चेन्नई का मैदान. गनीमत ये थी कि माह-ए-दिसंबर था. चिलचिलाती गरमी नहीं थी. चौथे दिन शाम का वक़्त और गंभीर और सहवाग बैटिंग करने उतर रहे थे. ये वो स्कोर था, जो किसी भी कप्तान को ड्रा की ओर ले जाता. 387, चेपक की पिच, सामने सामने एंडरसन, फ़्लिंटॉफ़, पनेसर और स्वान. काग़ज़ों पर ये ड्रा की स्क्रिप्ट कहलाती. लेकिन तब नहीं, जब आप एक खखोर, अड़ियल, क्रूर और हठ की पराकाष्ठा पर खड़े बैट्समैन हो. तब नहीं, जब आप पवेलियन से विकेट्स तक आते वक़्त गाना गुनगुनाते हो. तब नहीं, जब आपको सचिन तेंदुलकर छक्का मारने को मना करें और आप अगले ओवर की पहली गेंद को छक्का मारकर अपना 300 का स्कोर पूरा करें. तब भी नहीं, जब आपको लोग टीशर्ट का नंबर सजेस्ट करते फिरें और आप तंग आकर टीशर्ट बिना नंबर की पहनने लगे. ऐसे में आपके पास एक ही विकल्प होता है. विरेंदर सहवाग हो जाना.सहवाग ने अगले 22 ओवर में केविन पीटरसन को खून के आंसू रुला दिए. पीटरसन ने जिस तसल्ली के साथ 311 पर इंग्लैंड की इनिंग्स डिक्लेयर की थी, वो अब उन्हें उल्टा सता रही थी. इनिंग्स की पहली 33 गेंदों में बोर्ड पर 50 रन टंगे हुए थे. इस 50 रन में गंभीर के मात्र 10 रन थे. सहवाग के 42. सहवाग ने 32 गेंदों में 50 रन बना दिए. 8 चौके और 2 छक्के. मैदान में बैठे लोगों को अपनी आवाज़ वापस मिल गई थी. कॉलिंगवुड और स्ट्रॉस के बैटिंग अटैक के बाद अब उन्हें सहवाग का एक-एक शॉट मरहम सा लग रहा था. थर्ड मैन के ऊपर अपर कट पीटरसन को परेशान कर गया. पहला बॉलिंग चेंज ऑपरेशन में आया. सहवाग उस रोज़ ऐसा खेल रहा था जैसे उस पर कोई भूत चढ़ा हो. सहवाग वैसे हमेशा ही ऐसे खेलता था. लेकिन उस दिन समां कुछ अलग ही बंधा था. गजब का विश्वास. कमाल की टाइमिंग. जो एसी के बंद कमरों में हाथों में माइक पकड़े सहवाग के फुटवर्क को कोसते थे, अपने आप को चिकोटियां काट रहे थे. कई तो प्रायश्चित को तैयार थे. चेन्नई की जनता दुआएं दे रही थी. शोर अपने चरम पर था.
एंडरसन के पहले ही ओवर में दो चौके मारकर उन्होंने अपना मूड बता दिया था. स्टीव हार्मिसन की पेस को इस्तेमाल करते हुए वो चलते जा रहे थे. हालांकि एक कट को एलिस्टर कुक ने तब चुआ दिया था जब सहवाग 26 पर थे. इसका मलाल कुक को आज भी होगा. छठे ओवर में ही मोंटी पनेसर को देख सहवाग मन ही मन हंसे ज़रूर होंगे. तीसरी गेंद. लो फ़ुलटॉस. डीप स्क्वायर लेग के ऊपर से गेंद गायब हो गयी. ये हालत तब थी, जब पिच के टूटने को लेकर बातें कही जा रही थीं. टूटी हुई पिच पर सहवाग ऐसे बैटिंग कर रहे थे जैसे कंक्रीट पर खेल रहे हों. पनेसर को राहत तब ही मिली, जब वो ओवर द विकेट चला गया. उस दिन सहवाग ने जो खेल खेला वो लोग हमेशा याद रखेंगे. इंग्लिश टीम खासकर. सहवाग ने वो बैटिंग की जो कोई नहीं कर सकता था. सहवाग उस दिन कुछ भी छू लेते तो वो सोना बन जाता. सहवाग उस दिन इंडियन ओपनर नहीं, कसाई बने थे. 63 गेंद में 83 रन. सहवाग की सबसे उम्दा पारी. आउट हुए तो उस बॉलर की बॉल पर जो उस दिन सहवाग के खिलाफ़ शायद सबसे बेहतर गेंद फेंक रहा था. ग्रीम स्वान को पैडल करने के चक्कर में एलबीडब्लू हुआ. इंडिया ने 29 ओवर में 131 पर 1 विकेट पर दिन खतम किया.
अगले दिन 256 रन का टार्गेट था बस. बचा हुआ काम सचिन और युवराज की 163 रन की पार्टनरशिप ने काम कर दिया. सचिन की सेंचुरी पूरी हुई. इंडिया की ये चौथी इनिंग्स किसी चिकन की रेसिपी जैसी थी. चिकन को तेल और प्याज़ के साथ धीमी आंच पर रख छोड़ा गया था. जिससे गोश्त प्याज़ के छोड़े पानी के साथ इस कदर पकता रहे कि वो उसे जज्ब कर ले. आधा काम मसालों का होता है. जो अगला हिस्सा होता है. मसाले कितना भी असर कर लें लेकिन अगर गोश्त प्याज़ के छोड़े पानी में पकते हुए अच्छे से पक नहीं जाता और मुलायम नहीं हो जाता, रेसिपी धरी की धरी रह जाती है. सहवाग उस दिन प्याज़ में गोश्त गला रहे थे. मसाले थे सचिन तेंदुलकर और युवराज सिंह. बटुली में दिख वही रहे थे. रेसिपी की शुरुआत सहवाग ने ही की थी. 387 के टार्गेट को नर्म सहवाग ने ही किया था. प्याज़ के पानी से उसे काटा था.
मैच खत्म होने के बाद ये जीत 26/11 अटैक के विक्टिम और उनकी फैमिली को डेडिकेट की थी.











