
सत्य व्यास. कुछ दिन पहले इनके साथ घंटों क्रिकेट की बातें हुईं. बातें उनकी जिनका नाम आया तो मगर चमक नहीं पाया. ऐसे खिलाड़ी जिनकी गेस्ट अपियरेंस रही. खिल नहीं पाए. जबकि लगता था कि उनमें पोटास भरपूर है. उन्हीं में से एक अतुल बेदादे. सफ़ेद हेलमेट, बायां हत्था और एक स्टीरियोटाइप कर दी गयी इमेज -स्मैशर की. आगे सब कुछ, सत्य व्यास के शब्दों में.
जयसूर्या युग की तब शुरुआत नहीं हुई थी और वह सातवें और कभी कभी तो आठवें नंबर पर बल्लेबाजी करने आते थे. रोमेश कालुविथरना के लिए कोई जगह नहीं थी क्योंकि हसन तिलकरतने अंगद के पांव की तरह जमे थे. ठीक उसी वक्त यानि नब्बे के दशक के प्रारम्भिक सालों में खबर उछली कि एक बल्लेबाज है जिसे बस एक ही तरह से रन बनाना आता है - छक्कों से.
बड़ौदा का अतुल बेदादे. पूरा नाम अतुल चन्द्रकान्त बेदादे. जन्म का साल जानना भी जरूरी है. सन 1966. नब्बे के शुरुआती दिन ऐसे थे जब परंपरागत क्रिकेट शैली अपने चोले से बाहर नहीं आ पायी थी. भारत में कलात्मक संजय मांजरेकर, पाकिस्तान में स्टाइलिश शोएब मुहम्मद और श्रीलंका में स्लीपिंग जायंट मर्वन अटापट्टू ही चयन के अधिकारी थे और हर बाल पर छक्का मारने की सोचना क्रिकेटीय शब्दावली में ‘पुछल्ला’ होना था.
सीधे मुद्दे पर आते हैं . सनग्रेस मफ़तलाल की ओर से खेलते हुए अतुल के दोनों दोस्त सचिन और कांबली भारतीय कैप पहन चुके थे. बेदादे को अभी इंतजार करना था. 1993-94 का रणजी सत्र. अतुल बेदादे ने 17 मैचों में 1534 रन बनाए. जिनमे से 900 रन केवल चौकों और छक्कों से आए. कहने वाले कहते हैं कि वह चौके भी दरअसल छक्के थे. बस हाथ जरा हल्का पड़ गया था अतुल का. पंजाब के खिलाफ 62 गेंदों मे शतक में सबसे वहशी प्रहार अतुल ने भूपिंदर सिंह पर किया था. मगर यह सब उन्होंने तब किया जब कम गेंदों पर ज्यादा रन करना जल्दबाज़ी मानी जाती थी,योग्यता नहीं. उन्हे स्मैशर मान लिया गया था प्लेयर नहीं.

अपने बेटे के साथ अतुल
फिर आया मुंबई के खिलाफ वानखेडे मे खेला गया मैच. इस मैच में कहते हैं कि बालकनी मे बैठे पुराने खिलाड़ियों ने गेंद बस पार्किंग क्षेत्र में गिरने के बाद ही देखी थी. मुंबई के खिलाफ मैच मे 79 गेंदो पर शतक किया. रवि शास्त्री गवाह रहे. अजित वाडेकर दर्शक. शक्ति और कंधे का इतना बढ़िया मिश्रण बाद मे क्रिकेट प्रेकियों ने बस शाहिद अफरीदी मे ही देखा. आलम यह था कि अपने वक्त में अतुल बैट के हैंडल से भी गेंद मैदान पार करा देने की कुव्वत रखते थे.
साल 1994. अतुल बेदादे शारजाह में खेली जानी वाली ऑस्ट्रेलेशिया कप के लिए भारतीय टीम में चुने गए. 28 साल की उम्र में. जी 28 साल. अखबारों ने फिर भी नाम दिया – ‘श्रीमान छक्का विशेषज्ञ’. ठीक भी था. इसके अलावा अतुल बेदादे की दूसरी कोई पहचान थी भी नहीं.

अतुल बेदादे, रोहित शर्मा के साथ
15 अप्रैल 1994. अतुल बेदादे जब मैदान पर आए तो उनके सबसे पास रशीद लतीफ़ खड़े थे. विकेटकीपर रशीद लतीफ़. हाथ भर की दूरी पर. हाथ भर की दूरी का फायदा यह होता है कि आप बल्लेबाज के पाँव देख लेते हैं. और अगर आप रशीद लतीफ़ हैं तो पाँव की हरारत भी. रशीद ने सलीम मालिक की गेंद पर अतुल के पाँव की बेचैनियाँ देखी और गिल्लियाँ बिखेर दी. अतुल बेदादे महज तीन बॉल पर एक रन बना कर लौट गये थे.
अगला मौका महज हफ्ते भर बाद ही मिला. 22 अप्रैल 1994. ऑस्ट्रेलेशिया कप का फ़ाइनल. पाकिस्तान ने पहले बल्लेबाजी की और भारत को 251 रन का लक्ष्य दिया. भारत लक्ष्य का पीछा करते हुए 83 रन पर चार विकेट खो चुका था. अतुल बेदादे सफ़ेद हेलमेट पहने बलेबाजी करने आए. रशीद लतीफ़ फिर पीछे खड़े थे. उन्होने बिना मांगे एक नसीहत दे डाली- ‘आराम से, जल्दबाजी क्या है!’
रशीद लतीफ़ से यहीं गलती हो गयी. लड़के ने जल्दबाजी नहीं दिखाई. जमा और फिर पहले सलीम मालिक और फिर अकरम रज़ा को जमाया. V का बादशाह V में ही खेल रहा था. भारत जीत की ओर बढ़ ही रहा था कि फिर गलती हुई. अमीर सोहेल के फेके गए एक वाइड फुलटॉस को बाहर पहुंचाने के ख्याल से लगाए गए शॉट मे दम जरा कम लगा. कैच हुए और रशीद लतीफ़ की सांस मे सांस आई. भारत फिर जीत के करीब कभी नहीं दिखा और ना ही उसके बाद अतुल अपने रंग में दिखे. उनके द्वारा खेले गए 13 एकदिवसीय मैच मे उनका स्कोर इस प्रकार रहा - 7, 1, dnb, 44, dnb, 21, 1, 4, 51, 11, 3, dnb, 15.
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बल्ले में आ गयी गेंद उनकी शक्ति थी तो बल्ले तक नहीं आई गेंद उनकी कमजोरी भी. अंतर्राष्ट्रीय स्टार पर उनकी यह कमी ताड़ ली गयी और फिर अतुल एक दफा जो चोटिल हुए तो वापसी नहीं कर पाये. उम्र भी आड़े आया और चयन प्रक्रिया भी.
इस प्रकार जयसुर्या युग की शुरुआत हुई जो बेदादे युग की शुरुआत भी हो सकती थी. तुम गलत वक्त पर पैदा हुए सही खिलाड़ी थे, अतुल चन्द्रकान्त बेदादे.











