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हाई कोर्ट ने हिंदू कपल को सौंपी मुस्लिम बच्ची, कहा- 'धर्म से ऊपर है भलाई...'

इससे पहले फैमिली कोर्ट ने इस याचिका को यह कहते हुए खारिज कर दिया था कि बच्चा एक लड़की है और कपल उसके लिए ‘अजनबी’ हैं. Madras High Court ने इस आदेश को रद्द कर दिया.

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हाई कोर्ट ने बच्चे के कल्याण को धर्म से ऊपर मानते हुए यह फैसला सुनाया. (सांकेतिक फोटो: आजतक)

मद्रास हाई कोर्ट की मदुरै बेंच ने एक नाबालिग मुस्लिम लड़की की परवरिश एक हिंदू कपल को सौंप दी. कोर्ट ने 'बच्चे के कल्याण' को धर्म से ऊपर मानते हुए यह फैसला सुनाया. इससे पहले, फैमिली कोर्ट ने इस याचिका को यह कहते हुए खारिज कर दिया था कि बच्चा एक लड़की है और कपल उसके लिए ‘अजनबी’ हैं. लेकिन मद्रास हाई कोर्ट ने इस आदेश को रद्द कर दिया.

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बार एंड बेंच की रिपोर्ट के मुताबिक, एस. बालाजी ने अपनी पत्नी के साथ मिलकर बच्चे का कानूनी गार्जियन (अभिभावक) बनने की गुजारिश की थी. कोर्ट ने उनकी यह अपील मंजूर कर ली. जस्टिस एन आनंद वेंकटेश और जस्टिस केके रामकृष्णन की डिवीजन बेंच ने कहा कि बच्चे की भलाई धर्म से ज्यादा अहम है. कोर्ट ने कहा,

“कोर्ट को जिस सबसे अहम बात पर गौर करना चाहिए, वह है बच्चे की भलाई. इसके अलावा, कोर्ट को नाबालिग की उम्र, लिंग, धर्म, और साथ ही गार्जियन के चरित्र और काबिलियत पर भी विचार करना चाहिए.”

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क्या है मामला?

इस कपल के बच्चे नहीं थे और वे लड़की की असली मां को एक दशक से ज्यादा समय से जानते थे. बच्ची की मां एक दिहाड़ी मजदूर थी और अपने पति की मौत के बाद दो बच्चों को पालने-पोसने के लिए संघर्ष कर रही थी. उसने जन्म के तुरंत बाद ही तीसरी संतान को अपनी मर्जी से इस हिंदू कपल को सौंप दिया. इसके बाद, कपल ने गार्जियनशिप को औपचारिक रूप देने के लिए मदुरै की फैमिली कोर्ट का दरवाजा खटखटाया.

फैमिली कोर्ट ने 29 सितंबर, 2025 को यह याचिका खारिज कर दी. हालांकि, कोर्ट ने यह भी लिखा था कि किसी गैर-मुस्लिम को अभिभावक बनाने पर कोई कानूनी रोक नहीं है. फिर भी, अदालत ने यह देखते हुए याचिका खारिज कर दी कि बच्चा एक लड़की थी और दंपति ‘अजनबी’ थे. इसके बाद कपल ने हाई कोर्ट में याचिका दायर की.

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हाई कोर्ट ने क्या कहा?

बेंच ने दोनों पक्षों से बातचीत की और कपल के साथ बच्चे के रिश्ते पर गौर किया. आदेश में कहा गया, 

"बच्चा अपीलकर्ता को पिता और उसकी पत्नी को मां कहकर बुला रहा था. जबकि बच्चा अपनी असली मां को 'आंटी' कहकर बुला रहा था."

हाई कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि गार्जियन्स एंड वार्ड्स एक्ट, 1890 कोई धार्मिक रोक नहीं लगाता है. अदालत ने कहा कि कोई भी व्यक्ति जो किसी नाबालिग बच्चे का अभिभावक बनने का इच्छुक हो, वह आवेदन कर सकता है. इसलिए, अदालत ने अपील को मंजूर कर लिया और उस कपल को बच्चे का कानूनी अभिभावक नियुक्त कर दिया.

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