भारत को अंडर-20 एथलेटिक्स चैंपियनशिप में तीन मेडल हासिल हुए. मेडल विनर्स में 19 साल के जैवलिन खिलाड़ी आशीष यादव भी शामिल थे. आशीष ने इस टूर्नामेंट में सिल्वर मेडल जीता है. वह नीरज चोपड़ा के बाद इस इवेंट में मेडल जीतने वाले दूसरे भारतीय एथलीट हैं. इस सफलता के बाद भी आशीष को नौकरी की तलाश है. वह भी सिर्फ अपने पिता के लिए. उन्हें उम्मीद है कि इंटरनेशल मेडल से उनके लिए यह काम आसान हो जाएगा.
'पापा को दूध बेचते देख अच्छा नहीं लगता, नौकरी चाहिए', वर्ल्ड चैंपियनशिप में मेडल लाने वाले आशीष बोले
आशीष को नेशनल सेटअप में आए ज्यादा समय नहीं हुआ है. अप्रैल 2025 में हिसार के साई सेंटर पहुंचे थे. इससे पहले तक वह पिता के साथ गांव में दूध बेचते थे.

आशीष हरियाणा के हिसार के रहने वाले हैं. उनके पिता दूध बेचते हैं. आशीष अपने पिता को जब इतना मेहनत करता देखते हैं तो उन्हें बुरा लगता है. वह नहीं चाहते कि पिता अब यह काम करें. आशीष ने न्यूज एजेंसी से कहा,
मेरे पिता दूध बेचते हैं. वह मिर्जापुर के हमारे गांव में दूध बेचकर परिवार चलाते हैं. मेरे पिता के छह भाई हैं. उनमें तीन सैनिक और तीन किसान हैं. जब मैं अपने पिता को दूध बेचते देखता हूं तो मुझे अच्छा नहीं लगता.
आशीष ने आगे कहा,
मैं नौकरी तलाश रहा हूं, लेकिन अभी तक नहीं मिली है. मैं हिसार में अच्छी तरह ट्रेनिंग लेकर कड़ी मेहनत करूंगा और देश के लिए पदक जीतने की कोशिश करूंगा. इसी दौरान नौकरी मिलने की भी उम्मीद है. घर की आर्थिक स्थिति अभी भी वैसी ही है, क्योंकि मुझे नौकरी नहीं मिली है.
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आशीष को नेशनल सेटअप में आए ज्यादा समय नहीं हुआ है. वो अप्रैल 2025 में हिसार के साई सेंटर पहुंचे थे. यहां उन्होंने कोच अरविंद कुमार के मार्गदर्शन में ट्रेनिंग शुरू की. इसके बाद उनके प्रदर्शन में काफी सुधार आया. उनके थ्रो में लगभग 20 मीटर का सुधार हुआ. आशीष ने अपनी सफलता का सारा श्रेय कोच अरविंद को ही दिया. कहा कि अरविंद के कारण ही इस खेल की बारीकियां उन्होंने सीखी हैं. अरविंद ने उनकी मसल्स पर काम किया और शारीरिक तौर पर मजबूत किया. वह इससे पहले गांव में लकड़ी के बने जैवलिन से अभ्यास करते थे. आशीष ने बताया,
जब मैं अरविंद सर के पास गया, तब उनके पास 60 मीटर तक जैवलिन फेंकने वाले खिलाड़ी थे. मेरा टारगेट 70 मीटर तक पहुंचना था. कोच अरविंद के साथ छह महीने में मैंने अपनी दूरी 20 मीटर बढ़ा ली.
उन्होंने कहा कि जब वह हिसार आए थे, तब उन्हें तकनीक के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं थी. कोच ने उनकी तकनीक सुधारी. मांसपेशियों पर काम कराया और उन्हें शारीरिक रूप से मजबूत बनाया. आशीष का टारगेट है कि वह नीरज चोपड़ा जैसे बनें. लेकिन उनसे अपनी तुलना नहीं करना चाहते. उन्होंने कहा कि वह तुलना की जगह कड़ी मेहनत करना चाहते हैं. उनके गांव में कोई जैवलिन फेंकने वाला खिलाड़ी नहीं है. उन्हें उम्मीद है कि उनके गांव के लोग इस खेल को जानेंगे और इसे खेलना शुरू करेंगे.
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