अर्थात, एक क्रिकेट खिलाड़ी की जिन्दगी की सिनेमा के परदे पर बॉलिवुडीय हत्या का उन्नीस सूत्री कार्यक्रम:
1.

अर्थात, एक क्रिकेट खिलाड़ी की जिन्दगी की सिनेमा के परदे पर बॉलिवुडीय हत्या का उन्नीस सूत्री कार्यक्रम:
1.

स्पोर्ट्स बायोपिक को इवेंट बायोपिक समझें. उसे किसी इवेंट मैनेजमेंट कंपनी की तरह हैंडल करें. खिलाड़ी के जीवन से सबसे बिकाऊ पांच-सात इवेंट चुन लें, फिर उन्हें आगे-पीछे करते हुए पटकथा बुन दें.
2.
किसी ऐसी घटना या तथ्य का उल्लेख ना करें, जो दर्शकों को पहले से मालूम ना हो. उन्हीं परिचित समाचार की कतरनों के इर्द गिर्द खेलते रहें. इसे ही तो कहते हैं 'पॉपुलर हिस्ट्री' पर फिल्म बनाना.
3.
खिलाड़ी के क्रिकेटीय जीवन की कोई डीटेल भूल से भी फिल्म में ना आने पाए. ना हार में बनाई लॉर्ड्स वाली सेंचुरी, ना जीत में बनाई हिन्दुस्तानी ज़मीन की पारियां. ना स्पिनरों के साथ नब्बे में नब्बे पर घूमती पिचों पर घरेलू पिचों का सरताज बनना, ना टॉस जीतकर बॉलिंग चुनना अौर प्लास्टिक बोतलों अौर मशालों के साये में विश्वकप से बाहर होना. न कप्तानी की म्यूजिकल चेयर, ना इंग्लैंड वाला सिद्धूनामा अौर गांगुली-द्रविड़ उदय.
4.
'अज़हर' की ज़िन्दगी का ध्येय संवाद बनाएं "तेरे को जवाब बोलके नहीं, खेलके देना" अौर फिर फिल्म में हर बात बोलकर बताएं. सिनेमाई भाषा गई भाड़ में, हर चीज़ बोलकर एक्सप्लेन होनी चाहिए. आई रिपीट, बोलकर. जो पात्रों के आपसी संवादों से काम ना चले तो खुद प्रॉटेग्निस्ट से फर्स्ट पर्सन कमेंट्री करवाएं.
5.
बीच बीच में 'कौम का,' 'देश का' बुलवाते रहें. कभी अज़हर से, कभी उसके चाहनेवालों से, कभी उसके विरोधियों से. इस देश में क्रिकेट बिकता है, लेकिन उससे भी ज़्यादा देसभक्ति बिकती है.
6.
90s के हिन्दी सिनेमा की मूर्ख अौर प्लास्टिक फेस मानी गई हीरोइन की भूमिका निभाने के लिए 2016 के हिन्दी सिनेमा की मूर्ख अौर प्लास्टिक फेस मानी गई हीरोइन को कास्ट करें, अौर अपनी इस कमाल चालाकी भरी कास्टिंग पर खुश हों.
7.
भारतीय दर्शक भक्त लोग हैं. सिनेमा भी जन्म से ही दार्शनिक प्रवृत्ति का रहा है. जनता प्रवचन पसन्द करती है. फिल्म को 'सूक्ति वचन वाहक' समझें. बीच बीच में, "कछुआ ना, कहानियों में ही जीतता है" तथा "जब पैसा बोलता है तो फिर अौर कुछ नहीं बोलता" जैसे आधुनिक सूक्ति संवाद उछालते रहें.
8.
थोड़ा मनोरंजक ज्ञान भी दें. जैसे "तीन तकरार दुनिया में मशहूर हैं - मियां बीवी के बीच, पानी अौर पेट्रोल के बीच अौर इंडिया अौर पाकिस्तान क्रिकेट मैच के बीच".
9.
मेन प्रॉटेग्निस्ट की भूमिका के लिए उसे चुनें, जो आपके बैनर से पिछली हिट फिल्मों का स्टार हो. खिलाड़ी से उसकी ज़रा भी समानता संयोग से भी नहीं मिलनी चाहिए. फिल्म में उसे 'अज़हर' लगवाने के लिए बाज़ मौके कॉलर ऊपर करवा दें बस.
10.
कप्तान से गाने गवाएं. एक सुख वाला, एक दुख वाला. इमरान हाशमी को हीरो लेने का यही तो फायदा है. अौर वैसे भी, गाने हमारे सिनेमा का अभिन्न हिस्सा हैं. चाहे स्क्रिप्ट में ना फिट होते हों, वे मखमल का पैबंद हैं.
11.
खिलाड़ी का परिवेश दिखाने के लिए बचपन के सीन में हर दृश्य में बैकग्राउंड को मस्जिद की पृष्ठभूमि अौर चांद तारे वाली पन्नियों से पाट दें. गलती से भी उसे किसी प्रॉपर क्रिकेट मैदान में खेलते ना दिखाएं. संघर्ष को बट्टा लगता है.
12.
किसी एक 'स्टाइल अॉफ टॉक' को पकड़ लें, जैसे हर बात में कहना 'बड़े भाई'. बस इतना काफी है. ज़्यादा डीटेल में जाने से फिल्म के अच्छी अौर इस वजह से कमर्शियली 'रिस्की' हो जाने का खतरा है.
13.
खिलाड़ियों को 'नेक' अौर 'खल' की श्रेणी में बांट लें. अच्छे अन्तत: अच्छे ही निकलेंगे, बुरे अन्तत: बुरे ही होंगे. फिर जो अज़हर के खिलाफ रहे उन्हें तमाम बुरे काम करते दिखाएं. उनसे उनकी बीवियों को धोखा दिलवाएं, उन्हें दिलफेंक आशिक बताएं, उनका कैरीकैचर बनाएं, उन्हें कॉमेडियन बनाकर दर्शकों से तालियां पिटवाएं.
14.
किसी खिलाड़ी का पूरा नाम इस्तेमाल करने का जोखिम ना लें. फिल्म में कोर्ट केस चले वहीं तक ठीक है. कोर्ट में फिल्म का केस चल जाए, ऐसा नहीं होना चाहिए. इसलिए मनोज को कभी प्रभाकर ना कहें, रवि को कभी शास्त्री ना कहें, कपिल के साथ कभी देव ना लगाएं अौर मोहम्मद अजहरुद्दीन को 'अज़हर मोहम्मद' लिखें.
15.
एक वकील की भूमिका में कॉमेडियन चरित्र रखें, दूसरे में अपने ज़माने की मशहूर हीरोइन. फिल्म में क्रिकेट नहीं 'बिका' तो क्या, हास्य अौर सौंदर्य कभी धोखा नहीं देते.
16.
सचिन के बारे में कोई कमेंट करने का रिस्क ना लें. भक्तों का कोई भरोसा नहीं. बस एक-दो जगह चरण छूकर निकल लें.
17.
अपने कप्तान को आरोप मुक्त करवाने की ज़िम्मेदारी खुद पर समझें. अन्त को खुला छोड़ना अपराध है. चाहे कितना भी वाहियात एक्सप्लेनेशन देना पड़े, एक्सप्लेनेशन होना चाहिए.
18.
किरदार का ज़रा सा भी कैरेक्टर ग्राफ ना दिखने पाए. वही भावुक, पर ईमानदार अज़हर से शुरु करें अौर ठीक वहीं ले जाकर खत्म कर दें.
19.
अौर हां, ना प्लेयर का कोई ग्राफ नज़र आए. जैसा अज़हर 1985 में था, वैसा ही 2000 में अौर वैसा का वैसा 2011 में. इस बीच चाहे अन्य खिलाड़ी पैदा होने से लेकर विश्वकप जीत लेने तक का सफ़र तय कर चुके हों, अज़हर वहीं 'ज्यों की त्यों धर दीनी चदरिया' वाली कबीरपंथी थ्योरी पर यकीन कर डटे रहें.
इति सिद्धम!