शुरुआत में सरपंच ने पीयूष से स्कूल के दिनों के बारे में पूछ दिया. पीयूष बोले, 'हम कॉन्वेंट के लायक दिखते हैं क्या? (पीयूष कॉन्वेंट में पढ़े हैं) जिसका कुछ नहीं बिगड़ना होता, उसका कॉन्वेंट भी कुछ नहीं बिगाड़ पाता तू-तड़ाक करके बात करना हमें पसंद था. जिस वक्त क्लासिकल सीखने की उम्र थी, तब थिएटर की आवारागर्दी कर रहा था मैं.

पीयूष मिश्रा ने जितने गाने गाए, उतने ही किस्से भी सुनाए
थिएटर सीखने पीयूष गए थे नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा. तो किस्सा निकल आया पीयूष के उस प्ले का, जो नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा में बैन हो गया था. पीयूष ने बताया कि उस प्ले का नाम था 'हैमलेट कभी बॉम्बे नहीं गया'. इसकी कहानी कुछ यूं है कि दुनियाभर से थिएटर सीखने की चाहत रखने वालों के साथ ग्वालियर का हैमलेट भी पहुंच गया एनएसडी. सबकी तरह उसे भी एक्टिंग नाम की लड़की से प्यार है जो एनएसडी में रहती थी. एक दिन एक्टिंग एनएनडी से गायब हो जाती है. तो हैमलेट, शेक्सपेयर की और भगवान चाय वाले की मीटिंग बैठ जाती है. ये उस वक्त एनएसडी में चल रहे झोल पर व्यंग्य था. इस पर एनएसडी के लोग इतना खफा हुए कि नाटक बैन कर दिया.
बातों से बातें निकलती गईं. फिर पीयूष ने बताया कि कैसे दिल्ली के शोर में बैठ कर उन्होंने सात दिनों में गुलाल का आठ गानों का पूरा अलबम तैयार कर दिया था. पीयूष ने अपनी ज़िंदगी में 'तब' और 'अब' का फर्क बताते हुए कहा कि 'इक बगल में चांद होगा इक बगल में रोटियां' मेरे अभाव के दिनों में लिखे गए गाने हैं.

पावनी पांडे ने पब्लिक डिमांड पर बीड़ी जलई ले भी गाकर सुनाया
शरो-शायरी के बारे में पीयूष बोले कि मैं शेर लिखता हूं, लेकिन पढ़ने का सलीका नहीं है. सब कुछ डॉयलॉग की तरह पढ़ने की आदत है. मैं नहीं मानता कि शेरो-शायरी सिर्फ तालियों के लिए हों. मैं चाहता हूं कि मेरे शेरों पर लोग तालियां न बजाएं, सोचते रहें. फिर पीयूष ने सुनाई 'वो काम भला क्या काम हुआ.' हुस्ना का किस्सा पीयूष ने यों बताया कि किशननगर, लाहौल से उनकी मां थीं. गाना लिखकर जब पीयूष ने उसे इस्लामाबाद में गाया, तो वहां सब रो पड़े थे, पीयूष की मां भी. खुद पीयूष भी.
पावनी पांडे से सरपंच ने पूछा कि कब से गा रही हैं तो उन्होंने बताया कि याद ही नहीं कि कब से गा रही हूं. मां कहती थी कि जब बोलना नहीं जानती थी तब से गुनगुना रही हूं. पहला राग यमन सीखा. 'आज जाने की जिद न करो', 'चंदन सा बदन' इसी राग पर आधारित हैं. सरपंच ने पूछा कि सभी राग यमन ही सीखते हैं सबसे पहले, तो बताया कि संगीत की तालीम में सबसे पहले यमन सीखने को ही कहा जाता है.

रचिता अरोड़ा ने 'न्यूटन' के लिए म्यूज़िक देने का मौका मिलने का किस्सा सुनाया
छुई-मुई सी दिखने वाली रचिता अरोड़ा ने बताया कि उन्हें कम्यूनिकेट करने में थोड़ी प्रॉब्लम है. इसलिए स्वभाव शर्मीला है. संगीत की तालीम में इंदौर घराने की बंदिशें सीखीं. 'न्यूटन' का म्यूज़िक देने का मौका मिलने की कहानी उन्होंने यूं बताई कि उन दिनों वो 'शिवमंगल सावधान' का बैकग्राउंड स्कोर तैयार कर रही थीं. इस फिल्म के लिए इरशाद कामिल के लिखे लिरिक्स रचिता ने पढ़े थे और उनका बड़ा मन था कि वो उनके लिए म्यूज़िक दें. लेकिन वो तुरंत प्रॉजेक्ट से जुड़ नहीं सकती थी. उन्हें लगा कि वक्त बीत जाने पर 'न्यूटन' का म्यूज़िक उनके हाथ से निकल जाएगा. लेकिन न्यूटन उनकी किस्मत में लिखी ही थी. इरशाद ने फिल्म के लिए दोबारा लिरिक्स लिखे और उनके तैयार होते तक रचिता शुभमंगल सावधान के काम से भी फुर्सत पा गईं. इस तरह उन्हें 'न्यूटन' मिली.
देखिए लल्लनटॉप शो में पीयूष, पावनी और रचिता की पूरी बातचीत:
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