर दावा किया,

“सरकारी योजना (उड़ान योजना) के तहत मुस्लिमों को 25 हज़ार से लेकर 1 लाख तक की मदद दी जाती है, पर हिंदुओं को एक पैसा नहीं मिलता.”

नई उड़ान स्कीम के बारे में गलत जानकारी दी गई.
नई उड़ान स्कीम के बारे में गलत जानकारी दी गई.

पड़ताल

यहां एक बार फिर से सुरेश चव्हाणके ने अपनी सहूलियत के हिसाब से तथ्यों को तोड़-मरोड़ कर पेश किया और सच छुपाया.

अल्पसंख्यकों को मिलने वाली आर्थिक मदद के ये आंकड़े ‘नई उड़ान’ स्कीम के हैं. अल्पसंख्यक मामलों के मंत्रालय की ओर से संचालित इस स्कीम में अल्पसंख्यक समुदायों के मेधावी छात्रों को UPSC, स्टेट PSC और SSC की प्रारंभिक परीक्षा पास करने के बाद नियुक्ति तक की प्रक्रिया में आर्थिक मदद दी जाती है. मंत्रालय के मुताबिक, इसका स्कीम का मक़सद है कि सिविल सेवाओं में अल्पसंख्यकों की भागीदारी बढ़े.

इस स्कीम की कई तथ्यात्म बातें हैं, जो चव्हाणके ने छुपाईं. जैसे-

मुस्लिमों को इस स्कीम में मिलने वाले बड़े हिस्से का कारण क्या है?

अल्पसंख्यक मामलों के मंत्रालय की वेबसाइट पर ‘नई उड़ान’ स्कीम के बारे में उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, 1 अप्रैल 2019 से लागू हुई संशोधित ‘नई उड़ान’ स्कीम लागू हुई है. इसके तहत 5100 अभ्यर्थियों को हर साल आर्थिक मदद मुहैया कराई जाएगी.

इसमें अल्पसंख्यक समुदायों के बीच सीटों का बंटवारा जनगणना-2011 के आधार पर किया गया है. यानी जिसकी जितनी संख्या, उसी अनुपात में उस समुदाय को इस स्कीम में हिस्सा मिला है. भारत के अल्पसंख्यक समुदायों में सबसे बड़ा मुस्लिम समुदाय है. लेकिन ये बात सुरेश चव्हाणके ने अपने शो में नहीं बताई.

इस स्कीम में सीटें अलॉट करने के लिए जनगणना को आधार बनाया गया है. ये बात चव्हाणके ने छुपाई. (स्रोत- उड़ान स्कीम, अल्पसंख्यक मंत्रालय)
इस स्कीम में सीटें अलॉट करने के लिए जनगणना को आधार बनाया गया है. ये बात चव्हाणके ने छुपाई. (स्रोत- उड़ान स्कीम, अल्पसंख्यक मंत्रालय)

इसके अलावा ये भी नहीं बताया कि ये आर्थिक मदद मेधावी छात्रों के लिए है, जो नियुक्ति के लिए पहली बाधा यानी प्रिलिम्स पास कर चुके हैं. इसके अलावा 8 लाख रुपये से कम घर की सालाना आमदनी जैसी शर्तें भी हैं.

उड़ान स्कीम के लिए ज़रूरी शर्तें.
उड़ान स्कीम के लिए ज़रूरी शर्तें.

यहां आप इस योजना के बारे में पूरी जानकारी और स्क्रीन पर दिखाए गए आंकड़े देख सकते हैं.

ये वो 6 बड़े झूठ थे, जिनके सही होने या फैक्चुअल होने का दावा सुरेश चव्हाणके ने अपने शो में किया. शो में आधी-अधूरी और भ्रामक जानकारियां इस्तेमाल की गईं. और हर दावे का मकसद मुस्लिम समुदाय को टारगेट करना था.


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पड़ताल: सुदर्शन टीवी के 'UPSC जिहाद' शो में सुरेश चव्हाणके के दिखाए हर गलत दावे की पड़ताल
  • दावा

    UPSC की सिविल सेवा परीक्षा में मुस्लिमों को कई तरह के फायदे मिलते हैं.

  • नतीजा

    सुरेश चव्हाणके के कई दावे गलत और कई भ्रामक हैं. सही जानकारी छुपाई गई है. अपनी सहूलियते के हिसाब से आंकड़े दिखाकर नैरेटिव बनाया जा रहा है.

अगर आपको भी किसी जानकारी पर संदेह है तो हमें भेजिए, padtaalmail@gmail.com पर. हम पड़ताल करेंगे और आप तक पहुंचाएंगे सच.

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