जून 2022 की बात है. सरकार का एक आदेश आया और Express VPN और Nord VPN ने देश से कारोबार समेट लिया. अरे-अरे, हमें पता है कि आप कहोगे की क्या बात करते हो. दोनों कंपनियों की सर्विस इंडिया में चलती है. ठीक बात, मगर वर्चुअल प्राइवेट नेटवर्क सर्विस देने वाली ऐसी कई कंपनियों (govt big move against VPN web privacy tools) की सर्विस अब देश में वाकई वर्चुअल तरीके से चलती है. माने ज्यादातर VPN सर्विस देने वाली कंपनियों का सर्वर इंडिया में नहीं बल्कि सिंगापुर में है. लेकिन लगता है जैसे अब ये वर्चुअल सर्वर का खेल भी ज्यादा दिन चलेगा नहीं.
VPN से भी नहीं चलेगा Telegram? सरकार 'उंगली टेढ़ी' करने का सोच रही
केंद्र सरकार वर्चुअल प्राइवेट नेटवर्क (VPN) प्रोवाइडर्स पर लगाम लगाने के लिए एक व्यापक कानूनी ढांचा (govt big move against VPN web privacy tools) तैयार कर रही है. इसके तहत उन्हें भारत में अपनी मौजूदगी दर्ज करानी पड़ सकती है और सरकार के साथ संपर्क बनाए रखने के लिए मुख्य अधिकारियों की नियुक्ति करनी पड़ सकती है.


केंद्र सरकार VPN प्रोवाइडर्स पर लगाम लगाने के लिए एक व्यापक कानूनी ढांचा तैयार कर रही है. इसके तहत, उन्हें भारत में अपनी मौजूदगी दर्ज करानी पड़ सकती है और सरकार के साथ संपर्क बनाए रखने के लिए मुख्य अधिकारियों की नियुक्ति करनी पड़ सकती है. पूरा मामला समझने के लिए जरा चार साल पीछे चलते हैं.
2022 में क्या हुआ था?भारत सरकार के इलेक्ट्रॉनिकी और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY) ने नियम बनाया था कि VPN सेवा देने वाली कंपनियों को यूजर के सभी रिकॉर्ड पांच साल के लिए रखने ही पड़ेंगे. माने कि अगर सरकार चाहेगी तो कंपनियों को बताना होगा कि यूजर ने VPN लगाकर क्या सर्च किया. कौन सी वेबसाइट ओपन की और कौन सा बैन ऐप इस्तेमाल किया. उनके नाम, ईमेल, कॉन्टैक्ट नंबर और IP Address 5 साल तक सेव रखने होंगे.
अगर ये आदेश मान लिया जाता तो फिर VPN का असल उद्देश्य ही खत्म हो जाता. ये नेटवर्क तो बना ही इसलिए है कि ‘तुमने कछु करो नई और हमने कछु देखो नई’. इस नेटवर्क का काम ही आपके इंटरनेट सर्विस प्रोवाइडर और आपकी सर्च के बीच एक दीवार बनाना है ताकि आपकी इंटरनेट पर की गई हर हरकत सेफ रहे. कंपनियों ने इसका तोड़ निकाला और अपना सर्वर समेट कर सिंगापुर चली गईं. जहां से अब वो भारत में सर्विस देती हैं.

वापस आते हैं 2026 में. इंडियन एक्सप्रेस की खबर के मुताबिक, अब एक नए कानूनी ढांचे की ज़रूरत महसूस की जा रही है, क्योंकि यह माना जा रहा है कि 2022 के निर्देशों से शायद संतोषजनक नतीजे नहीं मिल पाए. सरकार की मुख्य चिंता यह है कि लोग ऐप्स और ऑनलाइन कॉन्टेंट पर लगी रोक से बचने के लिए VPN का इस्तेमाल तेज़ी से कर रहे हैं. इसका एक उदाहरण हाल ही में देखने को मिला जब सरकार ने टेलीग्राम पर कुछ दिनों का बैन लगाया तो उसको ओपन करने के लिए जनता ने रिकॉर्ड नंबर में VPN सर्विस का इस्तेमाल किया.
नाम न बताने की शर्त पर सरकार के एक सीनियर अधिकारी ने कहा, "पिछले कुछ महीनों से हम देख रहे हैं कि यूज़र्स VPN सर्विस का इस्तेमाल करके उन कॉन्टेंट, अकाउंट और ऑनलाइन सर्विस को एक्सेस कर पा रहे हैं जिन्हें सरकार ने अलग-अलग वजहों से ब्लॉक किया है. 2022 के Cert-In निर्देशों में VPN प्रोवाइडर्स के लिए कुछ डेटा स्टोर करना ज़रूरी किया गया था, लेकिन इन कंपनियों पर लगाम नहीं कसी जा सकी क्योंकि उन्होंने इन निर्देशों को मानने से ही इनकार कर दिया. इसलिए, अब एक पूरे कानून की ज़रूरत महसूस की जा रही है."
क्या है नए फ्रेमवर्क में?
दो सीनियर सरकारी अधिकारियों ने इंडियन एक्सप्रेस को बताया कि नए नियमों के तहत VPN ऑपरेटर्स को भारत में ऑफिस खोलने और ऐसे कंप्लायंस ऑफिसर नियुक्त करने पड़ सकते हैं जो सरकार की शिकायतों का समाधान कर सकें. नियमों का पालन न करने पर स्थानीय कर्मचारियों के लिए जेल की सज़ा समेत अन्य दंड का प्रावधान भी विचार में है. बता दें कि इनमें से कई नियम पहले से भारत के 'इन्फॉर्मेशन टेक्नोलॉजी (IT) रूल्स, 2021' के तहत बड़ी सोशल मीडिया कंपनियों पर भी लागू होते हैं.
देखते हैं VPN कंपनियां इससे कैसे निपटती हैं. वैसे अगर आपको VPN का पूरा नेटवर्क समझना है तो हमने विस्तार से इसके बारे में बताया है.ये रहा लिंक.
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