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एक कविता रोज़: कवियों ने धोखे किये कविता में क्या खोट

आज एक कविता रोज में पढ़िए संजय चतुर्वेदी कृत सरबत सखी जमावड़ा.

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फोटो - thelallantop

संजय चतुर्वेदी का काव्य-व्यवहार आक्रोश को अवसाद में बदल देने वाले हुनर में यकीन नहीं रखता है. एक कहीं न ले जाने वाली करुणा, एक जीवन की सघन अनुभूतियों की समरसता, एक खाया-अघाया अपराध-बोध, एक सहमत पक्षधरता, एक शुतुरमुर्गीय उम्मीद... उनकी कविता की आवाज नहीं है. मुक्तिबोध के बाद वह हिंदी कविता के सर्वाधिक खतरनाक, बेपरवाह और जोखिम उठाने वाले कवि हैं. मुक्तिबोध से पूर्व उनका काव्य-विवेक कबीर से जाकर जुड़ता है. बहुतों की नजर में उन्होंने अपने कवि-व्यक्तित्व को बर्बाद किया है. बहुतों की नजर में उनमें वामपंथ के प्रति घृणा है. बहुतों की नजर में उनका वाम-विरोध अलोकतांत्रिकता के स्तर तक चला जाता है. बहुतों की नजर में उनकी कविता प्रतिक्रियावाद और दक्षिणपंथ को मदद पहुंचा सकती है. बहुतों की नजर में उनके जैसा असहमत कवि आज तक खड़ी बोली हिंदी में हुआ ही नहीं है. बहुतों की नजर में वह एक भुला दिए गए कवि हैं. बहुतों की नजर में उनके साथ अन्याय हुआ है... आज एक कविता रोज़ में संजय चतुर्वेदी कृत 'सरबत सखी जमावड़ा.'

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कविता में तिकड़म घुसी जीवन कहां समाय सखियां बैठीं परमपद सतगुरु दिया भगाय घन घमंड के झाग में लंपट भये हसीन खुसुर पुसुर करते रहे बिद्या बुद्धि प्रबीन सतगुरु ढूंढ़े ना मिलै सखियां मिलें हज़ार किटी पार्टी हो गया कविता का संसार रूपवाद जनवाद की एक नई पहचान सखी सखी से मिल गई हुआ खेल आसान ऊंची कविता आधुनिक पकड़ सकै ना कोय औरन बेमतलब करै खुद बेमतलब होय कवियों के लेहड़े चले लिए हाथ में म्यान इत फेंकी तलवार उत मिलन लगे सम्मान कविता आखर खात है ताकी टेढ़ी चाल जे नर कविता खाय गए तिनको कौन हवाल जनता दई निकाल सो अब मनमर्जी होय मंद मंद मुस्काय कवि कविता दीन्ही रोंय खुसुर पुसुर खडयंत्र में फैले सकल जुगाड़ निकल रही यश वासना तासें बंद किवाड़ सरबत सखी जमावड़ा गजब गुनगुनी धूप कल्चर का होता भया सरबत सखी सरूप सरबत सखीयन देख कै लम्पट रहे दहाड़ करै हरामी भांगड़ा सतगुरु खाय पछाड़ सरबत सखी निजाम हित बोला चतुर सुजान हिंदी कविता की बनी अब बिसिस्ट पहचान सखी पंथ निर्गुन सगुन दुर्गुन कहा न जाय सखियन देखन मैं चली मैं भी गयी सखियाय कल्चर की खुजली बढ़ी जग में फैली खाज जिया खुजावन चाहता सतगुर रखियो लाज कवियों ने धोखे किये कविता में क्या खोट कवि असत्य के साथ है ले विचार की ओट

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