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एक कविता रोज: 'बेखुदी हमने गंवाई बेखुदी की फ़िक्र में'

आज पढ़िए आशुतोष द्विवेदी की दो ग़ज़लें.

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फोटो - thelallantop
ashutosh-dwivedi आशुतोष द्विवेदी फॉरेन सर्विसेज में अफसर रहने के बाद फ़िलहाल फॉरेन मिनिस्ट्री में हैं. कानपुर में 21 साल बिताए हैं. उसके बाद इलाहबाद चले गए. दोनों शहरों के लोगों, सड़कों, हवाओं और गंगा को समेटकर अपनी ग़ज़लों में निचोड़ दिया. आज पढ़िए इनकी दो ग़ज़लें.

1.

भूख को ओढ़े गरीबी सो रही है देश में काफी तरक्की हो रही है पी गए सारा अंधेरा रौशनी की फिक्र में. फिर किसी के भी न हो पाए, सभी की फिक्र में. बंद पलकों में न जाने ख्वाब कितने घुट गए, और कितने जी रहे हैं, खुदकुशी की फिक्र में. फिक्र सारी छोड़ दी जिसने वही बेखुद हुआ, बेखुदी हमने गंवाई, बेखुदी की फिक्र में. जिंदगी जीना मजे के साथ आया ही नहीं, उम्र पूरी हो गई गलती-सही की फिक्र में. रात वो सपने में आएगा, ये उसका कौल था, और मैं जागा रहा शब भर उसी की फिक्र में. फिक्रमंदों को मेरे, मैंने बहुत रुसवा किया, तेरे दर की आरजू, तेरी गली की फिक्र में. आसमां से मैं बरसती थी जमीं पर बेहिसाब, लोग प्यासे रह गए खाते-बही की फिक्र में. घर बना पाए न हम इसलिए आवारा हुए, आप बेघर हो गए आवारगी की फिक्र में. खूबसूरत था वो कुदरत का दिया तोहफा मगर, हमने गुलशन को उजाड़ा बेहतरी की फिक्र में.

2.

भूख को ओढ़े गरीबी सो रही है देश में काफी तरक्की हो रही है. बाल-विधवा सी हमारी जिंदगानी, दाग दामन के, छिपाकर धो रही है. जो नदी कल तेरी आंखों से बही थी. मेरे मन का गांव आज डुबो रही है. फिर तेरे होठों की गर्मी चाहती है, फिर हमारी सांस ठंडी हो रही है. क्यों न उग जाए ईमारत पर ईमारत, हवस दिल में कंकरीटें बो रही है. बोझ बस्तों का बढ़ा इतना जियादा, स्कूल में बैठी शरारत रो रही है. ‘उम्र को हम ढो रहे हैं’– ये भरम था, आज जाना– ‘उम्र हमको ढो रही है’.
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