भारतीय महिला हॉकी टीम ने 44 साल बाद एशियन गेम्स में गोल्ड मेडल जीता. इस जीत ने टीम इंडिया को लॉस एंजेलिस ओलंपिक का टिकट दिला दिया. महिला टीम अब ओलंपिक क्वालिफायर नहीं खेलेगी. इससे पहले, पेरिस ओलंपिक के लिए भारतीय टीम क्वालिफाई कर नहीं पाई थी. इस वजह से यह गोल्ड टीम के लिए और खास है. टीम की गोलकीपर सविता पूनिया ने लल्लनटॉप को दिए इंटरव्यू में टीम की तैयारी और सेलिब्रेशन को लेकर बात की.
'पीला धागा, स्पीच, और मां की बात', सविता पूनिया ने सुनाई एशियन गेम्स के गोल्ड की कहानी
भारतीय महिला हॉकी टीम ने एशियन गेम्स के फाइनल में चीन को 1-0 से हराकर गोल्ड मेडल जीता. इस फाइनल मैच में भारतीय गोलकीपर सविता पूनिया ने अहम भूमिका निभाई थी. उन्होंने लल्लनटॉप से बातचीत में टीम की तैयारी और सेलिब्रेशन पर बात की.

चीन के खिलाफ फाइनल मुकाबले में आपने पेनल्टी स्ट्रोक रोका, उस समय दिमाग में क्या चल रहा था?
एक सेव के पीछे बहुत सालों की मेहनत है. मेरी टीम के खिलाड़ियों का सपोर्ट है. मेरे कोच और मेरे परिवार का भरोसा है. पेनल्टी स्ट्रोक जब दिया गया, तो टीम इस बारे में सोच रही थी कि रेफरल लिया जाए या नहीं. क्योंकि टैकल बहुत रफ था. मुझे खुद को तैयार करने का समय मिल गया. मैं यह सोच रही थी कि मुझे क्या करना है. अगर यह शॉट होता है, तो मुझे किस तरीके से इसे रोकना है.
हमें पेनल्टी स्ट्रोक और शूटआउट के लिए अलग से तैयारी कराई गई थी. इस दौरान हमने कई खिलाड़ियों की वीडियो देखी थीं और यह एनालिसिस किया था कि कौन खिलाड़ी कहां शॉट मारता है. मुझे और बिच्छू देवी को लग रहा था कि सामने वाली स्ट्राइकर मेरे बाईं तरफ ही शॉट लगाएगी और ऐसा ही हुआ. मेरी टीम की खिलाड़ियों को हमेशा यह भरोसा रहता है कि जब भी कोई इस तरह की मुश्किल स्थिति होगी, तो सविता दीदी उसे संभालेंगी और टीम को मदद मिलेगी. इसी कारण मुझे खुद पर भरोसा करना था कि हां, मैं यह कर सकती हूं और अपनी टीम को निराश नहीं कर सकती.
जब आपने पेनल्टी स्ट्रोक रोका, तो टीन का क्या रिएक्शन था?
सेलिब्रेशन करने का तो समय ही नहीं मिला. सब कुछ एक्शन में ही निकल गया. मैं उस तरह की खिलाड़ी नहीं हूं, जो बहुत ज्यादा सेलिब्रेट करती है. लेकिन पेनल्टी स्ट्रोक सेव करने के बाद अपनी सेलिब्रेशन देखकर मुझे अभी खुद ही हंसी आ रही है कि मैं कैसे सेलिब्रेट कर रही थी. लेकिन उस एक सेव ने पूरी टीम को और विश्वास दिया. हमारी बॉडी लैंग्वेज बदल गई और हमें एक तरह से यकीन हो गया कि अब तो हम गोल नहीं खाएंगे, चाहे जो हो जाए.
एशिया गेम्स आपके लिए कितने खास रहे?
एशियन गेम्स मेरे लिए बहुत ही ज्यादा खास थे, क्योंकि यहां मैंने भारत के लिए सबसे ज्यादा इंटरनेशनल मैच खेलने का रिकॉर्ड बनाया. उसके बाद फाइनल में पेनल्टी स्ट्रोक सेव करना और अपनी टीम को जीत दिलाना बहुत खास था. हमारे दिल में पेरिस ओलंपिक के लिए क्वालिफाई न कर पाने की निराशा थी. किसी भी हाल में हमें उस दर्द को खत्म करना था. मेरी मां ने भी मुझसे कहा था, “बेटा, बहुत बार तुम्हें रोते हुए देखा है, निराश होते हुए देखा है. इस बार तुम्हारे गले में गोल्ड मेडल देखना है.” और वही हुआ.
एशियन गेम्स से ठीक पहले वर्ल्ड कप था. टीम ने वहां भी बहुत अच्छा प्रदर्शन किया. दोनों टूर्नामेंट के बीच महज एक हफ्ते का समय था. उस एक हफ्ते में टीम ने क्या खास तैयारी की?
एशियन गेम्स का हमारा सफर जनवरी में शुरू हुआ, जब हमें नया स्टाफ मिला. श्योर्ड मारिन फिर से हमारे साथ कोच बनकर आए. हमने तभी तय कर लिया था कि इस साल हमारे लिए दो अहम टूर्नामेंट हैं. वर्ल्ड कप और एशियन गेम्स. हमने एशिया कप जीता और वर्ल्ड कप के लिए क्वालिफाई किया. इसके बाद हमने नेशंस कप खेला. वह भी हमारे लिए काफी अच्छा रहा. क्योंकि प्रो लीग के लिए क्वालिफाई करना भी बेहद अहम था. अगर आप प्रो लीग नहीं खेलेंगे, तो बड़ी टीमों के खिलाफ लगातार खेलने का मौका नहीं मिलेगा.
इसके बाद शायद ही किसी ने उम्मीद की होगी कि हम वर्ल्ड कप में इतना अच्छा प्रदर्शन करेंगे. हमने टूर्नामेंट में पांचवां स्थान हासिल किया. पूरे टूर्नामेंट में हम सिर्फ एक मैच हारे और वहीं से हमें अंदाजा हो गया था कि अब हमें एशियन गेम्स पर फोकस करना है. वर्ल्ड कप के बाद हम वापस आए और करीब एक हफ्ते का ब्रेक लिया. इस दौरान हमने रिहैब और रिकवरी पर काम किया. नई तैयारी शुरू करने से पहले खिलाड़ियों की फिटनेस पर ध्यान दिया गया.
एशियन गेम्स की पहली टीम मीटिंग में क्या हुआ?
जब हम एशियन गेम्स के लिए नागोया पहुंचे और पहली बार टीम मीटिंग हुई, तो मैंने वहां एक बात कही. यह मेरा चौथा एशियन गेम्स था. जब मैंने 2014 में खेला था, तब कोरिया विजेता था. 2018 में जापान विजेता बना था और 2023 में चीन ने गोल्ड जीता था. मैंने कहा कि इस बार हमें ही जीतना है, चाहे जो भी हो. इस बार का एशियन गेम्स का गोल्ड हमारा है. इस एक बात ने हर किसी को एकजुट कर दिया. सभी ने सोचा कि इस बार हमें यह करके दिखाना ही है. मेरे लिए यह बहुत अच्छा स्टार्ट था.
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हमने साफ तौर पर तय कर लिया था कि इस टूर्नामेंट में कोई भी खिलाड़ी व्यक्तिगत तौर पर नहीं खेलेगा. हर कोई टीम के लिए खेलेगा. छोटी या कम रैंक वाली टीमों के खिलाफ भी हमने अपना फोकस कम नहीं किया. जितने गोल किए जा सकते थे, उतने गोल किए. ताकि हर खिलाड़ी का कॉन्फिडेंस बढ़े और टीम को एक अच्छी लय मिले. दीपिका और नवनीत ने जिस तरह खेला, उससे अंदाजा हो रहा था कि टीम अच्छी फॉर्म में आ रही है. इसके बाद हमने उस लय को आखिर तक बनाए रखा.
महिला हॉकी टीम की हर खिलाड़ी के हाथ में एक पीला धागा बंधा हुआ है. इस धागे की क्या कहानी है?
वर्ल्ड कप में जाने से पहले हमारे कोच ने हमें एक क्रिस्टल दिया था. उन्होंने उसे हाथ में पकड़कर भविष्य की कल्पना करने के लिए कहा था कि जब हम मेडल जीतेंगे और अपना लक्ष्य हासिल करेंगे, तब कैसा महसूस होगा. हम उस क्रिस्टल को हमेशा अपने साथ नहीं रख सकते थे. लेकिन कोच चाहते थे कि हमारे पास ऐसी कोई चीज जरूर हो, जो हमें हमेशा एकजुट रहने की बात याद दिलाती रहे. इसलिए उन्होंने हम सभी को एक धागा दिया. सभी ने वह धागा अपने हाथ में बांधा. जब भी हम मैच के लिए जाते या ग्राउंड से बाहर आते-जाते, उस धागे को देखकर हमें याद आता था कि हम एक टीम हैं. हमें एकजुट होकर खेलना है. इस एक चीज़ ने मुझे बहुत ज्यादा टच किया, क्योंकि मुझे ऐसी चीजें बहुत पसंद हैं.
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