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'या भूनने के लिए आग खत्म हो गयी है'

पढ़ें सोमप्रभ की ये कविता.

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फोटो - thelallantop

सोमप्रभ नामक कहानीकार से आपकी मुलाक़ात हम पहले ही करवा चुके हैं. अबकी बार मिलिए भारत के सीमावर्ती जिले में कस्बाई जीवन जी रहे कवि-सोमप्रभ से. कविता पढ़ना दरअसल कविता का अनुवाद करना है, उसी भाषा से उसी भाषा में. इसलिये कविता के विषय में कोई भी राय अत्यंत निजी ही होती है. किन्तु फिर भी यह कहने का साहस करूंगा कि प्रस्तुत कविता दो स्तरों पर पीछा करती है. एक 'फेस-वैल्यू' के आधार पर 'एज़ इट इज़'. जहां आलू 'आलू' ही हैं और 'चेहरे' चेहरे. और यूं भी काफी रोचक लगती है. किन्तु दूसरा अपेक्षकृत सूक्ष्म तरीका है - कुछ कुछ लक्षणा टाइप्स. पढ़कर बताइये क्या 'आलू' ही हैं?

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तीन आलू सरककर गिर गए हैं किसी के 

  तीन आलू सरककर गिर गए हैं किसी के सुबह से कई घंटे बीत गए हैं इस बीच सौ आदमी तो चले ही गए होंगे लेकिन वे अब भी वहीं गिरे पड़े हैं एक ज़रा सा कट-फट गया है दो एक-दूसरे से चिपके हुए हैं पैदल गुज़रने वाले भी नहीं देख रहे उधर सब उड़े से चेहरे लिए चले जा रहे हैं दिशाओं में बच्चे तक चले जा रहे हैं बिना पैर से ठेले वे तो बना सकते थे अपनी गेंद और सड़क पर लुढ़का सकते थे उसे यह बात बहुत परेशान करने वाली है कि घंटों बीत जाने पर भी किसी ने नज़र उठाकर क्यों नहीं देखा क्या यह शर्म की बात है किसी ने क्यों नहीं उठाया उसे क्या आलू इतनी बेकार की चीज हो गयी है क्या ताज़ा खुदे आलू में स्वाद नहीं बचा या भूनने के लिए आग खत्म हो गयी है बरतन और पानी खत्म हो गया है कि उबाले जा सकें महज़ तीन आलू या नए पकवानों से भर गयी है पृथ्वी की थाल और आलू को कह दिया गया है अलविदा या सड़क पर गिरा आलू उठाने से कोई गिरफ्तार हो सकता है भूख खत्म हो गयी है या शायद यहां से कहीं और चले गए हैं भूखे लोग.
कुछ और कविताएं यहां पढ़ें- "मेरे प्रेम को समझ नहीं पाई. छोटी जात की थी न. और ये छोटी जात किसी की सगी नहीं होती." 'मेरे लिए दिल्ली छोड़ने के टिकट का चन्दा इकट्ठा करें' एक कविता रोज़: ‘दिल्ली में रोशनी, शेष भारत में अंधियाला है’
  वीडियो देखें-  https://www.youtube.com/watch?v=Gcv71ct_HpE&t=134s

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