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रिवॉल्वर लेकर अपनी जान लेने क्यों निकल गया था ये भारतीय गेंदबाज?

डिप्रेशन ने कैसे तबाह कर दी पूरी ज़िंदगी?

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प्रवीण कुमार ने अपना आखिरी मुकाबला 2012 में खेला था. 2018 में उन्होंने हर तरह की क्रिकेट से संन्यास ले लिया था.
क्रिकेट का खेल दिनोंदिन रंगीन होता जा रहा है. दौलत और शोहरत की चकाचौंध बढ़ी है. हमें इस खेल की बाहरी चमक-दमक तो नज़र आती है, लेकिन पर्दे के पीछे एक और दुनिया चलती रहती है. जहां तक हमारा ध्यान नहीं जाता या यूं कहें कि हम दिलचस्पी नहीं लेते.
इंडियन क्रिकेट टीम के पूर्व गेंदबाज प्रवीण कुमार ने इंडियन एक्सप्रेस को इंटरव्यू
दिया है. उन्होंने दुनिया को वही अनदेखा हिस्सा बताने की कोशिश की है. इस इंटरव्यू में उन्होंने खिलाड़ियों में डिप्रेशन और मानसिक बीमारी की समस्या पर जोर देकर बात की. उन्होंने अपने डिप्रेशन का अनुभव भी साझा किया है.

किस्सा खत्म करने के लिए निकल गए थे
प्रवीण कुमार ने वो वाकया भी बताया, जब वे अपना रिवॉल्वर लेकर सुसाइड करने निकल गए थे. कुछ महीने पहले की बात है, एक सुबह जब मेरठ में उनकी फ़ैमिली सोई थी, प्रवीण कुमार ने मफ़लर बांधा, रिवॉल्वर रखा और अपनी कार लेकर हरिद्वार के रास्ते निकल गए. इंडिया के लिए खेले लंबा वक्त गुज़र चुका था. शोहरत अचानक से खत्म हो गई थी. यकायक भुला दिए जाने की कसक प्रवीण कुमार के मन में घर कर गई थी. उन्होंने अपने मन में कहा कि अब पूरा किस्सा खत्म करते हैं.
फिर उनकी नज़र कार में लगी अपने बच्चों की तस्वीर पर गई. बच्चों का ख्याल आया तो प्रवीण कुमार होश में आए. उन्होंने सुसाइड का इरादा छोड़ा और वापस लौट आए. जिस उमर में क्रिकेटर खुद को साबित करने के लिए मैदान पर अपनी जान लगा देते हैं, प्रवीण कुमार दवाईयों के सहारे अपनी ज़िंदगी संवारने की कोशिश कर रहे हैं.
एक बार बीमार हुए और कैरियर डूब गया
2007 में प्रवीण कुमार को टीम इंडिया में खेलने काम मौका मिला था. 2008 में इंडिया ने ऑस्ट्रेलिया के ख़िलाफ़ पहली त्रिकोणीय सीरीज जीती. इस सीरीज के फ़ाइनल्स में प्रवीण कुमार हीरो बनकर उभरे थे. दोनों फ़ाइनल में एडम गिलक्रिस्ट और रिकी पोंटिंग प्रवीण कुमार के शिकार बने थे.
टूर्नामेंट के चार मैचों में 10 विकेट. 2011 में वनडे वर्ल्ड कप था. टीम में जगह पाने के दावेदार थे. लेकिन टूर्नामेंट से ठीक पहले डेंगू की वजह से बीमार हो गए. बाद में प्रवीण डेंगू से तो उबर गए लेकिन उनका कैरियर इस झटके से नहीं उबर पाया.
मनोज प्रभाकर ने प्रवीण कुमार को स्विंग बोलिंग का जादूगर कहा था.(फोटो: गेट्टी इमेजेज)
मनोज प्रभाकर ने प्रवीण कुमार को स्विंग बोलिंग का जादूगर कहा था. (फोटो: गेट्टी )

प्रवीण कुमार एक समय इंडियन पेस अटैक की जान हुआ करते थे. शुरुआती ओवरों में विकेट निकालने का उनका टैलेंट बेजोड़ था. वे अब कहां हैं, इसकी फ़िक्र कम ही लोगों को होगी. कभी विपक्षी बल्लेबाजों में दहशत भरने वाले प्रवीण कुमार ने अपना आखिरी इंटरनेशनल मुकाबला साउथ अफ़्रीका के ख़िलाफ़ खेला था. 30 मार्च 2012 को खेला गया यह मैच एक T20 मुकाबला था. टीम इंडिया वो मैच हार गई थी. इस मैच के बाद वे इंटरनेशनल क्रिकेट में कभी वापसी नहीं कर पाए. अक्टूबर 2018 में उन्होंने हर तरह की क्रिकेट से संन्यास लेने का ऐलान किया था.
जब डिप्रेशन हावी हुआ
इंडिया में मानसिक अवसाद टैबू की तरह है. कोई इसपर खुलकर बात नहीं करना चाहता. अगर कोई अपनी प्रॉब्लम सामने रखे तो उसे कमजोर समझा जाता है. और जब बात खिलाड़ियों की हो तो ऐसा सोचना भी पाप समझा जाता है. अब धीरे-धीरे लोग खुलने लगे हैं.
विराट कोहली के कैरियर में भी एक ऐसा दौर आया था. उनके बल्ले से रन नहीं निकल रहे थे. वो मेंटली परेशान थे. लेकिन अपना दर्द शेयर नहीं कर पाए और खेलना जारी रखा. नवंबर 2019 में जब ऑस्ट्रेलिया के स्टार ऑलराउंडर ग्लेन मैक्सवेल ने डिप्रेशन की वजह से क्रिकेट से ब्रेक लिया, उनके इस कदम की विराट कोहली ने तारीफ की थी.
प्रवीण कुमार बताते हैं कि अवसाद के लक्षण 2014 के आस-पास ही दिखने लगे थे. टीम इंडिया से ड्रॉप किए गए और IPL का कॉन्ट्रैक्ट भी नहीं मिला था. वो मेरठ के अपने घर में चुपचाप रहने लगे थे. अपने कमरे में बंद. अकेले ही अपनी गेंदबाजी के वीडियोज देखा करते थे. घंटों तक पंखे को एकटक घूरते हुए लेटे रहते थे. अपना दुखड़ा किसी से बांट भी नहीं पाते थे.
वे कहते हैं,
इंडिया में डिप्रेशन का कॉन्सेप्ट ही कहां होता है? कोई इसके बारे में नहीं जानता और मेरठ में तो बिल्कुल भी नहीं.
डॉक्टरों के साथ लंबा सेशन
प्रवीण कुमार का इलाज शुरू हुआ तो उनको अपने घर से शिफ्ट होकर एकांत में रहना पड़ा. उस दौरान उनसे बातचीत करने के लिए कोई आसपास नहीं होता था. चिड़चिड़ापन हावी हो गया था. दिमाग में बहुत कुछ भरा रहता था. उन्होंने अपने डॉक्टर को कहा था कि बस एक ही चीज उन्हें फिर से ठीक कर सकती है. क्रिकेट के मैदान पर वापसी.
एक दौर था जब प्रवीण कुमार के आगे दुनिया के टॉप बैट्समैन पानी भरते थे.
एक दौर था जब प्रवीण कुमार के आगे दुनिया के टॉप बैट्समैन पानी भरते थे.

2019 में उन्हें उत्तर प्रदेश अंडर-23 टीम का गेंदबाजी कोच बनाया गया. लेकिन स्थिति उनके मुताबकि नहीं थी, तो वो पोस्ट भी छोड़नी पड़ी. उसी दौरान उन्होंने सबकुछ खत्म करने का प्लान बनाया और तड़के सुबह कार लेकर निकल गए थे. अवसाद के दिनों में उनका वजन भी 15 किलो घट गया था.
वे बताते हैं,
कोई अपनी फैमिली से कितनी बातें कर सकता है? मैं हमेशा से लोगों से घिरा रहा हूं. सड़क पर चलते हुए सलाम दुआ हो गई. अब मुझे किसी से बात करनी होती है तो अपने रेस्टोरेंट जाना पड़ता है.
68 वनडे में 77 और 6 टेस्ट में 27 विकेट. प्रवीण कुमार का इंटरनेशनल कैरियर यहीं पर थमा और फ़िर खत्म हो गया. उन्होंने लंबे समय के बाद अपना दुख साझा किया है. ये किस्सा सबको जानना जरूरी है ताकि स्पोर्ट्स में डिप्रेशन के मुद्दे पर खुलकर बात की जा सके.


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