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हर मिनट 1 सरकारी आदेश आया और इंस्टाग्राम-फेसबुक-यूट्यूब ने लोगों के वीडियो डिलीट कर दिए

Online Censorship in India: कॉन्टेंट ब्लॉक करने की लीगल रिक्वेस्ट जैसे ही आती है, Meta का ऑटोमेटिक सिस्टम एक्टिव हो जाता है. बताते हैं कि कोई इंसान इन रिक्वेस्ट को नहीं देखता, सब मशीन करती है. पोस्ट हो या वीडियो, आदेश आते ही सब हटा दिया जाता है. इस साल के पांच महीनों में करीब 1.95 लाख पोस्ट और वीडियो हटाने के ऑर्डर आए.

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कानूनी रिक्वेस्ट मिलने पर मेटा ऑटोमेटिकली कॉन्टेंट हटाता है. (Magnific)

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  • भारत सरकार ने मार्च से जुलाई 2024 के बीच सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को लगभग 1.95 लाख ब्लॉकिंग ऑर्डर भेजे, जिनमें इंस्टाग्राम, फेसबुक और यूट्यूब को सबसे अधिक आदेश प्राप्त हुए।
  • ब्लॉकिंग ऑर्डर की बढ़ती संख्या के पीछे जंतर-मंतर पर छात्रों के प्रोटेस्ट और नए IT नियमों के तहत कॉन्टेंट को 2-3 घंटे में हटाने की कानूनी आवश्यकता है।
  • मेटा ने ऑटोमेटेड API सिस्टम लागू किया है जो सरकारी आदेश आने पर 3 घंटे के अंदर बिना इंसानी समीक्षा के कॉन्टेंट हटा देता है, जिससे कानूनी प्रक्रिया में बदलाव आया है।

भारत में सोशल मीडिया पोस्ट्स पर जबरदस्त कानूनी शिकंजेबाजी चल रही है. गूगल और मेटा जैसे प्लेटफॉर्म्स को सरकारी अथॉरिटीज कॉन्टेंट ब्लॉक करने का फरमान भेजती हैं, और वो ब्लॉक हो जाता है. बीते पांच महीनों में औसतन हर 68 सेकेंड पर 1 ब्लॉकिंग ऑर्डर जारी हुआ. रोजाना 1,275 और इन पांच महीनों में करीब 1.95 लाख आदेश जारी किए गए. एक बात और. एक ब्लॉकिंग ऑर्डर में कई सौ पोस्ट्स, कॉन्टेंट या अकाउंट्स शामिल हो सकते हैं. सवाल है कि टेक कंपनियां सरकार के आदेशों का इतना फुर्ती से पालन कैसे करती हैं? उससे पहले ब्लॉकिंग आर्डर का संख्याबल जान लेते हैं.

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इंडियन एक्सप्रेस की खबर की मुताबिक, ऊपर के पांच महीनों का डेटा इस साल मार्च और जुलाई के बीच का है. इसमें सरकारी अथॉरिटीज की तरफ से ऑनलाइन कॉन्टेंट को हटाने के लिए इंस्टाग्राम, फेसबुक और यूट्यूब को भेजे गए ब्लॉकिंग ऑर्डर शामिल हैं. यही वो समय रहा, जब दिल्ली के जंतर-मंतर पर छात्रों के प्रोटेस्ट ने अपनी बुलंदी देखी.

जून की शुरुआत में जंतर-मंतर पर प्रोटेस्ट शुरू हुआ. 25 जुलाई को केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद प्रोटेस्ट खत्म हो गया. सोशल मीडिया कॉन्टेंट पर सरकारी सेंसरशिप के उभार का अंदाजा लगाने के लिए बीते साल का रिकॉर्ड देखते हैं.

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इंडियन एक्सप्रेस ने RTI रिकॉर्ड्स के हवाले से बताया कि अक्टूबर 2024 से अक्टूबर 2025 के दरमियान 19 ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स को भारत सरकार के 'सहयोग पोर्टल' से 2,312 ब्लॉकिंग ऑर्डर भेजे गए. माने, रोजाना औसतन 6 ब्लॉकिंग ऑर्डर.

1.95 लाख ऑर्डर में आधे इंस्टाग्राम के

सबसे ज्यादा लीगल टेकडाउन इंस्टाग्राम यूजर्स के कॉन्टेंट का हुआ. इस साल के पांच महीनों में करीब 1.95 लाख ऑर्डर में आधे से ज्यादा सिर्फ इंस्टाग्राम के रहे- लगभग 1 लाख ब्लॉकिंग ऑर्डर. फेसबुक को लगभग 80,000 और यूट्यूब को करीब 15,000 ब्लॉकिंग ऑर्डर मिले.

इधर आदेश मिला, उधर कॉन्टेंट हटा

फेसबुक और इंस्टाग्राम मेटा के प्लेटफॉर्म्स हैं. इसलिए इन तीन प्लेटफॉर्म्स को मिले हर 10 ब्लॉकिंग ऑर्डर में से 9 मेटा के हिस्से आए. केंद्र और राज्यों की एजेंसियों ने ज्यादातर आदेश भारत के गृह मंत्रालय के 'सहयोग पोर्टल' से भेजे.

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सरकारी अथॉरिटीज से आदेश मिलने के बाद इनके पालन पर सोशल मीडिया कंपनियों की फुर्ती को समझने के लिए मेटा की प्रैक्टिस समझनी होगी. जैसे ही कॉन्टेंट ब्लॉक करने की लीगल रिक्वेस्ट आती है, मेटा का ऑटोमेटिक सिस्टम एक्टिव हो जाता है.

वैसे तो लीगल रिक्वेस्ट को टेक कंपनी के इंसानी कर्मचारी को चेक करना चाहिए. लेकिन इतना झंझट कौन पाले? वैसे भी नए IT नियमों के तहत रिक्वेस्ट मिलने के 2-3 घंटों के अंदर कॉन्टेंट हटाना जरूरी है.

सरकार ने टाइम घटाया

इन्फॉर्मेशन टेक्नोलॉजी मंत्रालय ने इस साल फरवरी में इन्फॉर्मेशन टेक्नोलॉजी (इंटरमीडियरी गाइडलाइंस और डिजिटल मीडिया एथिक्स कोड) रूल्स, 2021 में बदलावों को नोटिफाई किया. इसमें 24-36 घंटे के बजाय 2-3 घंटे के अंदर कॉन्टेंट हटाना जरूरी किया गया.

मेटा ने 'सहयोग पोर्टल' के साथ अपना API (एप्लिकेशन प्रोग्रामिंग इंटरफेस) जोड़ा हुआ है, ताकि 3 घंटे अंदर कॉन्टेंट अपने आप हट जाए. माने, सरकार ने कोई ब्लॉकिंग ऑर्डर भेजा, तो मेटा का API उस ऑर्डर में बताया गया कॉन्टेंट उड़ा देता है. ऑटोमेटेड सिस्टम ने इंसानी रिव्यू या सरकारी ऑर्डर को चुनौती देने का स्कोप खत्म कर दिया है.

एक्टिविस्ट्स ने खतरा जताया

डिजिटल राइट्स एक्टिविस्ट्स का कहना है कि मेटा का अपनाया जा रहा ऑटोमेटेड टेकडाउन मैकेनिज्म खतरनाक है. क्योंकि कंपनियों को कानूनी तौर पर तभी कॉन्टेंट टेकडाउन करना होता है, जब उन्हें कानूनी आदेश की 'असल जानकारी' मिलती है.

दिल्ली में मौजूद इंटरनेट फ्रीडम फाउंडेशन के वकील और फाउंडर डायरेक्टर अपार गुप्ता ने कहा,

"एक API जो अपने आप टेकडाउन करता है, उसे कोई जानकारी नहीं होती. मेटा में कोई भी ऑर्डर नहीं पढ़ता. कोई यह नहीं देखता कि यह तय रैंक के किसी ऑफिसर से आया है या नहीं या इसमें वे कारण बताए गए हैं जिनकी अब बदले हुए नियम में जरूरत है... मशीन-टू-मशीन एग्जीक्यूशन 'शर्त समेत कानूनी जिम्मेदारी' को 'बिना शर्त के पालन' में तब्दील कर देता है."

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ऊपर बताए गए ब्लॉकिंग ऑर्डर के तहत हटाया गया कॉन्टेंट, उस कॉन्टेंट से अलग है जिसे सरकार IT एक्ट की धारा 69(A) के तहत हटवाती है. इस धारा का इस्तेमाल ऑनलाइन सेंसरशिप के निर्देश जारी करने के लिए किया जाता है. लेकिन, यह खासकर राष्ट्रीय सुरक्षा और पब्लिक ऑर्डर से जुड़े अपराधों तक ही सीमित है.

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