क्रिकेट के शैशवकाल की कहानी है. अंग्रेज़ ज़मींदार गांव में जाकर मज़दूरों को इकट्ठा करते और कहते - ल्यो भिया करो बॉलिंग, हम करते हैं बैटिंग. मज़दूरों को कुछ पैसे मिल जाते थे और सारा दिन गेंदबाज़ी करते थे. ज़मींदार सिर्फ बैटिंग. क्रिकेट होता था गांव के बाहर खुले मैदानों में. मैदान का कोई निश्चित आकार नहीं होता था और आज तक नहीं होता है. क्रिकेट की नींव सही-सही ऐसे ही पड़ी ये शोध का विषय है पर हक़ीक़त तो ये ही है कि क्रिकेट में गेंदबाज़ मज़दूर हैं और बल्लेबाज़ ज़मींदार. रविचंद्रन अश्विन, विराट कोहली से कहीं भी कमतर नहीं हैं, दोनों ही नई टीम इंडिया के हीरो हैं लेकिन जितनी शोहरत-दौलत विराट कोहली को मिल रही क्या उतनी ही अश्विन को मिलेगी ?
कोहली क्रिकेट के ज़मींदार हैं, अश्विन हैं मज़दूर
खुद क्रिकेट ने किया है ये भेद.

सचिन की आखिरी सीरीज़ का पहला मैच याद कीजिए. कोलकाता में पहला टेस्ट. शमी ने गेंद की सीम से करतब दिखाते हुए पहली पारी में 71-4 और दूसरी पारी में 47-5 विकेट लिए थे. स्पिनरों के स्वर्ग, भारतीय पिचों पर तेज़ गेंदबाजी का ये नायाब नमूना था. लेकिन मैन ऑफ द मैच मिला रोहित शर्मा को 177 रन की एक पारी के लिए. इसी मैच में अश्विन ने 124 रन बनाए और 5 विकेट भी लिए. अब आप ही बताइए किसको मिलना चाहिए था मैन ऑफ द मैच? कितने मौके आते हैं जब बराबरी के प्रदर्शन में किसी बल्लेबाज़ को नहीं बल्कि गेंदबाज़ को मैन ऑफ द मैच दिया गया हो. ये लगभग तय रहता है कि बल्लेबाज़ ही 'मैन ऑफ द मैच' ले जाएंगे.
अश्विन और विराट की भी तुलना कर लेते हैं. दोनों ने कुछ ही महीनों के अंतर पर टेस्ट खेलना शुरू किया, अश्विन के 39 मैचों में 7 'मैन ऑफ द मैच' हैं और कोहली के 48 मैचों में 2. रन और विकेट दोनों मानकों को एक साथ लेकर विराट-अश्विन को तौल लीजिए. हम ये नहीं कह रहे कि विराट कम खिलाड़ी हैं या कप्तान तो अश्विन को बना दीजिए. पर एक साथ भारतीय क्रिकेट के आकाश पर उदय होने वाले 2 सितारों में गेंदबाज़ को साइड-हीरो ही माना जाएगा. फुल टर्म कप्तान तो शायद ही कोई गेंदबाज बन पाएगा. क्रिकेट इतिहास की किताबों में लिखा जाएगा - अनिल कुंबले कुछ मैचों के लिए कप्तान बनने वाले आखिरी गेंदबाज थे.
कितने लोग हैं जो वर्ल्ड कप 2011 फाइनल की जीत में धोनी-गंभीर की पारी के अलावा ज़हीर खान के लगातार निकाले गए 3 मेडन ओवरों की चर्चा भी पहली सांस में करते हैं.
वनडे, टी20 में तो गेंदबाज़ पूरे मज़दूर बन जाते हैं. फील्डिंग की पाबंदियां, सफेद गेंद, सपाट पिच और गेंदबाज पिटने के लिए हाज़िर है. बोर्ड वाले कहते हैं जनता बल्ले और गेंद का मुकाबला नहीं, चौके-छक्के देखना चाहती है. ज़मीदारों के बल्लों से मज़दूरों की गेंदों को पिटते हुए देखना चाहती है.
जनता में छोटे और बड़े स्टार की छवि से कोहली-अश्विन के खेल या जीवन पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा. पर गेंदबाज़ों के साथ होने वाले इस भेदभाव का नुकसान क्रिकेट को उठाना पड़ेगा. भला कैसे ?
लेग स्पिन गेंदबाज़ी लगभग खत्म हो गई है. अमित मिश्रा जैसे एक-आध खिलाड़ी उस परंपरा को ज़िंदा रखे हैं. अभी वो स्थिति नहीं आई है पर कलात्मक गेंदबाज़ी के जाने से गेंदबाज सीधी-सपाट गेंदबाज़ी और बॉडी लाईन जैसे जुगाड़ों पर उतरेंगे. बल्लेबाज़ घुमाते रहें बैट.गेंदबाज़ी और खासकर तेज़ गेंदबाज़ी, बैटिंग से ज्यादा मेहनत का काम है. मीडिया तो मीडिया खुद आईसीसी वाले भी अगर 'मैन ऑफ द मैच' तक देने में गेंदबाज़ों के साथ भेदभाव करेंगे तो क्वालिटी गेंदबाज़ कहां से आएंगे? और जब तक गेंदबाज़ों को मज़दूर और बल्लेबाज़ों को ज़मींदार मानते रहेंगे तब तक मोहल्ले के छोरे गेंद से पहले बल्ला उठाते रहेंगे. वॉर्न, कुंबले, मुरलीधरन, ग्लैन मैक्ग्रा, अकरम, डोनाल्ड जैसे गेंदबाज़ एक ही दौर में खेलें ऐसा दौर फिर कभी नहीं आएगा.










