ऑनलाइन कॉन्टेंट दोगुनी रफ्तार से ब्लॉक करा रही सरकार, रिपोर्ट में बताया कौन सा कॉन्टेंट
ज्यादातर कॉन्टेंट ब्लॉकिंग के आदेश राजनीतिक पार्टियों और नेताओं से जुड़े एक्स, इंस्टाग्राम, फेसबुक या यूट्यूब पोस्ट हटाने के लिए दिए गए थे. ऐसे आदेश देने पर सरकार को लोगों का विरोध और आलोचना झेलनी पड़ती है. आरोप लगते हैं कि नियमों की आड़ में सरकार अपनी विरोधी आवाजों को दबाने की कोशिश करती है.

केंद्र सरकार की ओर से ऑनलाइन कॉन्टेंट ब्लॉक करने की संख्या एक साल में दोगुनी हो गई है. एक रिपोर्ट में अधिकारियों ने बताया कि सोशल मीडिया पर डीपफेक, आपत्तिजनक पोस्ट और एआई से बने कॉन्टेंट तेजी से बढ़ रहे हैं. इस वजह से कॉन्टेंट ब्लॉक करने के मामलों में तेजी आई है.
द इंडियन एक्सप्रेस से बातचीत में आईटी मंत्रालय के अधिकारी बताते हैं कि कॉन्टेंट ब्लॉक करने के जो आदेश अभी तक दिए गए हैं, उनमें 60 फीसदी ‘एक्स’ (पूर्व में ट्विटर) पर पोस्ट किए गए थे. 25 फीसदी आपत्तिजनक कॉन्टेंट फेसबुक और इंस्टाग्राम पर ब्लॉक करवाए गए. यूट्यूब के जो कॉन्टेंट ब्लॉक किए गए हैं, उनका आंकड़ा सबसे कम यानी 5 फीसदी के आसपास बैठता है.
साल भर में दोगुनी ब्लॉकिंग
रिपोर्ट में बताया गया कि पहलगाम हमले के बाद पाकिस्तान के खिलाफ भारतीय सेना के ऑपरेशन सिंदूर के दौरान काफी फेक और विवादित कॉन्टेंट सोशल मीडिया पर शेयर किए गए थे. इस दौरान ऑनलाइन कॉन्टेंट के ब्लॉक करने की शिकायत में जबरदस्त उछाल आया था. इसके बाद से ही ये संख्या लगातार काफी ज्यादा बनी हुई है.
साल 2023 में सरकार ने संसद में इस बारे में जानकारी देते हुए बताया कि सूचना प्रसारण मंत्रालय हर साल औसतन 6 हजार ब्लॉकिंग के आदेश जारी करता है. लेकिन, अब अधिकारी बताते हैं कि यह संख्या 2024 में बढ़कर तकरीबन 12 हजार 600 हो गई. ब्लॉकिंग आदेश बढ़ने की दोगुनी रफ्तार 2025 में भी कायम रही. इस साल 24 हजार 300 ब्लॉकिंग के आदेश मंत्रालय ने जारी किए.
अखबार के सूत्र बताते हैं कि इनमें ज्यादातर कॉन्टेंट ब्लॉकिंग के आदेश राजनीतिक पार्टियों और नेताओं से जुड़े एक्स, इंस्टाग्राम, फेसबुक या यूट्यूब पोस्ट हटाने के लिए दिए गए थे. कांग्रेस नेता शशि थरूर समेत कई नेताओं ने शिकायत की थी कि उनके नाम, तस्वीर और वीडियो का गलत इस्तेमाल किया गया. एआई के जरिए फर्जी पोस्ट तैयार की गई.
हालांकि, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के संवैधानिक अधिकारों वाले देश में सोशल मीडिया कॉन्टेंट को ब्लॉक करना ठीक-ठाक राजनीतिक विवाद को जन्म दे सकता है. ऐसे आदेश देने पर सरकार को लोगों का विरोध और आलोचना झेलनी पड़ती है. आरोप लगते हैं कि नियमों की आड़ में सरकार अपनी विरोधी आवाजों को दबाने की कोशिश करती है. ऐसे में ये साफ कर देना जरूरी है कि किन परिस्थितियों में सरकार को सोशल मीडिया कॉन्टेंट ब्लॉक करने के अधिकार मिलते हैं.
कब दे सकती है ब्लॉकिंग के आदेश?
एक्सप्रेस ने अपनी रिपोर्ट में बताया कि सरकार ब्लॉकिंग के आदेश IT Act-2000 की धारा 69A के तहत देती है. इस कानून के मुताबिक, 5 कारण हैं जिसके आधार पर सरकार ऑनलाइन कॉन्टेंट को ब्लॉक कर सकती है.
- पहला कारण है, देश की संप्रभुता और अखंडता बनाए रखने के लिए.
- दूसरा है, देश की रक्षा और सुरक्षा के लिए.
- तीसरा कारण है, दूसरे देशों के साथ अच्छे संबंध बनाए रखने के लिए.
- चौथी वजह है, कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए
- और पांचवा कारण है अपराधों की जांच के लिए.
कैसे दिए जाते हैं आदेश?
ऑनलाइन कॉन्टेंट को ब्लॉक करने के आदेश जारी करने के लिए एक स्थापित प्रक्रिया है. इसमें सूचना प्रसारण मंत्रालय के अधीन एक ब्लॉकिंग कमेटी बनाई जाती है. इसमें एक ‘डेजीग्नेटेड ऑफिसर’ को प्रमुख बनाया जाता है. कमेटी में कानून मंत्रालय, गृह मंत्रालय, सूचना और प्रसारण मंत्रालय के साथ-साथ जॉइंट सेक्रेटरी या उससे ऊपर के लेवल के अधिकारी शामिल होते हैं. ये सभी एक मीटिंग करने के बाद सहमति बनाकर कॉन्टेंट ब्लॉक करने का फैसला लेते हैं.
IT एक्ट की धारा 69A में इमरजेंसी प्रावधान भी है. इसके तहत अगर तुरंत किसी कॉन्टेंट को ब्लॉक करना हो तो डेजीग्नेटेड ऑफिसर बिना कमेटी की बैठक के भी आदेश जारी कर सकता है. हालांकि, उसे लिखित में इसका कारण बताना होगा. इसके अलावा आदेश जारी करने के बाद 48 घंटे के अंदर कमेटी से उसकी मंजूरी लेनी होगी.
इमरजेंसी प्रावधान का इस्तेमाल बढ़ा
अधिकारी बताते हैं कि आजकल इस इमरजेंसी प्रावधान का इस्तेमाल बढ़ गया है. इसकी वजह एआई और डीपफेक जैसे टूल्स हैं, जिनका इस्तेमाल तेजी से बढ़ रहा है. ये पोस्ट तेजी से फैलते हैं, जिस वजह से शिकायत आने पर तत्काल इन्हें ब्लॉक करने के आदेश जारी करने पड़ते हैं.
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