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'तुम्हारी झुर्रियों में दफ़न हैं सैकड़ों कथाएं'

'एक कविता रोज' में आज पढ़िए नीलाभ की कविता 'पत्थर'.

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फोटो - thelallantop
कल नीलाभ अश्क़ 80 की उम्र में चले गए. फ़ेसबुक पर उर्दू क्लास चलाते थे. और इसीलिए उनके जाने से हिंदी और उर्दू वाले, दोनों दुखी हैं. अपनी निजी ज़िंदगी पर सार्वजनिक तौर पर बात करते थे, लिखते थे. ये बड़ी हिम्मत का काम है. ऐसा करके वो शायद भविष्य की किसी संस्कृति का पौधा लगा रहे थे. आज पढ़िए इन्हीं की कविता 'पत्थर'
 

-पत्थर-

तुम अपने साथ लिए फिरते हो हज़ारों वर्षों का इतिहास तुम्हारी झुर्रियों में दफ़न हैं सैकड़ों कथाएँ लेकिन इन दिनों मेरी मेज़ पर अपनी लम्बी यात्रा के बीच कुछ समय के लिए विश्राम करते हुए तुम कितने शान्त लगते हो कभी-कभी मुझे महसूस होता है तुम्हें हल्के से टकोरूं तो तुमसे संगीत का एक सोता फूट निकलेगा

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