लेकिन थियेटर के अन्दर धोनी का सिक्का चला है. और इससे हमें साफ़ तौर पर इंडियन क्रिकेट में उनकी अहमियत के बारे में पता चलता है. धोनी की वो कहानी जो कमोबेश सभी को मालूम ही है, को बड़े पर्दे पर देखने जाना लोगों के दिल और दिमाग में धोनी के लिए प्यार ही दिखाता है. बड़ी स्क्रीन पर धोनी का वो आखिरी छक्का देखना सचमुच ऐसा सुख देता है, जिसको हम काफ़ी समय से तलाश रहे होते हैं. और ये कहना कि वो वर्ल्ड कप का आखिरी शॉट महज़ क्रिकेट प्रेमियों के लिए ही अहमियत रखता है तो ये निहायती ग़लत स्टेटमेंट होगा. उस एक शॉट ने देश भर को एक कर दिया था. धोनी का हाल कहीं न कहीं वैसा ही है, जैसा द्रविड़ का था. राहुल द्रविड़, इंडिया की दीवार. जब क्रिकेट को अलविदा कहकर गए तो अचानक हमें इस बात का अहसास हुआ कि हमारे बीच अब क्या मौजूद नहीं है. और ऐसे में हमें राहुल द्रविड़ की असल वैल्यू मालूम चली. और सच, राहुल द्रविड़ रिटायरमेंट के बाद वहां पहुंच गए जहां हमेशा उनका होना अपेक्षित था. धोनी के साथ भी बहुत कुछ ऐसा ही है. कोहली भरी जवानी में टेस्ट कैप्टन बने हैं. धोनी ने अपने बाल पांच दिन की धूप में उजले करवा लिए. धोनी के टेस्ट मैच से विदा लेने पर एक गड्ढा बना है. उसे भरा जाना हाल-फिलहाल में तो संभव नहीं दिखता. और ये बात हम सभी जानते हैं. ऐसे में तीन घंटो को ही सही, धोनी को देखने के लिए लोग निकल पड़े हैं. ये वो अहसास है जो शायद एक सेट ग्रुप ऑफ़ ऑडियंस को सलमान खान को देखने मात्र से आता है. उन्हें फ़र्क नहीं पड़ता कि फिल्म की कहानी क्या है, क्या स्क्रिप्ट है, क्या मामला है. उन्हें महज़ उस शख्सियत को पर्दे पर ज़िन्दा होते हुए देखना होता है. इसके लिए टिकट की कीमत, समय और संगत मैटर नहीं करती. एम एस धोनी- द अनटोल्ड स्टोरी की तगड़ी ओपेनिंग के पीछे भी यही ख़याल है. और यही फिलहाल, धोनी को क्रिकेट की फ़ील्ड का सलमान खान बनाये रक्खे हुए है. ये भी पढ़ें:










