पुणे का मैच. मुंबई वाले हाईवे पे तैनात नया स्टेडियम. स्टेडियम में भरे लोग. दर्शकों में उत्साह. कप्तान कोहली. धोनी मात्र एक विकेट-कीपर बैट्समैन. कोहली ने टॉस जीतके इंग्लैंड से इंडियन बॉलर्स की धुलाई का फ़ैसला लिया. पहले दस ओवर के अन्दर जेसन रॉय पचासा मार चुके थे. यानी 60 गेंदों में एक आदमी पचास पार कर चुका था. उसने खुद 36 गेंद ही खेली थीं. पहला विकेट 39 पर गिरा और दूसरा 108 पर. भला हो जडेजा का जो उसे लालच देकर क्रीज़ से बाहर निकलवा दिया. अंत में आकर बेन स्टोक्स ने जो तांडव मचाया वो काबिल-ए-गौर था. गौर ऐसा कि इंडिया के हाथ-पांव फूलने लगे. स्कोर एक जगह जहां 280-290 के एटे-पेटे रुकता हुआ नज़र आ रहा था वहीं बेन स्टोक्स ने उसे 350 पे पहुंचा दिया. वो भले ही आउट हो गए थे लेकिन इनिंग्स उन्हीं की ज़िम्मेदार थी.

खैर, इंडिया बैटिंग करते हुए वैसी ही शुरुआत की राह पर चल रही थी जैसा लग रह था. धवन जल्दी निपट गए. दहाई की संख्या में पहुंचते ही इकाई की सबसे छोटी संख्या का स्कोर लेकर वो आउट हो गए. इंग्लैंड की शुरुआत वैसी ही थी जैसी वो चाह रहे थे. वन-डाउन विराट कोहली पहुंचे. दर्शकों में उत्साह! चीखना चिल्लाना चलता रहा तब तक के एल राहुल निकल पड़े. पवेलियन की ओर. 18 गेंद में 8 रन. आना हुआ युवराज सिंह का. 3 साल बाद वन-डे मैच खेल रहे थे. कम-बैक मैच. पहली गेंद, छोड़ दी. दूसरी गेंद - 6 रन. कम-बैक ऐसा नहीं हुआ तो थू है. अगली ही कुछ गेंदों में एक पुल मारकर चार रन अर्जित किये. गजब खेल. लग रहा था कि पार्टनरशिप चल पड़ेगी और तब तक युवराज ने धोखा दे दिया. 12 गेंद में 15 रन और कहानी पैक. धोनी का आना एक गजब का शोर लेकर आया. कुछ शॉट्स के बाद वो भी चलते बने. 6 गेंद में 6 रन. आया राम गया राम की कहानी चालू थी. लेकिन धोनी का जाना निराशा लेकर आया.
केदार जाधव के आते ही पिच पर दो मनुष्य नहीं बल्कि दो पिशाच खेल रहे थे. वो पिशाच जिनपर इंसानी ताकतों का कोई वश नहीं चल पा रहा था. कोहली और जाधव ने एक बड़ी पार्टनरशिप खेलनी शुरू की. कोहली ने वो खेल खेला जो वो पूरे 2016 में खेलते आ रहे थे. अल्ताफ राजा ने कहा था कि "अरे वो साल दूसरा था, ये साल दूसरा था..." लेकिन बॉस! कोहली के लिए अभी भी वही समय चल रहा है. कैलेंडर बदलते रहेंगे. कोहली का समय नहीं बदल रहा है. नहीं बदलेगा. विराट कोहली ऐसे खेल रहा था जैसे पिछले सवा दो घन्टे से वो नेट्स में बैटिंग कर रहे हों. और उन्हें गेंद फुटबॉल की तरह दिख रही हो. 
ठीक इसी समय विराट की कप्तानी पर सवाल उठाये जा रहे थे. क्यूंकि किसी को नहीं मालूम था कि अगले डेढ़ घंटे में क्या होने वाला है. किसी को नहीं मालूम था कि वो तख्ता पलट देखने वाले हैं. इंग्लैंड का तख्तापलट. पुणे में कोहली ने अपना 27वां शतक जमाया. स्कोर का सफ़लतापूर्वक पीछा करते हुए 15वां. और इसी के साथ कोहली ने उसका रिकॉर्ड तोड़ा जिसका उन्हें दूसरा अवतार माना जाता है - सचिन तेंदुलकर. विराट का साथ देने वाला बल्लेबाज. केदार जाधव. 31 साल का. वो उम्र जब आदमी रिटायर होने की सोचने लगता है. यहां वो अपना करियर शुरू कर रहा था. जधाव ने 2015 में एक सेंचुरी बनाई थी. लेकिन उन्हें टीम में जगह बनाने में वक़्त लगा. गौर करने वाली बात ये है कि जाधव ने जब-जब 50 का स्कोर पार किया है, उन्होंने सेंचुरी मारी है. यानी कन्वर्ज़न रेट पूरा 100% का. विराट कोहली. धोनी के कप्तानी छोड़ने के बाद पहली बार फुल टाइम कप्तान के रूप में खेल रहे थे. यकीनन पहली इनिंग्स के बीच वो एक-दो जगह फ्रस्ट्रेट ज़रूर हुए होंगे. हुए ही होंगे क्यूंकि इंसान तो वो हैं हीं. हालांकि जैसी बैटिंग उन्होंने अगली इनिंग्स में की, इंसानी नहीं थी. 350 चेज़ कर लिया. वो मैच की दूसरी इनिंग्स में बैटिंग करना चाहते थे क्यूंकि उन्हें चेज़ करना था. क्यूंकि वहां ओस पड़ने वाली थी. और उससे भी बड़ी चीज़ - क्यूंकि वो विराट कोहली थे. वो जिसने ऑस्ट्रेलिया में 40 ओवर के अन्दर 320 के इर्द गिर्द का स्कोर चेज़ कर श्री लंका को उखाड़ फेंका था. उस दिन मलिंगा को मालूम चला था कि 'मार' असल में कहते किसे हैं. कोहली जब खेल रहे थे तो लग रहा था कि बस कोई चाहिए जो उनके साथ टिका रहे. लेकिन केदार जाधव ने वो दावेदारी पेश की जिसमें धवन, राहुल, धोनी सभी फ़ेल हुए थे. जाधव ने न सिर्फ स्ट्राइक बदलती रक्खी बल्कि बाउंड्री में भी डीलिंग की. एक वक़्त पर माहौल ऐसा बन गया कि आंखें डॉट बॉल देखने को तरस गयीं. इंडियन बॉलर्स का अपनी बॉलिंग के वक़्त फेंकी फुलटॉस का सारा पा धुल रहा था. और धुलने वाले थे दो लोग. कोहली और जाधव.
कोहली की जब सेंचुरी लगी तो उन्होंने अपने ग्लव्स उतारे, बल्ला, फेंका, हेलमेट उतारा और ड्रेसिंग रूम की ओर इशारा किया कि पानी चहिये. कोई जश्न नहीं. ऐसा, जैसे कि पहले से ही मालूम था सेंचुरी लगनी है. ऐसा नॉर्मल जैसे सुबह उठकर मंजन करना हो. जैसे कि ये तो रोज़ करते हैं. कुछ नया बताओ बे. लेकिन कोहली की खुशी उस वक़्त देखने वाली थी जब जाधव ने सेंचुरी मारी. उस वक़्त जाधव इतना खुश नहीं था जितना कोहली था.
14 ओवर बचे हुए थे. इंडिया को जीतने के लिए 89 रन चाहिए थे. 6.36 रन प्रति ओवर. आखिरी पलों में स्टोक्स और बॉल की कुछ चोटें इंडिया का कुछ कर नहीं पाईं. असल में इंडियन क्रिकेट के वो दिन लद चुके हैं जब आखिरी के पांच विकेट गिरते ही टीम भरभरा के गिर जाए. अब सातवें-ंआठवें नंबर पर आने वाला आश्विन भी आखिरी गेंद पर छक्का मारकर मैच को सील कर देता है. उसे जीतने को भले ही एक रन चाहिए था मगर उसने छक्का मारा. क्यूंकि सर्किल के अन्दर बहुत प्लेयर खड़े थे. हार्दिक पंड्या ने आकर आख़िरी चोट की थी. 37 गेंदों में 40 रन. 3 चौके और 1 छक्का. यानी जब मर्ज़ी धीमा खेल लिया, जब जरूरत पड़ी, बाउंड्री पा ली. और यही एक बड़ी बात इस मैच से निकल के आई है. ये जो कम उम्र के उजड्डों की टोली है, मात्र मांसपेशियों की ताकत के दम पर नहीं उतरती. इसने यकीनन बादाम बहुत खाये हैं. इस टीम का दिमाग चलता है. इस टीम का सिक्का भी चलेगा. जय हो!