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अब मिचेल स्टार्क और उनकी बीवी ने क्या रिकॉर्ड बना दिया?

परफेक्ट कपल गोल तो इसे कहते हैं.

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मिचेल स्टार्क और एलिसा हिली ( फोटो क्रेडिट : AP और Instagram)
मिचेल स्टार्क और एलिसा हीली. क्रिकेट की दुनिया के पावरकपल. आप स्टार्क और एलिसा हीली को परफेक्ट कपल गोल्स के उदाहरण के रूप में भी इस्तेमाल कर सकते हैं. ऐसा इसलिए क्योंकि जो उपलब्धि इन दोनों मियां-बीवी ने हासिल की है, वो अभी तक विश्व क्रिकेट में किसी भी कपल ने हासिल नहीं की थी. एलिसा हीली ऑस्ट्रेलिया के पूर्व विकेटकीपर इयान हीली की भतीजी हैं. लेकिन उनकी पहचान इससे ज्यादा है. एलिसा हीली ऑस्ट्रेलिया महिला क्रिकेट टीम की विकेटकीपर बल्लेबाज हैं. और ताबड़तोड़ बल्लेबाजी के लिए मशहूर है. एलिसा हीली ऑस्ट्रेलिया के लिए पांच T20 विश्वकप जीत चुकी हैं. वह साल 2018 के T20 विश्वकप में प्लेयर ऑफ द टूर्नामेंट भी थीं. वहीं, 2020 T20 विश्वकप के फाइनल में एलिसा प्लेयर ऑफ द मैच बनीं थीं. उन्होंने भारत के खिलाफ 39 गेंदों में 75 रन की पारी खेली थी. एलिसा हीली महिला क्रिकेट की सुपरस्टार हैं. और उनके हसबैंड मिचेल स्टार्क का पुरुष क्रिकेट में कुछ ऐसा ही रुतबा है. मिचेल स्टार्क ऑस्ट्रेलियाई पेस अटैक की अगुवाई करते हैं. 2015 वनडे विश्वकप के हीरो हैं. प्लेयर ऑफ द टूर्नामेंट रहे थे. और अब मिचेल स्टार्क ने T20 विश्वकप खिताब जीता है. इस खिताबी जीत के साथ ही मिचेल स्टार्क और एलिसा हीली T20 विश्वकप जीतने वाले पहले और इकलौते कपल बन गए हैं. UAE में खेले गए T20 विश्वकप के फाइनल में ऑस्ट्रेलिया ने न्यूज़ीलैंड को आठ विकेट से हरा दिया. टॉस जीता ऑस्ट्रेलियाई कप्तान आरोन फिंच ने. और पहले गेंदबाजी करने का फैसला किया. कप्तान केन विलियमसन की 85 रन की पारी बदौलत न्यूज़ीलैंड ने निर्धारित 20 ओवर्स में 172 रन बनाए. विलियमसन के अलावा मार्टिन गप्टिल ने 28 रन की पारी खेली. वहीं, ऑस्ट्रेलिया की तरफ से जोश हेज़लवुड सबसे सफल गेंदबाज रहे. जिन्होंने चार ओवर के स्पेल में 16 रन देकर तीन विकेट चटकाए. मिचेल स्टार्क का प्रदर्शन निराशाजनक रहा. उन्होंने चार ओवर में 60 रन लुटा डाले. जवाब में ऑस्ट्रेलिया ने दो विकेट खोकर लक्ष्य हासिल कर लिया. मिचेल मार्श ने नाबाद 77 रन की पारी खेली. इस दौरान उन्होंने छह चौके और चार छक्के लगाए. जबकि डेविड वॉर्नर ने 38 गेंदों में 53 रन की पारी खेली. बताते चलें कि ये ऑस्ट्रेलिया का पहला T20 विश्वकप खिताब है. और इसे हासिल करने के लिए कंगारुओं को 15 साल का इंतजार करना पड़ा.

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